दुति चांद को खेल पंचाट से राहत मिल गई है. लेकिन जेंडर टेस्ट के नाम पर महिला एथलीटों के साथ हुए भेदभाव से जुड़े सवाल अब भी अनुत्तरित हैं.
उड़ीसा से आने वाली देश की बेहतरीन धावक दुती चांद ने इस साल फरवरी में हुए राष्ट्रीय खेलों में 100 मीटर की दौड़ का स्वर्ण पदक जीता. 100 और 200 मीटर के पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ते हुए उन्होंने इन स्पर्धाओं में 11.76 और 23.57 सेकेंड का समय निकाला. इस उपलब्धि के बाद दुति को उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद होनी चाहिए थी. लेकिन वे कई आशंकाओं में घिर गईं.
दरअसल दुती को पिछले साल राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में खेलने से रोक दिया गया था. वजह बताई गई हाइपरएंड्रोजेनिज्म. हालांकि बाद में स्विटजरलैंड स्थित खेल पंचाट (सीएएस) ने दुती को अंतरिम राहत देते हुए उन्हें इस साल के राष्ट्रीय खेलों में भाग लेने की अनुमति तो दे दी लेकिन, इस मामले में अंतिम सुनवाई बाद में करने की बात भी कही. यानी एक एथलीट के रूप में दुती के भविष्य पर अनिश्चितताओं के बादल छाए हुए थे. लेकिन 27 जुलाई 2015 को सीएएस ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशंस (आईएएएफ) हाइपरएंड्रोजेनिज्म रेगुलेशन नाम की प्रक्रिया को फिलहाल फौरन रोक दे.
‘इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बुरा हिस्सा है इसे जेंडर या सेक्स टेस्ट कहना. यहां परीक्षण इस बात का नहीं हो रहा कि वे स्त्री हैं या पुरुष, बल्कि इस बात का हो रहा है कि वे स्त्री वर्ग से खेल प्रतिस्पर्धा में भाग ले सकती हैं या नहीं?’
सीएएस ने खेल को संचालित करने वाली इस संस्था से यह भी कहा है कि वह यह साबित करने के लिए मजबूत वैज्ञानिक साक्ष्य पेश करे कि टेस्टोटेरोन के बढ़े हुए स्तर से किसी महिला एथलीट को दूसरे एथलीटों की तुलना में अनुचित लाभ मिलता है. ऐसा करने के लिए उसने दो साल का समय दिया है. यानी आशंकाएं अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं.
हाइपरएंड्रोजेनिज्म एक ऐसी शारीरिक स्थिति है जिसमें महिला के शरीर में टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन की उपस्थिति एक तय मानक से ज्यादा पाई जाती है. इस हार्मोन के बढ़ने से मुंहासे निकलना, पूरे शरीर पर बालों का ज्यादा उगना, पीरियड्स में गडबड़ी, कई बार आवाज या चेहरा पुरुष जैसा हो जाने जैसे लक्षण दिखते हैं. टेस्टोस्टेरोन के परीक्षण को ‘सेक्स वेरीफिकेशन टेस्ट’ या ‘जेंडर डिटरमिनेशन टेस्ट’ या फिर ‘सेक्स टेस्ट’ के नाम से भी जाना जाता है.
यूं तो स्त्री व पुरुष दोनों के शरीर में ज्यादातर हार्मोन एक जैसे होते हैं. लेकिन कुछ हार्मोनों की स्त्री शरीर में प्रधानता होती है और कुछ की पुरुष शरीर में. टेस्टोस्टेरोन मूलतः पुरुष के शरीर में पाया जाने वाला हार्मोन है जो उनके पुरुषोचित विकास और मांसपेशियों की ताकत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है. एक युवा नर के शरीर में युवा मादा की अपेक्षा कई गुना ज्यादा टेस्टोस्टेरोन पाया जाता है.
आईएएएफ के अब तक के नियमों के मुताबिक हाइपरएंड्रोजेनिज्म की स्थिति में महिला धावकों के अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है. आईएएएफ का तर्क है कि हाइपरएंड्रोजेनिज्म के कारण महिला धावक में अपनी अन्य प्रतिद्वंदियों से ज्यादा क्षमता आ जाती है. इसलिए महिला धावक सिर्फ उसी स्थिति में किसी प्रतियोगिता में भाग ले सकती है जब वह अपने टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर कम कर दे. ऐसा दवाइयों या सर्जरी के द्वारा किया जा सकता है.
