समाज में मौजूद आवाजों की पिचों में अंतर इसमें मौजूद गैरबराबरी को दिखाता है और प्रेम के न होने या कम होने की स्थिति को भी.
'आवाज नीचे'! किसी हिन्दी फिल्म का यह डायलॉग पहली बार आवाज की पिच की तरफ ध्यान दिलाता है. यह बताता है कि किसी डायलॉग में सिर्फ शब्दों का, वाक्य का, चेहरे के हाव-भाव का ही महत्व नहीं है, बल्कि आवाज की पिच का भी बड़ा महत्व है. आवाज की ऊंची पिच को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
आवाज की ऊंची और नीची पिच बहुत कुछ तय करती है. सामने वाले की आवाज की ऊंची पिच अक्सर हमें परेशान करती है, हमें हमारी औकात याद दिलाती है. असल में आवाज की पिच सिर्फ एक आवाज भर नहीं है. वह आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शारीरिक और लैंगिक स्थिति के साथ-साथ त्वचा के रंग को भी बताती है. इसका सीधा सा मतलब यह है कि पैसे वाले, ऊंचे पद वाले, दबंग, सर्वण, गोरे रंग वाले, राजनैतिक रूप से ताकतवर लोगों की आवाज की पिच अक्सर ऊंची होती है.
काले रंग के आर्थिक रूप से कमजोर अफ्रीकी देश आज भी अपनी आवाज को सुनाने के लिए तरसते हैं? सोचिए जरा, पूरे के पूरे देश की ही आवाज अनसुनी की जा सकती है? और देश भी कोई एक नहीं, ‘देशों के बड़े समूह की आवाज‘!
हाल ही में सेन डियेगो स्टेट यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि ज्यादा ताकत वाले ऊंचे पद के लोग अक्सर ही आवाज की ऊंची पिच का इस्तेमाल करते हैं. यह शोध यूके की प्रधानमंत्री मार्गेट थ्रेचर के पद और आवाज की पिच के सबंध से प्रेरित था. कॉलेज के 161 छात्रों पर किये गये इस शोध में सामने आया कि जिन छात्रों को ज्यादा ताकत वाले बड़े ओहदे दिये गए थे उनकी आवाज की पिच औरों के मुकाबले ऊंची थी.
इस शोध के परिणामों को हम बेहद सरल और सहज तरीके से अपने आस-पास देख सकते हैं. ऑफिस के बॉस की आवाज की पिच अपने अधीनस्थों के साथ जितनी ऊंची होती है उतनी ऊंची तब नहीं रहती जब वह अपने बॉस के सामने होता है. या शिक्षक की पिच बच्चों और माता-पिता के साथ जो होती है, वह प्रिंसिपल के साथ नहीं होती. प्रिसिंपल जिस पिच और टोन में शिक्षकों से बात करती है, उस टोन में शिक्षा सचिव या शिक्षा मंत्री से बात नहीं कर सकती.
यहां तक कि आवाज की पिच चमड़ी के रंग से भी प्रभावित है! श्याम रंग वाले या काले रंग के लोगों को पूरी दुनिया में दोयम दर्जे का और अनिच्छित माना जाता रहा है. उनके रंग के कारण उनसे जो नफरत और उनकी जैसी उपेक्षा की गई, वह किसी भी इंसान की आवाज को नीचा रखने के लिए काफी है. क्या यह महज इत्तेफाक है कि काले रंग के आर्थिक रूप से कमजोर अफ्रीकी देश आज भी अपनी आवाज को सुनाने के लिए तरसते हैं? सोचिए जरा, पूरे के पूरे देश की ही आवाज अनसुनी की जा सकती है? और देश भी कोई एक नहीं, ‘देशों के बड़े समूह की आवाज‘!
इनमें से कइयों की जो आवाज हमें तेज मालूम होती है वह आक्रोश के चलते भी है. आवाज में आक्रोश असल में अति की निशानी है.
