भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध और इसके विरोधियों के प्रचार से पार पाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सिपहसालारों ने चारसूत्रीय योजना बनाई है
भूमि अधिग्रहण बिल मोदी सरकार का सबसे कड़ा और बड़ा इम्तिहान है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली परीक्षा है. वे हाल ही में दिल्ली का चुनाव हार चुके हैं. अगर चुनाव न हारते तो विरोध इतना तेज़ नहीं होता. लेकिन इसके  बाद भी उन्होंने अपने फैसले पर टिके रहने का निर्णय लिया है. उनका सोचना है कि सरकार का यह पहला साल है. और अभी से अगर उन्होंने अपने फैसले उलटने शुरू कर दिए तो फिर मजबूत नेता और नेतृत्व की छवि भी उलट सकती है. प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों और सांसदों दोनों को अपनी इच्छा बता दी है. यह भी जता दिया है कि उनकी पार्टी और सरकार इस ज़मीन अधिग्रहण बिल की मार्केटिंग कैसे करे. विपक्ष ने मोदी के लिए ज़मीन अधिग्रहण का जाल बुना. मोदी ने इसका जवाब देने के लिए एक चक्रव्यूह तैयार किया है. भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध और इसके विरोधियों के प्रचार से पार पाने के लिए नरेंद्र मोदी चारपक्षीय योजना पर काम कर रहे हैं.
अखिलेश यादव सरकार की इस चिट्ठी से मोदी सरकार मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी की घेराबंदी करेगी. ऐसी ही चिट्ठी ममता बनर्जी सरकार की भी आई थी. अब ममता के खिलाफ उनकी सरकार की चिट्ठी ही काम आएगी.
संसद में डटकर मुकाबला
पहला, संसद में सरकार झुके बिना अपने फैसले पर टिकी रहेगी. राज्यसभा में अरुण जेटली और लोकसभा में वेंकैया नायडू को इस बिल की हिमायत और संरक्षण देने का जिम्मा सौंपा गया है. दोनों मंत्रियों के मंत्रालयों का हित भी इस बिल से जुड़ा हुआ है. अरुण जेटली वित्त मंत्री हैं. अगर ज़मीन अधिग्रहण बिल पास हुआ तो खज़ाने में पैसा आएगा. विकास दर बढ़ेगी. इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा. वेंकैया नायडू के पास शहरी विकास मंत्रालय है. स्मार्ट सिटी का सपना इसी मंत्रालय को सच करना है. और स्मार्ट सिटी बनाने के लिए ज़मीन चाहिए.
विरोधियों की चिट्ठियों का उनके खिलाफ ही इस्तेमाल
ज़मीन अधिग्रहण का विरोध करने वाली पार्टियों में सबसे आगे कांग्रेस है. उसने ही पुराना कानून बनाया था. लेकिन यह भी सच है कि जब यूपीए सरकार ने यह कानून बनाया तो कांग्रेस के कई मुख्यमंत्रियों ने इस पर आपत्ति जताई थी. उन्होंने तब मनमोहन सरकार को इस आशय की चिटि्ठयां भी लिखी थीं. अब वही चिटि्ठयां मोदी सरकार के काम आ रही हैं. मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को एक चिट्ठी में लिखा था, 'नए कानून के प्रावधानों से सिंचाई, स्वास्थ्य, सीवेज, बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी जमीन लेना और पुनर्वास छह गुना महंगा हो जाएगा. मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि हमारे सुझावों पर अमल करें. हमारे सुझाव इस प्रकार हैं, उद्योग और शहरीकरण के लिए जमीन अधिग्रहण करने पर 80 फीसदी सहमति के प्रावधान को हटाया जाए. किसानों को पुनर्वास के साथ बाजार कीमत का तीन गुना दाम दिया जाए, या फिर बिना पुनर्वास के जमीन की छह गुना कीमत दी जाए.' अब मोदी सरकार चव्हाण की चिट्ठी का इस्तेमाल कर संसद और सड़क दोनों जगह कहने जा रही है कि कांग्रेस दोमुंही बात कर रही है.
मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी भी ज़मीन अधिग्रहण बिल का पुरजोर विरोध कर रही है. लेकिन यह भी सच है कि मुलायम सिंह यादव के बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी पिछली केंद्र सरकार को इस बिल पर एक चिट्ठी लिखी थी. जब यूपीए सरकार ने जमीन अधिग्रहण कानून बनाया तो अखिलेश की सरकार ने लिखा, 'सेक्शन 24(2), जमीन अधिग्रहण कानून के रेट्रोस्पेक्टिव प्रावधान परेशानी खड़े करने वाले हैं. इसपर दोबारा विचार होना चाहिए. खासतौर से ये ऐसे मामलों में दिक्कत खड़ी कर रहे हैं, जहां जमीन का अधिग्रहण सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए पहले ही किया जा चुका है. पांच साल पुराने मामलों को दोबारा खोलने वाला प्रावधान भी व्यवहारिक नहीं है.'
अखिलेश यादव सरकार की इस चिट्ठी से मोदी सरकार मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी की घेराबंदी करेगी. ऐसी ही चिट्ठी ममता बनर्जी सरकार की भी आई थी. अब ममता के खिलाफ उनकी सरकार की चिट्ठी ही काम आएगी.
सड़क पर उतरे लोगों को नहीं बल्कि खेतों में काम करने वालों को समझाना है
ज़मीन अधिग्रहण बिल से मोदी सरकार की छवि किसान विरोधी बन रही है. पार्टी और सरकार दोनों के लिए यही एक चिंता की बात है. प्रधानमंत्री जानते हैं, अगर किसान और गरीब खिलाफ हो गया तो फिर कोई भी चुनाव जीतना मुश्किल है. उनकी चिंता सड़क पर उतरने वाले लोगों से ज्यादा खेत में काम करने वाले किसानों की है. इसलिए नितिन गडकरी और अमित शाह को मिशन किसान पर काम करने के लिए कहा गया है. दोनों को कहा गया है कि वे देश के अलग-अलग किसान नेताओं से मिलें. जो काम संसद और सड़क पर नहीं हो सकता वह बातचीत से सुलझाएं. देश के किसानों को यह संदेश दिया जाए कि अगर वे ज़मीन देंगे तभी देश का विकास होगा और उन्हें पूरा मुआवजा भी पूरा मिलेगा. किसानों को यह समझाना बेहद मुश्किल काम है. इसके जबाव के तौर पर मोदी सरकार चाहती है कि यदि ज़मीन ली जाए तो उसपर काम तेज़ी से चले ताकि अगला चुनाव आते-आते अधिग्रहीत ज़मीनो पर कारखाने, स्कूल, मकान या हॉस्पीटल बने दिखें. किसानों को लगे कि उनकी ज़मीनें बर्बाद नहीं हुईं.
अपने सहयोगियों को समझाने की कोशिश
भूमि अधिग्रहण के मसले पर सरकार को अपने सहयोगियों से भी वैसा सहयोग नहीं मिल रहा जैसा वह चाहती होगी. शिवसेना ने तो इस पर एक प्रकार से सरकार के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया है. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने शिवसैनिकों से किसानों के पास जाकर उन्हें भूमि अधिग्रहण के बुरे प्रभावों को बताने के लिए कहा है. वहीं अकाली दल और लोजपा को भी इस विधेयक के कुछ प्रावधानों पर ऐतराज है जिनपर उन्होंने अपनी नाराजगी सार्वजनिक तौर पर जाहिर की है. बताया जाता है कि नरेंद्र मोदी और भूमि अधिग्रहण विधेयक से जुड़े उनके सहयोगियों ने इस विधेयक को संसद में लाने से पहले अपने सहयोगियों को भरोसे में नहीं लिया. उनका सोचना था कि यह विधेयक अध्यादेश के स्थान पर लाया जा रहा है तो अब इस पर सहयोगियों से बात करने की जरूरत नहीं. लेकिन दिल्ली के चुनाव में हार और नीतीश कुमार के मु्ख्यमंत्री बन जाने के बाद अब जमीन अधिग्रहण के नये विधेयक का जिस तरह से विरोध हो रहा है उससे एनडीए के घटक दलों के लिए स्थितियां थोड़ी बदल गई हैं. शिवसेना तो पहले से ही भाजपा से नाराज चल रही है जबकि बिहार में इस साल के अंत में चुनाव होने वाले हैं. और खेती-किसानी के लिए जाने जाने वाले पंजाब में भी आम आदमी पार्टी का खतरा चुनाव से दो साल पहले अकालियों के सामने आ खड़ा हुआ है. इसलिए अब बदली परिस्थितियों में अपनी गलती सुधार कर भाजपा अपने सहयोगी दलों को भी मनाने में लग गई है.