पीडीपी से भाजपा का गठबंधन एक ऐसा निकाह है जिसमें दोनों ही पार्टियां जबरदस्ती एक दूसरे से कबूल है, कबूल है, कह रही हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जितना नुकसान कांग्रेस और केजरीवाल मिलकर नही कर पाए, उससे ज्यादा मुफ्ती मोहम्मद सईद ने चालीस घंटे के भीतर कर दिया. पीडीपी संरक्षक मुफ्ती सईद को गले लगाना, मुख्यमंत्री बनाना, उनके शपथ समारोह में जाना, मोदी को महंगा पड़ सकता है. उन्होंने मोदी की मजबूत नेता वाली छवि पर ऐसा डेंट लगा दिया है जिसे अगर उन्होंने जल्द दुरूस्त नहीं किया गया तो निशान हमेशा दिखेंगे. पिछले साल जब पाकिस्तान ने हुर्रियत नेताओं से बात की तो भारत ने उससे होने जा रही बातचीत को ही रद्द कर दिया था. लेकिन सईद ने तो पाकिस्तान और अलगाववादियों को जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव के लिए शुक्रिया ही कह दिया. और मोदी चुप हैं. इस चुप्पी की कीमत सबसे ज्यादा उन्हें ही चुकानी पड़ सकती है. क्योंकि जिस मध्यम वर्ग ने मोदी को अपना नेता माना वह मोदी के शरीर पर महंगा कोट देखकर तो चुप रह सकता है. लेकिन भाजपा का सहयोगी बनकर मुफ्ती ने जो आतंकवादियों और पाकिस्तान को धन्यवाद दिया उसे पचा पाना उसके लिए मुश्किल है. मोदी खुद से कहते हैं कि उनकी सियासी सूझ-बूझ पर लोगों को शक नहीं करना चाहिए. फिर उनसे इतनी बड़ी सियासी गलती कैसे हो गई. क्या सिर्फ इसलिए कि कश्मीर में सरकार बनाना उनकी जिद थी.


पिछले साल जब पाकिस्तान ने हुर्रियत नेताओं से बात की तो भारत ने उससे होने जा रही बातचीत को ही रद्द कर दिया था. लेकिन सईद ने तो पाकिस्तान और अलगाववादियों को शुक्रिया ही कह दिया. और मोदी चुप हैं

गठबंधन नहीं सौदेबाजी

जम्मू-कश्मीर में सत्ता के लिए गठबंधन नहीं सौदेबाजी हुई. और इस सौदेबाजी में विचारधारा जैसी चीजों की नीलामी हो गई. सोचिए, जो भाजपा दो विधान, दो निशान का नारा लगाकर बड़ी हुई. उस पार्टी के प्रधानमंत्री कश्मीर में थे. और सामने भारत के झंडे के साथ एक और निशान लहरा रहा था. बात 370 छोड़ने की नहीं है. बात है 370 के साथ-साथ उस विचार को छोड़ने की जिससे भाजपा और मोदी के ही मुताबिक उन्हें पहचान मिलती है. भाजपा के बड़े नेताओं के मुताबिक 'मुफ्ती ने मोदी से और मुफ्ती की बेटी महबूबा ने अमित शाह से वादा किया था कि वे विवाद नहीं विकास की सियासत करेंगे.' लेकिन कुर्सी पर बैठते ही हुआ कुछ और. अब मुफ्ती बीजेपी के गले की ऐसी घंटी बन गए हैं जो जितनी बजेगी, उतनी ही बीजेपी की नींद उड़ेगी.


पहले शुक्रिया पाकिस्तान...अब अफजल के शंव की मांग!

जब कसाब की फांसी हुई थी, मोदी ने पूछा था - अफजल की फांसी कब होगी. विधान परिषद की एक सीट जीतने के लिए मुफ्ती की पार्टी ने निर्दलीय विधायक रशीद इंजीनियर की हां में हां मिला दी और केंद्र सरकार से अफजल का शव मांग लिया. उस चिट्ठी पर पीडीपी के मंत्री नईम अख्तर के दस्तखत हैं. भाजपा और पीडीपी की डील अमित शाह ने फिक्स की और जवाब देना मुश्किल हो रहा है गृह मंत्री राजनाथ सिंह को. मुख्यमंत्री मुफ्ती सईद ने पहले ही दो दिन में बीजेपी की जड़ पर हमला किया है. भाजपा विचारधारा और राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति करती है और मुफ्ती ने उन्हीं पर कुल्हाड़ी चला दी. अगर हमला जड़ पर हुआ है तो पेड़ को नुकसान होने का खतरा तो होगा ही.


कश्मीर में फंस गए मोदी!

कश्मीर में भाजपा फंस गई है. कमल खिलाने चली थी. मुंह पर कीचड़ पोतकर खड़ी है. पीडीपी से बीजेपी का गठबंधन एक ऐसा निकाह है जिसमें दोनों ही पार्टी जबरदस्ती एक दूसरे से कबूल है...कबूल है, कर रही हैं. ऐसा लग रहा है, बेगानी शादी में बीजेपी दीवानी हो रही है. इस दीवानगी में न विचार बचा, न सिद्धांत. सिर्फ कुर्सी बची है जिस पर बैठे मुफ्ती सईद हैं और उसे थामे बीजेपी खड़ी है.