यह महज इत्तेफाक नहीं है कि जिस तरह से श्याम वर्ण के देशों की आवाजों को विश्व भर में अनसुना छोड़ा गया, उसी तरह से अपने देश में दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों, किन्नरों आदि अल्पसंख्यकों की आवाज भी एक हद तक अनसुनी ही है. इनमें से कइयों की जो आवाज हमें तेज मालूम होती है वह आक्रोश के चलते भी है. आवाज में आक्रोश असल में अति की निशानी है. चुप्पी की अति, हिंसा की अति, दबाए जाने की अति, कुचलने की अति, बुनियादी चीजों से वंचित रखे जाने की अति! जबकि आवाज की पिच सहज, सामान्य बोलचाल का हिस्सा है!
हर घर के भीतर हम बहुत सहज तरीके से देख सकते हैं कि अक्सर ही बेटियों, पत्नियों, प्रेमिकाओं, बहनों की आवाज की पिच बेटों, पतियों, प्रेमियों और भाइयों की आवाज की पिच की अपेक्षा कम होती है. अपवाद हर जगह हैं. निःसंदेह सामाजिक परिवर्तन के कारण स्त्रियों की जगह, पद, ताकत, आर्थिक स्थिति में बदलाव आ रहे हैं तो उनकी आवाज की पिच अब पहले की अपेक्षा उतनी दब्बू, नीची और सहमी हुई नहीं है जितनी कि उनकी मांओं की रही होगी.
आवाज में रोब और ऊंची पिच सिर्फ उसी व्यक्ति में आ पाते हैं जो समाज में अच्छी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक स्थिति में रह रहा हो. जिसे अपमान और अभाव का न पता हो. इसके अलावा प्रेम में डूबा व्यक्ति भी अक्सर ही ऊंची पिच का इस्तेमाल नहीं करता. इसका मतलब यह हुआ कि समाज में हर जगह बहुतायत में मौजूद आवाजों की पिचों में अंतर इसमें मौजूद गैरबराबरी को भी दिखाता है. इससे यह भी पता चलता है कि पूरा समाज परस्पर प्रेम की स्थिति में नहीं जीता. समाज के अधिकांश लोग जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण, लिंग, पद आदि कारणों से एक-दूसरे के प्रति अपमान, उपेक्षा, हीनता और नीचा दिखाये जाने की भावना रखते हैं.
हालांकि हमारे समाज में स्थितियां बदल रही हैं लेकिन स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, श्याम वर्ण का अभी ऊंची पिच में बात करना बाकी है. अभी तो इन लोगों ने सिर्फ बोलना, अभिव्यक्त करना सीखा है
यानी कि सिर्फ आवाज की पिच देखकर भी हम काफी हद तक तय कर सकते हैं कि समाज में उस व्यक्ति का क्या स्थान है? आवाज की पिच बता देती है कि बोलने वाला केन्द्र में है या हाशिये पर? अक्सर ही पतियों को अपनी पत्नियों को ऊंची आवाज में बोलते सुना जा सकता है ‘तू बेवकूफ है‘, ‘अक्ल नहीं है‘, ‘तुम तो बस रहने ही दो‘, ‘ज्यादा दिमाग मत लगाया करो‘, ‘रहोगी तो गंवार ही‘, ‘पागल है‘. मतलब कि किसी भी तरह की ताकत और पद न सिर्फ आवाज की पिच तय करते हैं, बल्कि शब्दों और वाक्य विन्यास तक को बदल देते हैं. नर योनि में जन्म लेना भर पुरुषों को इतने आत्मविश्वास से भर देता है कि उनकी आवाज की पिच किसी भी लड़की या स्त्री के सामने अक्सर ही बहुत ऊंची और दंभ से भरी होती है.
हालांकि हमारे समाज में स्थितियां बदल रही हैं लेकिन स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, श्याम वर्ण का अभी ऊंची पिच में बात करना बाकी है. अभी तो इन लोगों ने सिर्फ बोलना, अभिव्यक्त करना सीखा है, आवाज की पिच बराबर होने में समय लगेगा. ऐसा होने के लिए जिस मजबूत आर्थिक और राजनैतिक सशक्तिकरण की जरूरत है, उसमें अभी समय लगेगा. लेकिन कोशिशें जारी हैं. सामने वाले की आंखों में आंखें डालकर, उसी की पिच में उससे बात करने का सफर शुरू हो चुका है.