तमिलनाडु में 61 साल की महिला अपनी बेटी की बेटी को दुनिया में लाने का जरिया बनी.
पहले बच्चे के पेट में ही मरने और फिर सरोगेसी तकनीक के जरिये संतान सुख पाने में नाकामयाब होने के बाद 27 साल की मीराकृष्णन* सारी उम्मीदें छोड़ चुकी थीं. लेकिन फिर चमत्कार सा हुआ. उनकी 61 साल की मां ही अपनी नातिन को दुनिया में लाने का जरिया बन गईं. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से ऐन पहले यह खबर तमिलनाडु के चेन्नई से आई है.
कुछ साल पहले जब मीरा और उनके पति अपने पहले बच्चे की राह देख रहे थे तो गर्भ के सातवें महीने ही अचानक उन के सपने टूट गए. पेट में उठे भयानक दर्द के बाद डॉक्टरों ने मीरा को बताया कि बच्चा मर चुका है और दिक्कत इतनी बढ़ चुकी है कि ऑपरेशन करके उनका यूट्रस यानी गर्भाशय भी निकालना होगा. इसके बाद उनके सामान्य तरीके से मां बनने की उम्मीद खत्म हो गई थी.
पहले बच्चे के पेट में ही मरने और फिर सरोगेसी तकनीक के जरिये संतान सुख पाने का प्रयास निष्फल होने के बाद 27 साल की मीराकृष्णन* सारी उम्मीदें छोड़ चुकी थीं.
कुछ समय बाद मीरा और उनके पति ने सरोगेसी के जरिये संतान सुख पाना चाहा. इस तकनीक में पति-पत्नी के शुक्राणु और अंडाणु से विकसित भ्रूण को एक तय समय के बाद किसी तीसरी स्वस्थ महिला की कोख में रोपा जाता है. लेकिन यहां भी दुर्भाग्य ने मीरा का पीछा नहीं छोड़ा. सरोगेसी का यह प्रयास भी निष्फल रहा.
करीब आठ लाख रु और लंबा समय खर्च करने के बाद मीरा और उनके पति की उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो चुकी थीं. इसके बाद चेन्नई स्थित आकाश फर्टिलिटी सेंटर एंड हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने मीरा को सुझाया कि सरोगेसी के लिए उन्हें अपने परिवार का ही कोई सदस्य तलाशना चाहिए.
इस दौरान मीरा की मां भी वहां मौजूद थीं. उन्होंने डॉक्टरों से कहा कि अगर वे सरोगेट मदर बन सकती हों तो वे इसके लिए तैयार हैं. ऐसा मुमकिन तो था लेकिन, एक समस्या थी. उनका मासिक चक्र बंद हो चुका था जो किसी स्त्री के लिए प्रजनन की अनिवार्य शर्त है. डॉक्टरों ने उन्हें दो महीने तक वे हॉरमोन दिए जो मासिक चक्र के लिए जिम्मेदार होते हैं. मासिक चक्र बहाल होने के बाद चार महीने का भ्रूण उनकी कोख में रोपा गया. नौ महीने बाद उन्होंने ऑपरेशन के जरिये एक स्वस्थ बच्ची को जन्म ही नहीं दिया बल्कि चार महीने तक उसे दूध भी पिलाया.
हालांकि यह चमत्कार कुछ समय पहले हो चुका था लेकिन, अस्पताल ने फैसला किया कि यह खबर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस यानी आठ मार्च से ठीक पहले सार्वजनिक की जाए. अस्पताल ने इन दोनों महिलाओं को सम्मानित भी किया है.
(*बदला हुआ नाम)