पिंकी प्रमाणिक और शांति सुंदरराजन को भी जेंडर टेस्ट से गुजरना पड़ा है
पिंकी प्रमाणिक और शांति सुंदरराजन को भी जेंडर टेस्ट से गुजरना पड़ा है
किसी धाविका से यह कहना कि वह स्त्री तो है, लेकिन उसके स्त्रीत्व में कहीं खोट है जिस कारण वह स्त्री वर्ग में नहीं जा सकती, यह अपने आप में उसके लिए एक यातना जैसा है
11 अंतर्राष्ट्रीय और 50 राष्ट्रीय पदक जीतने वाली तमिलनाडु के दलित तबके से आई शांति सुंदरराजन पहली भारतीय धाविका हैं जिन्हें जेंडर टेस्ट से गुजरना पड़ा था. टेस्ट में फेल होने के कारण शांति को 2006 में हुए एशियाई खेलों में 400 मीटर की रेस में जीते कांस्य पदक को लौटाना पड़ा था. यह उनके कैरियर के अंत की शुरुआत थी. जेंडर टेस्ट में फेल होने के कारण उन्हें जो अपमान झेलना पड़ा उसके चलते उन्होंने आत्महत्या का भी प्रयास किया. पदक छीनने और जेंडर टेस्ट से हुए सामाजिक अपमान को बयान करते हुए वे कहती हैं, ‘लोग मुझे अजीब तरह से देखते हैं...जैसे पूछ रहे हों कि क्या ये लड़की एक पुरुष है?... इस सब से मेरा और मेरे परिवार का जीवन तबाह हो गया है!’
दूसरी महिला धाविका जिन्हें जेंडर टेस्ट से गुजरना पड़ा था वे हैं पश्चिम बंगाल की पिंकी प्रमाणिक. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय खेलों में पांच स्वर्ण सहित छह पदक जीते हैं. पिंकी की एक महिला मित्र ऩे उनपर यौन शोषण का आरोप लगाया था. इस आरोप के चलते उनका जेंडर टेस्ट करवाया गया. आखिर में वे इस टेस्ट को पास करके पूर्ण रूप से स्त्री घोषित हुईं. अपने चेहरे के पुरुष लुक के बारे में उनका कहना है, ‘प्रैक्टिस के दौरान टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के इंजेक्शन लेने के कारण ऐसा हो गया है. हमारे कोच बेहतर प्रदर्शन के लिए हमें इस हार्मोन के इंजेक्शन लेने की सलाह देते थे.’
उड़ीसा की दुती चांद भारत की तीसरी ऐसी धाविका हैं जिन्होंने ‘जेंडर टेस्ट’ का दंश झेला. वे दूसरी ऐसी भारतीय महिला धाविका हैं जिनको इस परीक्षण का खामियाजा भी भुगतना पड़ा! विदेश की भी कई धाविकाएं ‘जेंडर टेस्ट‘ का सामना कर चुकी हैं. दक्षिण अफ्रीका की कास्टर सेमेन्या से उनके वे सारे पदक इसी टेस्ट के कारण छीन लिए गए थे जो उन्होंने 2008 के कॉमनवेल्थ खेलों में जीते थे.
यह खेलों में लिंगभेद का एक अलग ही चरम रूप है जो कि किसी स्त्री को प्रकृति से मिले फायदे पर सवाल उठाता है.
यह ‘जेंडर टेस्ट’ कई तरह के सवाल खड़े करता है. पहला, क्या अच्छे प्रदर्शन में धाविका का अपना कोई प्रयास नहीं है? क्या सारी सफलता सिर्फ हार्मोन के बढ़े स्तर का ही परिणाम है? दूसरा, यदि किसी के शरीर में कुछ ऐसा हो, मसलन उसके पैरों की बनावट या लंबाई, जो दौड़ने में मददगार हो तब तो उस पर कोई सवाल उठाए नहीं जाते? फिर प्रकृति द्वारा दिए गए किसी हार्मोन की वजह से किसी महिला खिलाड़ी का पूरा वजूद सवालों के घेरे में क्यों होना चाहिए?
