हमारे देश की बुराइयों की बातें अगर कोई और कर देता है तो हम अचानक ही बेहद संवेदनशील हो जाते हैं. लेकिन 21वीं सदी के हिंदुस्तान की एक सच्चाई यही है.
यहां एक दिन में कम से से कम 22 महिलाओं की दहेज के लिए हत्या होती है और हर उम्र की करीब 92 महिलाएं प्रतिदिन बलात्कार की शिकार होती हैं. चूंकि यह आलेख हिंदी में है इसलिए अपने देश की नाक देश के बाहर न कटने देने का ठेका लेने वाले निश्चिंत हो सकते हैं. लेकिन जो आगे लिखा है उसके बाद भी क्या वे निश्चिंत हो सकते है?

शर्म नंबर एक - बलात्कार

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2013 में बलात्कार के कुल 33707 मामले दर्ज किए गए और इस वर्ष बलात्कार के पीड़ितों की कुल संख्या 33764 थी. पीड़ितों की संख्या मामलों से ज्यादा इसलिए कि कुछ केसों में पीड़ित एक से ज्यादा रहे होंगे. इससे पिछले साल यानी 2012 में बलात्कार के दर्ज मामलों का यह आंकड़ा 24923 था और उससे पहले 24206. यानी कि पिछले सालों में बलात्कार के मामलों में लगातार वृद्धि होती रही है. इस हिसाब से देखा जाए तो वर्ष 2014 में यह शर्मनाक आंकड़ा प्रतिदिन के 22 से कुछ ऊपर तो पहुंच ही चुका होगा. यानी कि हमारे देश में प्रति घंटे एक के हिसाब से बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम दिया जा रहा है.
इस घिनौने कृत्य को करने वालों की बात करें तो 2013 में बलात्कार के आरोपियों में से 94.3 फीसदी पीड़िताओं को जानने वाले ही थे. इनमें से भी करीब 1.6 फीसदी पिता या भाई जैसे परिवार के करीबी सदस्य थे
अगर बलात्कार की पीड़िताओं की बात करें तो 2013 में इनमें से करीब 13 प्रतिशत 14 साल से कम उम्र की नादान बच्चियां थी. इस वर्ष पीड़िताओं में से 26 प्रतिशत 14-18 वर्ष की किशोरियां और 46 प्रतिशत 18-30 वर्ष की युवा महिलाएं थी. 30-50 वर्ष की बलात्कार पीड़ित महिलाओं की संख्या का आंकड़ा 2013 में 14 फीसदी था. जबकि इससे ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए यह आंकड़ा था 0.7 प्रतिशत.
2013 में दर्ज बलात्कार के मामलों में जो आरोपी थे उनमें से 94.3 फीसदी पीड़िताओं को जानने वाले ही थे. इनमें से भी करीब 1.6 फीसदी पिता या भाई जैसे परिवार के करीबी सदस्य थे तो 6.9 फीसदी अन्य रिश्तेदार. बलात्कारियों में पड़ोसियों की संख्या 32 प्रतिशत के करीब थी और अन्य 53.8 फीसदी किसी न किसी रूप में पीड़िता के जानकार थे. केवल छह प्रतिशत से भी कम आरोपी ऐसे थे जो पहले से पीड़िताओं को नहीं जानते थे.

शर्म नंबर दो - दहेज हत्या

हमारे देश में दहेज विरोधी कानून वर्ष 1961 में बना था. इसके 54 साल बाद आज भी देश में दहेज के लिए न केवल महिलाओं को तंग और प्रताड़ित किया जा रहा है बल्कि उनकी हत्या तक की जा रही है. साल 2013 के एनसीआरबी के आंकड़ों को देखें तो इस साल दहेज हत्या के कुल 8083 मामले दर्ज किए गए. हालांकि यह आंकड़ा 2012 के 8233 के मुकाबले 150 कम था लेकिन इतना भी नहीं कि इसपर थोड़ा सा भी कम दुखी हुआ जाए. वर्ष 2011 तक दहेज हत्या के मामले लगातार बढ़ रहे थे और उसके बाद इनमें मामूली सी गिरावट देखी गई है.
अगर सीधे-सीधे संख्या में बात करें तो 2013 में सबसे ज्यादा दहेज संबंधी हत्याएं उत्तर प्रदेश में - 2335 - दर्ज की गईं. इसके बाद 1182 हत्याओं के साथ शर्म का काला टीका लगता है बिहार के माथे पर. यदि इस अपराध की दर यानी एक लाख महिलाओं में दहेज संबंधी हत्या का आंकड़ा देखा जाए तब स्थिति उलट जाती है. वर्ष 2013 में बिहार में प्रति एक लाख महिलाओं में से 2.46 दहेज की भेंट चढ़ गईं और उत्तर प्रदेश में 2.36. अगर पूरे देश की बात करें तो प्रति लाख महिलाओं के बीच दर्ज दहेज हत्या के कुल मामलों की संख्या है 1.4.
समाज हमारा सभ्य है या नहीं अगर इसका फैसला ये आंकड़े नहीं कर रहे हैं तो सभ्यता की यह परिभाषा सही कैसे हो सकती है? जरूरत सोचने की नहीं कुछ करने की और जो ऐसे घिनौने काम कर रहे हैं उन्हें रोकने की है.