फैजाबाद शहर के सिविल लाइन्स इलाके में स्थित ‘राम भवन’ के बारे में 16 सितंबर 1985 से पहले न के बराबर लोग ही जानते थे. उस मकान में लंबे समय से साधु जैसे लगने वाले एक बुजुर्ग रहते थे जिनके बारे में स्थानीय निवासियों को कुछ खास जानकारी नहीं थी. जिस दिन उनकी मृत्यु हुई और अंतिम संस्कार के बाद उनके कमरे को खंगाला गया तो कई लोगों की आंखें खुली-की-खुली रह गईं. उनके कमरे से लोगों को कई ऐसी चीजें मिलीं जिनका ताल्लुक सीधे तौर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ता था. इनमें नेताजी की पारिवारिक तस्वीरों से लेकर आजाद हिंद फौज की वर्दी, जर्मन, जापानी तथा अंग्रेजी साहित्य की कई किताबें और नेताजी की मौत से जुड़े समाचार पत्रों की कतरनें शामिल थीं. इसके अलावा वहां से और भी कई ऐसे दस्तावेज बरामद हुए जिनके आधार पर एक बड़े वर्ग ने दावा किया कि वे कोई आम बुजुर्ग नहीं बल्कि खुद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे.

इस दावे को सही साबित नहीं किया जा सका बल्कि इसने नेताजी की गुमनामी की गुत्थी को एक बार फिर से कुछ और उलझा दिया. इससे पहले बहुत से लोग एक विमान हादसे को उनकी मृत्यु का कारण मानते थे तो कइयों को लगता था कि वे किसी बड़ी राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं. कुल मिलाकर नेताजी को लेकर अब तक अलग-अलग तरह की इतनी सारी बातें सामने आ चुकी हैं, लेकिन उनके गायब होने का रहस्य आज भी जस का तस बना हुआ है.

हवाई दुर्घटना में मृत्यु

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की गुमशुदगी के मामले में यह अब तक का सबसे मजबूत तर्क माना जाता है. इसके मुताबिक आज से सत्तर साल पहले 18 अगस्त 1945 को ताइवान के नजदीक हुई एक हवाई दुर्घटना में नेताजी की मौत हो गई थी. भारत सरकार तथा इतिहास की कुछ किताबें भी इसी हवाई दुर्घटना को नेता जी की मुत्यु का कारण बताती हैं. बताया जाता है नेता जी को अंतिम बार टोक्यो हवाई अड्डे पर ही देखा गया था और वे वहीं से उस विमान में बैठे थे.

इस घटना के संबंध में दो अलग-अलग ऐसी बातें भी सामने आईं जिनके चलते इसकी सत्यता पर संदेह खड़ा हो गया. इनमें पहली बात तो यह थी कि नेता जी का शव कहीं से भी बरामद नहीं हो सका और दूसरी यह कि कई लोगों के मुताबिक उस दिन ताइवान के आस-पास कोई हवाई दुर्घटना घटी ही नहीं थी. खुद ताइवान सरकार के दस्तावेजों में भी उस दिन हुई किसी हवाई दुर्घटना का जिक्र नहीं है. ऐसे में कई लोग आज भी उनकी मौत की वजह कुछ और मानते हैं. नेताजी के जीवन पर ‘मृत्यु से वापसी, नेताजी का रहस्य’ नाम की पुस्तक लिखने वाले अनुज धर भी यही मानते हैं कि उऩकी मौत 18 अगस्त 1945 को नहीं हुई थी.

हालांकि नेता जी की बेटी अनीता बोस फाफ विमान दुर्घटना वाली बात से इत्तेफाक रखते हुए इसे ही उनकी मौत का कारण बताती हैं. जर्मनी में रहने वाली 74 वर्षीय अनीता, नेताजी की ऑस्ट्रियन पत्नी एमिली शेंकल से हुई उनकी इकलौती संतान हैं.