तीसरा, प्रकृति हर जगह सिर्फ सकारात्मक रूप से ही मेहरबान नहीं होती. कभी ऐसा भी तो कुछ होता होगा कि किसी अन्य कुदरती कारण के चलते कोई धाविका अन्य प्रतियोगियों की अपेक्षा कम अच्छा प्रदर्शन करने की स्थिति में होती हो. लेकिन तब उसके साथ कोई असामान्य व्यवहार नहीं किया जाता. फिर हार्मोन की अधिकता के कारण किसी धाविका का अन्य धाविकाओं की अपेक्षा अच्छा प्रदर्शन करना क्यों कटघरे में है? चौथा, हमारे सामने ऐसे कितने बच्चों और युवाओं के उदाहरण हैं जो कि असामान्य रूप से प्रतिभाशाली होने के कारण समय से पहले किसी खास पद, या जगह पर पहुंच गए. क्या हमने कभी उनकी प्रकृति-प्रदत्त प्रतिभा को यह कहकर नकारा या उन्हें प्रतियोगिता से बाहर किया कि इस वजह से अन्य प्रतियोगी पिछड़ जाएंगे? नहीं न?
साफ है कि प्राकृतिक रूप से मिले फायदे को दूसरी जगहों कटघरे में खड़ा नहीं किया जाता. तो फिर स्त्री धावकों को ही क्यों प्राकृतिक लाभ लेने से वंचित किया जा रहा है? न सिर्फ उनकी प्रतिभा पर सवाल खड़ा किया जा रहा है या उन्हें उनके क्षेत्र से ही खदेड़ा जा रहा है, बल्कि उनके अस्तित्व और अस्मिता पर भी खतरनाक चोट की जा रही है! किसी धाविका से यह कहना कि वह स्त्री तो है, लेकिन उसके स्त्रीत्व में कहीं खोट है जिस कारण वह स्त्री वर्ग में नहीं जा सकती, यह अपने आप में उसके लिए एक यातना जैसा है.
खेलों में लिंगभेद के मुददे पर सक्रिय रहने वाली शोधार्थी डॉ पयोशिनी मित्रा की सबसे पहली और कड़ी आपत्ति तो इस टेस्ट के नाम पर ही है. वे कहती हैं, ‘इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बुरा हिस्सा है इसे जेंडर या सेक्स टेस्ट कहना. यह कहना उन्हें अपमानित करना है. क्योंकि यहां परीक्षण इस बात का नहीं हो रहा कि वे स्त्री हैं या पुरुष, बल्कि इस बात का हो रहा है कि वे स्त्री वर्ग से खेल प्रतिस्पर्धा में भाग ले सकती हैं या नहीं?... इसमें कुछ भी शर्म महसूस करने वाला नहीं है, वे वही हैं जो कि वे प्राकृतिक रूप से हैं!’
यह खेलों में लिंगभेद का एक अलग ही चरम रूप है जो कि किसी स्त्री को प्रकृति से मिले फायदे पर सवाल उठाता है. ‘जेंडर या सेक्स टेस्ट’ अपनेआप में बेहद अपमानजनक और गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है. जाहिर है किसी भी धाविका को बचपन में यह नहीं पता होगा कि उसके शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा ज्यादा है जिसका फायदा उसे दौड़ने के क्षेत्र में मिल सकता है और इसलिए उसने यह क्षेत्र चुन लिया. यह महज इत्तेफाक है कि वे उस क्षेत्र में गईं जहां उन्हें इसका फायदा मिल सकता था लेकिन फायदा लेना तो दूर, उन्हें इसका भयंकर खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. धाविकाओं के ये ‘हार्मोन टेस्ट’ न सिर्फ उन्हें उनके क्षेत्र से बेदखल कर रहे हैं, बल्कि उनके और उनके परिवार के सामाजिक जीवन को तबाह कर रहे हैं. ये ‘टेस्ट‘ न सिर्फ धाविकाओं की प्रतिभा और कड़ी मेहनत पर सवाल खड़ा करते हैं बल्कि ये उनके जीवन पर एक कलंक भी हैं जो आसानी से नहीं मिटते!
(तीन मार्च 2015 को प्रकाशित इस लेख को 28 जुलाई 2015 को संपादित किया गया है)