नरेंद्र मोदी की कैबिनेट के 27 में 11 सदस्यों ने अब तक एमपीलैड्स फंड से एक पाई खर्च नहीं की है. यही हाल लालकृष्ण आडवाणी, राहुल और सोनिया गांधी का भी है.
पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना लांच की थी जिसके तहत सासंदों को 2016 तक एक और 2019 तक तीन गांवों को आदर्श गांव बनाना था. इसके बाद 2024 तक हर साल एक के लिहाज से पांच और गांवों का विकास करना था. इसके लिए अलग से किसी राशि की व्यवस्था नहीं की गई थी बल्कि मनरेगा जैसी पहले से चल रही योजनाओं के साथ सासंद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीलैड्स) के तहत सासंदों को मिलने वाली राशि को इस्तेमाल किया जाना था.
लेकिन प्रधानमंत्री की कैबिनेट के 27 में से 11 सदस्यों ने अब तक एमपीलैड्स फंड से एक पाई के काम की भी सिफारिश नहीं की है. इन मंत्रियों में मनोहर पार्रिकर, सदानंद गौड़ा, उमा भारती, कलराज मिश्र, अनंत कुमार, अनंत गीते, हरसिमरत कौर बादल, नरेंद्र सिंह तोमर, हर्षवर्धन और राधामोहन सिंह शामिल है. यहां एक रोचक बात यह है कि ऐसा न करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 11 काबीना मंत्रियों के साथ-साथ सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाणी और संसद में कभी-कभी दिखने वाले राहुल गांधी और अभिनेत्री रेखा भी शामिल हैं.
इन मंत्रियों में मनोहर पार्रिकर, सदानंद गौड़ा, उमा भारती, कलराज मिश्र, अनंत कुमार, अनंत गीते, हरसिमरत कौर बादल, नरेंद्र सिंह तोमर, हर्षवर्धन और राधामोहन सिंह शामिल है.
सासंद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना 1993 में लांच हुई थी. इसका उद्देश्य सांसदों को एक ऐसा जरिया उपलब्ध कराना था जिससे अपने क्षेत्रों के विकास में उनकी भी भागीदारी सुनिश्चत हो सके. इसके तहत लोकसभा सदस्य अपने लोकसभा क्षेत्र में कहीं भी, राज्यसभा सदस्य अपने राज्य में कहीं भी और नामांकित सदस्य देश में कहीं भी विकास के कामों को करने की सिफारिश कर सकते हैं.
अपने शुरुआती साल में इसके तहत मिलने वाला धन मात्र पांच लाख रुपये ही था जो अगले साल - 1994 - में बढ़कर एक करोड़ हो गया. 1998 में इस राशि को बढ़ाकर दो करोड़ रुपये कर दिया गया और 2011 में पांच करोड़.
हालांकि (एमपीलैड्स) फंड अगर खर्च न हो तो अगले साल मिलने वाले धन में जुड़ जाता है. लेकिन ऐसे समय जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर देश को उनके किए ढेरों वादों का बोझ हो और जनता में इस मोर्चे पर निराशा हो, कैबिनेट मंत्रियों द्वारा इस पैसे को खर्च न करना सवाल तो खड़े करता ही है. यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि सोनिया और राहुल जैसे बड़े नेता अपने लोकसभा क्षेत्रों में विकास न होने के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं लेकिन जहां उनकी जिम्मेदारी हो वहां वे कुछ करते क्यों नहीं दिख रहे. रेखा जैसे नामांकित सदस्य भी अक्सर समय पर और सही काम न होने की शिकायत करते हैं. लेकिन अपनी बारी आने पर वे उसी कसौटी पर कई बार खरे नहीं उतरते हैं.
एक ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर देश के विकास के लिए उनके किए ढेरों वादों का बोझ हो और जनता में इस मोर्चे पर निराशा जताई जा रही हो कैबिनेट मंत्रियों द्वारा इस पैसे को खर्च न करना सवाल खड़े करता है
यहां कुछ और नामांकित और मशहूर सांसदों की बात की जाए तो रेखा की तरह और उनके ही साथ पिछले साल एमपीलैड्स फंड खर्च न करने के लिए आलोचना झेल चुके सचिन तेंदुलकर ने मुंबई के बाहरी इलाकों में क्या काम कराना है इसकी पहचान कर ली है. जावेद अख्तर ने भी ऐसा कर लिया है और हेमा मालिनी के मामले में तो मथुरा में काम की स्वीकृति भी मिल चुकी है.
एक ऐसे समय में जब देश की अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने की कोशिश की जा रही हो जितना सरकारी धन देश के मूलभूत विकास में लगे उतना ही अच्छा है. लेकिन इकनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल 25 फरवरी तक एमपीलैड्स में खर्च न होने वाला करीब 1000 करोड़ रुपया सरकार के पास ऐसे ही पड़ा है. यानी कि सीधी गणना की जाए तो औसतन करीब 200 सांसदों द्वारा इस मद में धन खर्च नहीं किया गया है.