लेकिन अनीता के ऐसा मानने के बाद भी इस बात पर संदेह करने के कई कारण हैं. एक खबर के अनुसार उस कथित विमान हादसे के समय नेताजी के साथ मौजूद कर्नल हबीबुर रहमान ने इस बारे में आजाद हिंद सरकार के सूचना मंत्री एसए नैयर, रूसी तथा अमेरिकी जासूसों और शाहनवाज समिति के सामने अलग-अलग बयान दिए थे, जिनके चलते भी उस हादसे की सत्यता पर सवाल खड़े होते हैं.

राजनीतिक साजिश के शिकार

कई लोग इस बात को भी मानते हैं कि नेता जी को किसी बड़ी राजनीतिक साजिश के तहत मारा गया था. राजनीतिक साजिश को नेता जी की मौत का कारण बताने वाले लोग दो अलग-अलग संभावनाओं की तरफ इशारा करते हैं. पहली संभावना के मुताबिक कुछ लोग मानते हैं कि उन्हें ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्त एजेंटों की सहायता से मारा था, जबकि दूसरी संभावना के मुताबिक कुछ लोग नेता जी की मौत में रूस का हाथ देखते हैं.

गुमनामी बाबा (भगवन) की कहानी

इस रिपोर्ट की शुरुआत में फैजाबाद के ‘राम भवन’ में रहने वाले जिन बुजुर्ग शख्स का जिक्र किया गया है, वे ही गुमनामी बाबा और भगवन जी के नाम से प्रसिद्ध हैं. उनके पास से मिले नेताजी से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर कई लोग आज भी यही मानते हैं कि वे नेता जी ही थे और भारत की आजादी के बाद जानबूझकर वेश बदल कर रह रहे थे. बताया जाता है कि वे सत्तर के दशक की शुरुआत में फैजाबाद आए थे. आजाद हिंद फौज में शामिल रहे बहुत से सैनिक और अधिकारी भी कई मौकों पर यह दावा कर चुके हैं कि नेताजी आजादी के बाद तक भी जीवित थे. इन सिपाहियों ने नेताजी से गुप्त मुलाकातों का दावा भी किया है. लेकिन फिर सवाल उठता है कि वे कभी सामने क्यों नहीं आए? इस बारे में कुछ लोग एक अजीब किस्म की दलील देते हैं. इस दलील के मुताबिक संभवत: आजादी के समय ब्रिटिश और भारत सरकार के बीच ऐसा कोई गुप्त समझौता हुआ होगा जिसमें यह शर्त रखी गई होगी कि नेताजी के वापस लौटने की सूरत में उन्हें अंग्रेजों को सौंप दिया जाएगा. ऐसे में हो सकता है कि वे इसीलिए दुनिया के सामने नहीं आए होंगे. हालांकि इस समझौते का कोई भी साक्ष्य अभी तक सामने नहीं आ सका है. लिहाजा यह तर्क भी रहस्य की श्रेणी से आगे नहीं बढ़ पाया है.

जांच समितियां और रिपोर्ट

नेता जी सुभाष चंद्र बोस की गुमशुदगी का रहस्य सुलझाने के लिए भारत सरकार अब तक तीन आयोगों का गठन कर चुकी है. इन तीनों आयोगों की रिपोर्ट सामने आने के बाद भी नेता जी की मौत को लेकर अंतिम निष्कर्ष जैसा कुछ भी हासिल नहीं हो सका है. नेता जी की मौत का पता लगाने के लिए सबसे पहले 1956 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने शाहनवाज खान के नेतृत्व में एक जांच समिति का गठन किया था. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में विमान हादसे की बात को सच बताते हुए कहा कि नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को ही हुई थी. लेकिन इस समिति में बतौर सदस्य शामिल रहे नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस ने इस रिपोर्ट को नकारते हुए तब आरोप लगाया था कि सरकार कथित विमान हादसे को जानबूझ कर सच बताना चाहती है.

