Dimapur Killing
Dimapur Killing
नागालैंड पुलिस ने दीमापुर हत्याकांड की अगुआई करने वालों की पहचान तो कर ली है, लेकिन पहले जो नहीं किया उसके चलते विभिन्न सुरक्षा बलों की भूमिका गहरे सवालों के घेरे में है.
नागालैंड के दीमापुर में बलात्कार के आरोपी एक युवक की भीड़ द्वारा हत्या किए जाने के मामले में अब तक गिरफ्तार किए गये 43 लोगों की पहचान कर ली गई है. इन लोगों में शिक्षक, एयरलाइन कर्मचारी, पूर्व सैनिक, बेरोजगार युवा और दुकानदार जैसे लगभग हर तबके के लोग शामिल हैं. नागालेंड पुलिस ने भीड़ में शामिल चश्मदीदों तथा अन्य लोगों द्वारा बनाई गई वीडियो रिकार्डिंग्स से इन लोगों की पहचान की है. पुलिस का कहना है कि इनके आधार पर चार्जशीट की कार्रवाही को आगे बढाया जाएगा.
दीमापुर हत्याकांड को लेकर अब तक की अपनी छानबीन में पुलिस ने जितनी भी वीडियो रिकार्डिंग जुटाई हैं, उनमें इस वीभत्स घटना का सिलसिलेवार ब्यौरा मौजूद है. इन रिकार्डिंग्स में दीमापुर सेंट्रल जेल के गेट से उस युवक को पहले घसीटकर बाहर लाते हुए दिखाया गया है. इसके बाद एक दूसरी रिकार्डिंग में उस युवक को मोटरसाइकिल पर बांधते हुए दिखाया गया है. फिर अगले दो घंटे तक उसे शहरभर में घुमाये जाने और पीट-पीट कर मार देने के बाद शहर के बीचों-बीच लटका देने का पूरा घटनाक्रम इन रिकार्डिंग्स में मौजूद है.
पांच मार्च को दीमापुर के लगभग सभी अखबारो में उस रैली का जिक्र किया गया था जिसमें आरोपी को सबक सिखाने की बातें सामने आई आई थीं
इनके आधार पर पुलिस ने समूची भीड़ की अगुआई कर रही लगभग 25 लोगों की एक 'कोर टीम' की पहचान की है. इन लोगों में बीए, बी-कॉम और राजनीति विज्ञान की पढाई कर रहे कुछ युवाओं के आलावा एक आई टी छात्र, एक सब्जी विक्रेता, एक ऑटो चालक, एक दुकानदार, और दो अध्यापक भी शामिल हैं. पुलिस का कहना है कि इन 25 लोगों ने इस घटना को अंजाम देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. पुलिस का कहना है कि नागा युवती के साथ बलात्कार किए जाने की बात सामने आने के बाद जिस तरह का माहौल तैयार किया गया, उसके चलते इस घटना का राजनीतिकरण हो गया.
पुलिस ने इसके लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चल रहे दो ब्लॉग्स, नागा ब्लॉग तथा नागा स्पीयर का हवाला देते हुए कहा है कि 23 फरवरी को हुई बलात्कार की घटना सामने आने के बाद इसके विरोध में पांच मार्च को एक रैली का आयोजन किया गया था. इस रैली में शामिल होने वाले लोग लगातार इन ब्लॉगों पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे थे. ये प्रतिक्रियाएं काफी खतरनाक थीं, और यहीं से लोगों के बीच यह राय बनी कि आरोपी युवक को उनके हवाले कर दिया जाना चाहिए.
हालांकि इस सबके बावजूद इस हत्याकांड को लेकर पुलिस की भूमिका पर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जब सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए इस तरह का अभियान चलाया जा रहा था तो पुलिस को इसकी भनक क्यों नहीं लग सकी. इसके अलावा पुलिस यह क्यों नहीं मालूम कर सकी कि दस हजार लोगों की उन्मादी भीड़ जेल के अंदर से एक आरोपी को जबरन ले जाने के लिए तैयार हो चुकी है. यहां तक कि जब वह भीड़ उस युवक को जेल से बाहर लाने में कामयाब हो गई और उसके बाद उसे निर्वस्त्र करके शहर भर में घुमा रही थी तब भी पुलिस कुछ क्यों नहीं कर सकी.
सवाल यह भी है कि जेल के अंदर तमाम कैदियों के बीच भीड़ ने 25 साल के उस आरोपी युवक को बिना प्रशासनिक सहयोग के कैसे पहचान लिया?
पुलिस के अलावा सीआरपीएफ की भूमिका भी इसको लेकर संदेह के घेरे में है. क्योंकि यह भीड़ जेल के जिन तीन गेटों से अंदर दाखिल हुई उनपर इसी सुरक्षा बल के जवान तैनात थे. हालांकि राज्य के गृह विभाग ने इनका बचाव करते हुए सफाई दी है कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ में सबसे ज्यादा संख्या में स्कूली छात्र शामिल थे, जिसके चलते सुरक्षा बलों को अपने कदम पीछे हटाने पड़े थे.
इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक मिलीभगत की ओर इशारा करने वाला एक बड़ा सवाल यह भी है कि जेल के अंदर तमाम कैदियों के बीच भीड़ ने 25 साल के उस आरोपी युवक को बिना प्रशासनिक सहयोग के कैसे पहचान लिया? इस बारे में प्रशासन ने सफाई तो दी है, लेकिन वह हैरान करने वाली प्रतीत होती है. प्रशासन का कहना है कि उसने आरोपी युवक को भीड़ से छुपाने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन उसे शौचालय से पकड़ लिया गया.
सूत्रों की मानें तो राज्य के ग़ह सचिव ने इस पूरे घटनाक्रम के लिए पुलिस के साथ साथ वहां के जिला प्रशासन को भी जिम्मेदार ठहराया है. अपनी रिपोर्ट में उन्होंने साफ तौर पर इस बात का जिक्र किया है कि पुलिस के खुफिया सूत्रों को इस पूरे घटनाक्रम का अंदेशा होने के बावजूद यहां का जिला प्रसाशन इसे रोक पाने में बुरी तरह नाकाम रहा. पुलिस की भूमिका को लेकर संदेह इस लिए भी बढता है कि पांच मार्च को दीमापुर के लगभग सभी अखबारो में उस रैली का जिक्र किया गया था जिसमें आरोपी को सबक सिखाने की बातें सामने आई आई थीं.
इस पूरे मामले में राज्य सरकार ने जो रिपोर्ट केंद्र को सौंपी है, उसमें उसने स्वीकार किया है कि भीड़ द्वारा जिस युवक को निर्ममता से मारा गया उसने लड़की के साथ बलात्कार नहीं किया था, बल्कि उन दोनों के बीच आपसी सहमति से संबंध बने थे. ऐसे में यह मामला अब खुद राज्य सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. क्योंकि उसकी लापरवाही के चलते ही 25 सल के एक युवक को उस अपराध के लिए अपनी जान गवानीं पड़ी जो उसने किया ही नहीं था.