दिल्ली पुलिस का राहुल गांधी के बारे में जानकारी जुटाना यदि जासूसी न होकर एक 'रूटीन प्रक्रिया' है तब भी वह उतना ही हास्यास्पद है.
कहते हैं कि 21 मई 1991 को तमिलनाडू के श्रीपेरंबदूर में आत्मघाती हमले में मारे गए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के क्षत-विक्षत शव की पहचान उनके जूते से ही संभव हो सकी थी. कुछ इसी तरह के तर्कों को आधार बना कर केंद्र सरकार ने दिल्ली पुलिस की उस कार्रवाही को सही करार दिया है, जिसे कांग्रेस पार्टी अपने महासचिव राहुल गांधी के खिलाफ जासूसी बता रही है. आज राज्यसभा में कांग्रेसी सांसदों के सवालों का जवाब देते हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस द्वारा राहुल गांधी के बारे में जिस तरह की पूछताछ की गई थी, वह उनकी सुरक्षा की दृष्टि से तो जरूरी थी ही, साथ ही दिल्ली पुलिस की रूटीन प्रक्रिया का हिस्सा भी थी.
लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना था कि, उन्होंने वीरप्पा मोईली और सोनिया गांधी से इस बारे में पूछा था, लेकिन दोनों ही ने अपनी ऐसी किसी भी जांच से इनकार कर कर दिया.
जेटली ने कहा कि महत्वपूर्ण शख्सियतों की सुरक्षा के संबंध में देश की सुरक्षा एजेंसियां कई तरह से जांच पड़ताल करती हैं, और यह काम हमें उनपर ही छोड़ देना चाहिए. कांग्रेस द्वारा सरकार पर लगाए जा रहे जासूसी के आरोपों का खंडन करते हुए उन्होंने कहा कि, 'ऐसा पहली बार नहीं हो रहा, बल्कि 1987 से ही दिल्ली पुलिस महत्वपूर्ण राजनीतिक शख्सियतों की सुरक्षा को लेकर इस तरह की पूछ-ताछ करती आ रही है.' अपने इस तर्क के पक्ष में अरुण जेटली ने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल विहारी वाजपेई और डा मनमोहन सिंह से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, यहां तक कि अपने खुद तक के बारे में इस तरह की पूछ-ताछ किये जाने की बात कही. जेटली का यह भी कहना था कि यदि किसी को जासूसी ही करनी होगी तो वह फॉर्म लेकर उसे भरने के लिए थोड़े ही कहेगा बल्कि ऐसा शांति से करने की कोशिश करेगा.
लेकिन उनकी इन दलीलों के बाद भी कांग्रेस के सांसद संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने राज्यसभा से वाकआउट कर दिया. कांग्रेस इस पूरे प्रकरण पर अब गृहमंत्री का बयान चाहती है. इस बीच दिल्ली पुलिस के कमिश्नर बीएस बस्सी ने भी कमोबेश वित्तमंत्री अरुण जेटली जैसी ही दलीदें देकर इसे एक रूटीन प्रक्रिया का हिस्सा बताया है.
सरकार तथा दिल्ली पुलिस भले ही इसे रुटीन प्रक्रिया बता रही हो लेकिन कांग्रेस पार्टी का अब भी यही मानना है कि इसकी आड़ लेकर राहुल गांधी की जासूसी की जा रही है. सरकार के उस दावे पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं जिसमें दूसरे महत्वपूर्ण नेताओं से भी इसी तरह की पूछताछ करने की बात कही गई है. इनमें काग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी और विभिन्न भाजपा नेताओं के अलावा वीरप्पा मोइली भी शामिल हैं. लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना था कि, उन्होंने वीरप्पा मोईली और सोनिया गांधी से इस बारे में पूछा था, लेकिन दोनों ही ने अपनी ऐसी किसी भी जांच से इनकार कर कर दिया.
इस सबके बीच दिल्ली पुलिस के दो पूर्व कमिश्नरों, बीके गुप्ता और वेद मारवाह को भी यह रूटीन जांच नहीं लगती है. एक अखबार को दिए अपने बयानों में इन दोनों पूर्व कमिश्नरों ने राहुल गांधी को लेकर दिल्ली पुलिस द्वारा अपनाए गए पूछ-ताछ के तरीके पर सवाल उठाए हैं. 2010 से 2012 तक दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रह चुके बीके गुप्ता का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में अपने अधिकारियों को ऐसी किसी भी पूछ-ताछ का आदेश नहीं दिया. इसे दिल्ली पुलिस का 'मूर्खतापूर्ण कदम बताते हुए उन्होंने कहा कि, 'सांसदों के बारे में जानकारी जुटानी ही थी तो दिल्ली पुलिस को लोकसभा सचिवालय से संपर्क करना चाहिए था.'
दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रह चुके बीके गुप्ता का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में अपने अधिकारियों को ऐसी किसी भी पूछ-ताछ का आदेश नहीं दिया
वीके गुप्ता के अलावा वेद मारवाह ने भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पूछताछ के लिए बनाए गए प्रारूप में जिस तरह के सवालों का जिक्र किया गया है, वैसा उन्होंने कभी नहीं देखा. उनका यह भी कहना था कि विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा संबंधी प्रक्रिया को रूटीन प्रक्रिया की तरह अंजाम नहीं दिया जाना चाहिए.
राहुल गांधी उन चंद राजनीतिक शख्सियतों में शामिल में जो हमेशा एसपीजी के सुरक्षा घेरे में रहते हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो उनकी सुरक्षा से संबंधित पल-पल की जानकारी केंद्र सरकार को लगातार मिलती रहती है. ऐसे में कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इस सबके बाद भी दिल्ली पुलिस को अलग से उनके बारे में पूछ-ताछ करने की क्या जरूरत पड़ गई?
इसके बाद भी यदि दिल्ली पुलिस का राहुल गांधी के बारे में पूछताछ करना जरूरी मान लिया जाए तब भी एक और मुद्दा है कि क्या यह जांच उसी हास्यास्पद तरीके से की जानी चाहिए जैसे की जा रही थी. हालांकि कई सरकारी फार्मों में जरूरी के साथ इस तरह के ऊल-जलूल सवाल भी होते हैं. लेकिन ऐसा संभवत: पहली बार हुआ है जब किसी राजनीतिक शख्सियत को लेकर इस तरह के सवाल पूछे जाने की बात सामने आई हो.
बहरहाल इस पूरे घटनाक्रम ने संसद सत्र से लापता चल रहे राहुल गांधी को चर्चा में तो ला ही दिया है साथ ही एक दिलचस्प सवाल भी छोड़ दिया है कि, यदि वे इस वक्त गलती से संसद में मौजूद होते तो इस प्रकरण पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती? वैसे कुछ लोग मजाक में यह भी कह रहे हैं कि जासूसी इस बात की होनी चाहिए कि राहुल इस वक्त हैं कहां न कि इस बात की कि राहुल की आखों का रंग कैसा है.