इसके बाद सरकार ने सन 1970 में न्यायमूर्ति जीडी खोसला की अध्यक्षता में एक और आयोग बनाया. इस आयोग ने अपने पूर्ववर्ती आयोग की राह पर चलते हुए विमान दुर्घटना वाली बात पर ही अपनी मुहर लगाई. लेकिन इसके बाद 1999 में उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता वाले एक सदस्यीय आयोग ने इन दोनों समितियों के उलट रिपोर्ट देते हुए विमान हादसे वाले तर्क को ही खारिज कर दिया. 2006 में सामने आई मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट में नेताजी की मौत की पुष्टि तो की गई थी, लेकिन आयोग के मुताबिक इसका कारण कुछ और था, जिसकी अलग से जांच किए जाने की जरूरत है. मुखर्जी आयोग की इस रिपोर्ट को तत्कालीन केंद्र सरकार ने खारिज कर दिया था.

फाइल लीक और विवाद

अप्रैल 2015 में इस मुद्दे पर आईबी की दो फाइलों के सार्वजनिक हो जाने के बाद विवाद खड़ा हो गया था. इन फाइलों के मुताबिक आजाद भारत में करीब दो दशक तक आईबी ने नेताजी के परिवार की जासूसी की थी. इस जासूसी का असल उद्देश्य किसी को नहीं मालूम. लेकिन अटकलें और आरोप लगाए जा रहे थे कि यह पंडित जवाहरलाल नेहरू के इशारे पर की गई थी, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं नेताजी जीवित तो नहीं हैं और अचानक सामने आकर उनके लिए चुनौती तो नहीं बन जाएंगे. इससे पहले उसी साल अपनी जासूसी होने का पता लगने के बाद से अचरज में पड़े नेताजी के परिजनों ने केंद्र सरकार से इस पूरे मामले की जांच करने की मांग की थी.

उसी साल फरवरी में आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने सूचना के अधिकार के तहत केंद्र सरकार से सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ी गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग की थी. इस पर सरकार का जवाब आया था कि इन फाइलों के सार्वजनिक होने से कुछ देशों के साथ भारत के मैत्री संबंध खराब हो सकते हैं. इस जवाब ने नेता जी की मौत को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए थे. मसलन क्या नेताजी की मौत के पीछे किसी ऐसे देश का हाथ था जिससे भारत के दोस्ताना रिश्ते हैं? भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी जैसे कई लोगों का दावा था कि यह देश रूस है. स्वामी का कहना था कि द्वितीय विश्वयुद्ध में आजाद हिंद फौज की हार के बाद जब नेताजी रूस पहुंचे तो नेहरू के कहने पर स्टालिन ने उन्हें बंदी बना लिया था, जिसके बाद उन्हें साइबेरिया में फांसी दे दी गई. इस दौरान नेताजी की प्रपौत्री राज्यश्री चौधरी ने भी यही कहा था. सुब्रमण्यम स्वामी का यह भी कहना था कि नेताजी के परिजनों की जासूसी किए जाने के पीछे नेहरू का ही हाथ था. उनके मुताबिक नेहरू को स्टालिन पर यकीन नहीं था और यही वजह है कि नेताजी की मौत की सूचना मिलने के बाद भी उन्होंने उनके परिजनों की जासूसी जारी रखी.

गोपनीय फाइलें सार्वजनिक होने के बाद भी रहस्य बरकरार

इसके बाद 2015 में पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी की मौत से जुड़ी गोपनीय फाइलें सार्वजनिक कीं और 2016 में केंद्र सरकार ने. लेकिन इससे भी नेताजी की मौत का रहस्य नहीं सुलझ पाया. पश्चिम बंगाल सरकार ने जो 64 फाइलें सार्वजनिक कीं उनमें से एक के मुताबिक भारतीय खुफिया एजेंसियों को बोस के जीवित और रूस में होने का शक था. इसके बाद 2016 में केंद्र सरकार ने जो फाइलें सार्वजनिक कीं उनमें से एक में यह कहा गया कि सुभाष चंद्र बोस के 1945 और इसके बाद सोवियत संघ में ठहरने के बारे में कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है. यह बात रूसी फेडरेशन के विदेश मंत्रालय द्वारा मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास को आठ जनवरी 1992 को लिखे गए पत्र के हवाले से कही गई थी.

यानी रहस्य अभी तक अनसुलझा है.