Inside story 1
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आम आदमी पार्टी में जो हुआ वह होना ही था. उसे न केजरीवाल रोक सकते थे, न प्रशांत भूषण और न ही योगेंद्र यादव.
आम आदमी पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता जानते हैं कि योगेंद्र यादव और अरविंद केजरीवाल में पिछले दिनों दोस्ती तक बची नहीं रह गई थी. दोनों के बीच बातचीत तक बंद थी. अगर सच कहें तो यह महत्वाकांक्षा, अविश्वास, और साजिश का क्लाइमेक्स है.
क्या योगेंद्र की महत्वाकांक्षा वजह है?
जब आम आदमी पार्टी बनी तब कम से कम योगेंद्र यादव खुद को केजरीवाल के बराबर समझते थे. फिर केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए और योगेंद्र यादव का हरियाणा का मुख्यमंत्री बनने का सपना टूट गया. केजरीवाल का कद जितना बढ़ता गया, योगेंद्र उनके मुकाबले नेपथ्य में जाने लगे. नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी दो नेताओं के कैंपों में बंटने लगी. वैसे कहा जा सकता है कि पार्टी में केजरीवाल का अपना कोई कैंप नहीं था. उनकी तो पूरी पार्टी ही थी जिसमें योगेंद्र यादव अपना कैंप बना रहे थे. पिछले लोकसभा चुनाव से पहले योगेंद्र यादव पार्टी में भारी पड़े. केजरीवाल के लाख अनिच्छा जताने के बावजूद पार्टी चार सौ से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ी और बुरी तरह हारी. योगेंद्र यादव की तो ज़मानत तक जब्त हो गई. इस फैसले से उनकी चाणक्य वाली छवि को भी धक्का लगा. और केजरीवाल ने यह साबित कर दिया कि वे सियासत में भले नए हों लेकिन रणनीति के मामले में पक्के हैं. आम आदमी पार्टी में ज्यादातर लोगों को लगा कि केजरीवाल का फैसला मानते तो कम से कम दिल्ली में लोकसभा चुनाव जीत जाते.
वैसे कहा जा सकता है कि पार्टी में केजरीवाल का अपना कोई कैंप नहीं था. उनकी तो पूरी पार्टी ही थी जिसमें योगेंद्र यादव अपना कैंप बना रहे थे.
अब 'आप' में अविश्वास हावी
वैसे तो यह किसी पार्टी में मुमकिन नहीं कि उसके सभी बड़े नेताओं को एक दूसरे पर भरोसा हो. लेकिन लोगों को लगता था, आम आदमी पार्टी अलग होगी. यहां मतभेद होगा, मनभेद नहीं. जब मौका आया तो इस परीक्षा में आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बुरी तरह फेल हो गया. तय हुआ था कि केजरीवाल पार्टी का चेहरा बनेंगे और योगेंद्र यादव चाणक्य. लेकिन यहां न चंद्रगुप्त को चाणक्य पर भरोसा था. न ही चाणक्य को चंद्रगुप्त पर. कैमरे के सामने मीठा बोलने वाले योगेंद्र यादव को केजरीवाल कैंप के नेता मीठी छुरी जैसे नामों से बुलाते थे. इस अविश्वास की कमी की वजह से केजरीवाल और योगेंद्र यादव में गलतफहमी हुई और वे दूसरों के कहने पर बढ़े. दिल्ली चुनाव के वक्त योगेंद्र यादव और केजरीवाल के बीच संवाद सिर्फ नमस्ते तक रह गया था. योगेंद्र यादव ने रैलियां भी कम की. दिल्ली का चुनाव केजरीवाल ने अपनी रणनीति से लड़ा और शानदार जीत दर्ज की.
क्या नेता साजिश करने लगे थे?
केजरीवाल का कैंप वैसे नेताओं का है जो छोटे-छोटे शहरों से आए हैं. यह मूलत: एनजीओ चलाने वालों का जमावड़ा हैं. वे संगठन खड़ा करना जानते हैं. मेहनत करने की आदत है. लेकिन खुद को अभिव्यक्त करने के मामले में योगेंद्र यादव जैसी महारत नहीं है. इनमें योगेंद्र यादव जैसा चिंतक कोई नहीं. ये समाज की समस्या तो पकड़ सकते हैं लेकिन उस समस्या को बौदि्धक स्तर पर समझने-समझाने के लिए इन्हें योगेंद्र यादव की जरूरत थी. दोनों को साथ मिलकर काम करने की जरूरत थी. लेकिन पिछले कुछ महीनों से हो उल्टा ही रहा था. दोनों कैंपों की मीडिया के लोगों से दोस्ती थी. कई पत्रकार तो खुद आप के नेता हैं. कुछ ऐसे भी हैं जिनकी कई टीवी चैनलों के संपादकों से बातचीत होती थी. इसके चलते दोनों ही कैंपों के कई नेता अखबारों में खबरें प्लांट करवाने में एक्सपर्ट होते जा रहे थे. नुकसान पार्टी का हो रहा था. हद तो तब हो गई जब केजरीवाल विरोधी गुट ने 'आवाम' नाम के संगठन को फंड की अंदर की खबर दे दी. उस चेक के बारे में भी बता दिया जो आवाम ने प्रेस कांफ्रेंस में दिखाया. हालत ऐसी थी कि केजरीवाल के करीबी को पत्रकार का फोन रिकॉर्ड करना पड़ा.
यूं तो सच्चाई यह है कि आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े नेता आज केजरीवाल ही हैं. यह बात आम आदमी पार्टी के सभी नेताओं को मान लेनी चाहिए. योगेंद्र यादव ने यह बात मानने में बहुत देर कर दी. यह वैसा ही है जैसे एक साथ करियर की शुरुआत करने वाले दो दोस्तों में एक आईएस बन जाए और दूसरा फेल हो जाए. यहां एक साथी सीएम बन गया और दूसरा पीएसी का सदस्य भी नहीं रह पाया.