विपक्षी पार्टियों की रणनीति है कि इस बिल को सिलेक्ट कमिटी में भेजने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाए.
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कल लोकसभा में भू अधिग्रहण बिल पारित हो गया. इसे अब राज्यसभा में पेश होना है लेकिन यहां एनडीए अल्पमत में है. कहा जा रहा है कि उसके लिए फिलहाल संयुक्त सत्र बुलाकर बिल को पास करवा पाना आसान नहीं होगा.
नियमों के अनुसार यदि बिल एक सदन में पारित होता है और दूसरे में निरस्त, तभी सरकार संयुक्त सत्र बुला सकती है
इससे पहले सरकार ने कल लोकसभा में भू अधिग्रहण बिल पर कुछ संशोधन स्वीकार कर लिए. इस बिल को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार  के लिए एक बड़ी परीक्षा माना जा रहा था. इसकी एक वजह यह भी थी कि एनडीए के सहयोगी दलों - शिरोमणि अकाली दल, लोकजन शक्ति पार्टी, शिवसेना और स्वाभिमानी पक्ष को भी बिल के कुछ प्रावधानों पर आपत्तियां थीं. लेकिन मंगलवार को लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने के पहले संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू, वित्त मंत्री अरुण जेटली और ग्रामीण विकास मंत्री बीरेंदर सिंह ने इन सभी दलों के नेताओं के साथ बैठक की और उन्हें बिल के पक्ष में मतदान के लिए मनाने की पूरी कोशिश की. हालांकि इनमें भी आखिरकार शिवसेना और स्वाभिमानी पक्ष से सांसदों ने बिल के पक्ष वोटिंग नहीं की और वे सदन से अनुपस्थित रहे.
लोकसभा में ध्वनिमत से पारित इस नए बिल में निजी अधिग्रहण के लिए 80 प्रतिशत किसानों की अनिवार्य सहमति और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनशिप के लिए 70 प्रतिशत किसानों की सहमति का प्रावधान हटा दिया गया है. बिल में अब सामाजिक मूल्यांकन का प्रावधान भी नहीं है. मुख्यरूप से यही वे मुद्दे हैं जिनपर विपक्षी पार्टियां संशोधन की मांग कर रही थीं.
अब यह बिल राज्य सभा में पेश होना है लेकिन एनडीए सरकार के लिए यहां बिल पारित करवाना बहुत मुश्किल है. संसद के उच्च सदन में विपक्ष बहुमत में है. विश्लेषकों का मानना है कि भले ही सरकार ने लोकसभा में बिल आसानी से पारित करवा लिया लेकिन राज्य सभा में विपक्ष की पूरी कोशिश होगी कि इसे सिलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया जाए. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने पहले ही संकेत दे दिया है कि वे सरकार पर दबाव डालेंगी कि बिल को सिलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए. यदि ऐसा होता है तो सरकार दोनों सदनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल का पारित नहीं करवा पाएगी. नियमों के अनुसार यदि बिल एक सदन में पारित होता है और दूसरे में निरस्त हो जाता है तभी वह संयुक्त सत्र बुला सकती है.
नीतीश सरकार के बहुमत और जीतनराम मांझी पर आज फैसला होगा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आज विधानसभा में बहुमत साबित करना है. जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को फिलहाल लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस और सीपीआई का समर्थन हासिल है.
आंकड़ों के लिहाज से नीतीश कुमार के लिए विधानसभा में बहुमत साबित करने में कोई दिक्कत नहीं है. बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं लेकिन इस समय 10 सीटें खाली हैं. यानी सरकार को बहुमत के लिए 233 विधायकों में से 117 के समर्थन की जरूरत होगी. फिलहाल जदयू (111),राजद (24) और कांग्रेस (5) के विधायकों को ही मिलाकर बहुमत का आंकड़ा पूरा हो रहा है. वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा के सदन में 87 सदस्य हैं. सरकार द्वारा बहुमत साबित करने से इतर इस पूरी कवायद की सबसे खास बात यह होगी कि इससे पूर्व मुख्यमंत्री व जदयू से निष्कासित जीतनराम मांझी और उनका साथ दे रहे नौ विधायकों का भविष्य भी तय हो जाएगा. जदयू ने व्हिप जारी करके अपने सभी विधायकों को सरकार के पक्ष में मतदान करने को कहा है. यदि ये विधायक ऐसा नहीं करते हैं तो उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो सकती है.
सीपीआई (एम) की यूथ विंग ‘गोमांस उत्सव’ आयोजित करेगी सीपीआई (एम) की युवा शाखा डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (डीवाईएफआई) ने घोषणा की है कि वह महाराष्ट्र में गोमांस पर लगे प्रतिबंध के विरोध में पूरे देश में गोमांस उत्सव आयोजित करेगी. डीवाईएफआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा सदस्य एमबी राजेश ने एक अखबार से बात करते हुए कहा कि है फिलहाल उन्होंने इसके लिए कोई तारीख निश्चित नहीं की है लेकिन यह अप्रैल से शुरू होना है. पिछले दिनों मीडिया में आई खबरों में कहा गया था कि केरल में पहले की एक ऐसा आयोजन शुरू हो चुका है. हालांकि माना जा रहा है कि डीवाईएफआई ने यह घोषणा केरल को ही ध्यान में रखकर की है और वह इस आयोजन के जरिए राज्य के अल्पसंख्यक समुदाय में पार्टी की पकड़ मजबूत करना चाहता है.