मसरत आलम के बारे में कहा जाता है वह अपनी ज़ुबान से लोगों के दिलो-दिमाग में आग लगा देता है. जो काम बंदूक और बम से नहीं हो पाता, वह काम मसरत की जुबान कर देती है.
मसरत आलम 2010 में कश्मीर घाटी में हुए भारत विरोधी प्रदर्शनों का सूत्रधार और संचालक था. इस विरोध का सबसे प्रमुख तरीका पुलिस और अन्य सरकारी अमले पर पत्थरबाजी करना था. विरोध का यह तरीका कुछ-कुछ वैसा ही था जैसा फिलिस्तीन में 90 के दशक की शुरुआत में और अस्सी के दशक के अंत में इस्राइली सुरक्षा बलों के खिलाफ अपनाया गया था. इसे पहला इंतिफादा कहा जाता है. कश्मीर घाटी के भारत विरोधी प्रदर्शनों में 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे. उस समय मसरत आलम को गिरफ्तार करने में पुलिस को चार महीने लगे थे. उसके ऊपर दस लाख रुपए का इनाम रखा गया था और उसे अक्टूबर 2010 में गिरफ्तार किया गया था. अपनी गिरफ्तारी से पहले उसने खुलेआम कहा था - तुम थक जाओगे. मैं नहीं थकूंगा. इसके बाद जेल से बाहर आने से रोकने के लिए उसके ऊपर छह बार लोक सुरक्षा कानून लगाया गया. अब उसी मसरत आलम को मुफ्ती सरकार ने जेल से रिहा कर दिया है. इसकी एक वजह शायद यह भी है कि भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलाने के बावजूद मुफ्ती मोहम्मद सईद उससे अलग दिखते रहना चाहते हैं. आने वाले समय में ऐसे ही कुछ अन्य लोगों को और छोड़ा जा सकता है.
इसकी एक वजह शायद यह भी है कि भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलाने के बावजूद मुफ्ती मोहम्मद सईद उससे अलग दिखते रहना चाहते है.
उसका पूरा नाम मसरत आलम बट है. वह तीन लोगों की तिकड़ी में शामिल था - मसरत आलम, आसिया अंदराबी और आशिक हुसैन फकतू. 2008 में मसरत आलम और असिया अंदराबी ने मिलकर घाटी के बच्चों और युवाओं को पत्थर फेंकने की ट्रेनिंग दी. लड़कों को यह ट्रेनिंग मसरत और उसका संगठन देता था और लड़कियों को यह ट्रेनिंग आसिया और उसके संगठन दुखतरान-ए-मिल्लत से मिलती थी. अंदराबी का पति आशिक हुसैन फकतू हत्या के अपराध में उम्र कैद की सजा काट रहा है. फकतू के बारे में कहा जाता है कि जेल में भी उसका जबर्दस्त प्रभाव है. वह वहां लड़कों की क्लास लगाता है. जेल में रहते-रहते ही उसने डॉक्टरेट भी कर ली है. वहीं से वह जमियत-उल-मुजाहिदीन और फरज़ान-ए-मिल्लत नाम के संगठन भी चलाता है.
पुराने श्रीनगर के ज़ैनदार मोहल्ले में पले-बढ़े 44 वर्षीय मसरत के बारे में कहा जाता है कि वह कैलेंडर पर पहले से ही तारीखें काट देता था, पहले ही तय कर देता था कि आने वाले दिनों में इन-इन तारीखों पर कश्मीर बंद रहेगा. वहां हड़ताल होगी. अशांति फैलेगी. पत्थर चलेंगे. इसके बाद यह कलैंडर लोगों में बांट दिया जाता था. श्रीनगर के नामी सेसिल अर्ले बिस्को स्कूल और फिर कुछ समय प्रताप कॉलेज में पढाई करने के बाद मसरत आलम 1989 में अलगाववादी गुट हिजबुल्लाह में शामिल हो गया. 1990 में उसे पहली बार बीएसएफ ने गिरफ्तार किया था. वह करीब सात साल जेल में रहा. बाहर आने के बाद मसरत ने कपड़े की दुकान की और  विज्ञान से स्नातक की पढ़ाई भी पूरी की. लेकिन 1999 में वह एक बार फिर से सक्रिय हो गया. उसने मुस्लिम लीग नाम की पार्टी बनाई और पुरानी मिली-जुली हुर्रियत में शामिल हो गया. अब वह बार-बार जेल जाने लगा था. अब तक वह सत्रह बार जेल जा चुका है.
वह तीन लोगों की तिकड़ी में शामिल था - मसरत आलम, आसिया अंदराबी और आशिक हुसैन फकतू. 2008 में मसरत आलम और असिया अंदराबी ने मिलकर घाटी के बच्चों और युवाओं को पत्थर फेंकने की ट्रेनिंग दी.
हुर्रियत में मसरत आलम को अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी की सरपरस्ती मिली. जब साल 2003 में हुर्रियत बंटी तो मसरत गिलानी के गुट में शामिल हो गया. उस खेमे का महासचिव तक बन गया. हुर्रियत के इस कट्टरपंथी धड़े में अब उसे गिलानी का उत्तराधिकारी माना जाता है. यहीं उसकी जान-पहचान असिया अंदराबी से बढी. आसिया का संगठन दुख्तरान-ए-मिल्लत भी हुर्रियत के गिलानी धड़े का हिस्सा है.
सरकार बनते ही जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जो दांव खेला है उससे भाजपा हैरान है. नरेंद्र मोदी भी. उन्होंने ऐसी सरकार बनाई, जिसने आते ही अलगाववादी की रिहाई कर दी. मुफ्ती मोहम्मद सईद अपने एजेंडे पर चल रहे हैं. मोदी सरकार और भाजपा इस उलझन में हैं कि मुफ्ती का एजेंडा चलाएं या अपना और अपने मुताबिक देश का.
1989 में मुफ्ती सईद देश के गृहमंत्री थे, उन्होंने अपनी बेटी रुबैय्या सईद के लिए पांच आतंकवादियों को जेल से छोड़ा था. इसके बाद कश्मीर में अलगाववाद की आग भड़क गई. मुफ्ती की बेटी का जिस मुश्ताक ज़रगर नाम के आतंकवादी ने अपहरण किया था, उसे 1999 में वाजपेयी सरकार ने आईसी814 के मुसाफिरों की जान के बदले छोड़ दिया. ज़रगर ने पाकिस्तान में बैठकर कई बार भारत पर हमले किए. अब मुफ्ती फिर सत्ता में हैं. देश की नहीं तो प्रदेश की. प्रदेश के गृहमंत्री भी वही हैं. उन्होंने फिर ज़ख्म पर मरहम लगाने की 'हीलिंग टच पॉलिसी' शुरू कर दी है. कई लोगों को अंदेशा है कि उनके पुराने निर्णयों की तरह इस बार भी देश को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.