election reforms
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निर्दलीय उम्मीदवारों पर रोक लगाने का विधि आयोग का सुझाव अगर मान लिया जाए तो यह देश की जनता के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा और उसे राजनीति से बहुत दूर धकेलने वाला भी
भारत के संविधान ने अपने नागरिकों को जो अधिकार दिए हैं उनमें चुनाव लड़ने का अधिकार भी शामिल है. देश का कोई भी नागरिक उम्र संबंधी योग्यता पूरी करने के बाद ग्राम पंचायत से लेकर राष्ट्रपति पद तक का चुनाव लड़ सकता है बशर्ते उसे किसी अपराध के लिए दो साल या ज्यादा की सजा न हुई हो.
लेकिन चुनाव सुधारों को लेकर हाल ही में सामने आई राष्ट्रीय विधि आयोग की रिपोर्ट में एक ऐसा सुझाव दिया गया है जो बहुत हद तक इस अधिकार के बिल्कुल उलट जाता है. आयोग ने सुझाव दिया है कि निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने का प्रावधान खत्म कर दिया जाना चाहिए. उसका तर्क है कि ऐसा हो जाने से उन लोगों पर लगाम लगाई जा सकेगी जो पैसे, वोट काटने या चर्चा पाने के लिए चुनाव लड़ते हैं.
पहले आम चुनाव के बाद से अब तक 200 से ज्यादा सांसद ऐसे हैं जिन्होंने बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जीत हासिल की है. विधानसभाओं में पहुंचने वाले निर्दलीय विधायकों का आंकड़ा तो और भी ज्यादा है.
आयोग का कहना है कि चुनाव लड़ने वाले कई प्रत्याशी तो एक जैसे नाम वाले होते हैं जिनका मकसद मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा करना होता है. निर्दलीय प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा देने से ये सभी लोग बाहर हो जाएंगे और केवल गंभीर प्रत्याशी ही चुनाव मैदान में रह जाएंगे. आयोग के मुताबिक सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा करने से चुनाव लड़ने वालों की संख्या में भारी कमी आ जाएगी.
दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने अपनी इस रिपोर्ट में और भी सुझाव दिए हैं. उम्मीदवारों को एक से अधिक सीटों से चुनाव लड़ने से रोकने जैसे इन तमाम सुझावों को चुनाव सुधारों के लिहाज से अच्छा भी बताया जा रहा है. लेकिन निर्दलीय प्रत्याशियों को लेकर दिए गए उसके सुझाव पर कई सवाल खड़े होते हैं.
वैसे आयोग ने अपने इस सुझाव के पक्ष में जो तर्क रखे हैं उनके आधार पर बहुत से लोग इसे सही मान रहे हैं. मौटे तौर पर देखा जाए तो ये तर्क कई मामलों में सही भी लगते हैं. ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा चुनाव तक में डमी कैंडिडेट और वोट काटने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों के मामले आम हैं. कई बार तो इस तरह के निर्दलीय प्रत्याशियों की वजह से कई बड़े नेता धराशाई भी हो चुके हैं. इसके बावजूद कई ऐसे लोग भी हैं जिन्हें निर्दलीय प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का सुझाव रास नहीं आ रहा है. इस सुझाव को मानवाधिकारों पर चोट करने वाला बताते हुए इन लोगों का मानना है कि इससे संविधान के स्वरूप पर ही कई सारे प्रश्नचिन्ह लग जाएंगे.
चुनाव लड़ने वाले सभी निर्दलीय प्रत्याशी डमी या वोट काटने वाले नहीं होते, बल्कि इनमें बहुत सारे वे लोग भी शामिल होते हैं जिनकी अपनी खुद की राजनीतिक विचारधारा होती है जो किसी भी राजनीतिक दल से मेल नहीं खाती.
विधि आयोग के इस सुझाव को गलत बताते हुए इन लोगों की दलील है कि चुनाव लड़ने वाले सभी निर्दलीय प्रत्याशी डमी या वोट काटने वाले नहीं होते, बल्कि इनमें बहुत सारे वे लोग भी शामिल होते हैं जिनकी अपनी खुद की राजनीतिक विचारधारा होती है जो किसी भी राजनीतिक दल से मेल नहीं खाती. ऐसे में ये लोग बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जनता के सामने अपना एजेंडा रखते हैं, जिसे स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार सिर्फ जनता के पास होना चाहिए. आयोग के इस सुझाव को अमल में लाए जाने की सूरत में ये लोग जनता तक अपनी बात कैसे पहुंचा पाएंगे?
इसके अलावा बहुत से निर्दलीय प्रत्याशी ऐसे भी होते हैं जिन्हें अच्छा खासा जनसमर्थन मिलने के बावजूद उनकी पार्टियों से टिकट नहीं मिलता. ऐसी स्थिति में ये लोग निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ते हैं, और कई बार जीत भी हासिल कर लेते हैं. लोक सभा चुनाव की ही बात करें तो पहले आम चुनाव के बाद से अब तक 200 से ज्यादा सांसद ऐसे हैं जिन्होंने बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जीत हासिल की है. इसके अलावा देश भर के राज्यों की विधानसभा में पहुंचने वाले निर्दलीय विधायकों का आंकड़ा तो और भी ज्यादा है. हालांकि इनमें से कई सांसदों और विधायकों ने बाद में अलग-अलग राजनीतिक दलों का दामन भी थामा है लेकिन, तब भी यह आंकड़ा आयोग के उस तर्क को तो चुनौती देता ही है जो निर्दलीय प्रत्याशियों को महज वोट काटने वाला बताता है.
इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण तथ्य है जिसके आधार पर विधि आयोग के इस सुझाव को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है. यह तथ्य हमारे देश के गांवों से लेकर जिला स्तर की उस व्यवस्था से जुड़ा है जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ग्राम स्वराज कहते थे. ग्राम स्वराज की इस अवधारणा को 1992 में पंचायती राज व्यवस्था के रूप में संवैधानिक दर्जा मिला. इसके तहत होने वाले ग्राम सभा, क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत के चुनाव में मैदान में उतरने वाले सभी प्रत्याशी निर्दलीय ही होते हैं. ऐसे में आयोग का यह सुझाव यदि अमल में लाया जाता है तो इन पंचायतों का चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशियों का चयन भी राजनीतिक दलों द्वारा ही किया जाएगा. इसका सीधा मतलब लोगों की एक बहुत बड़ी संख्या का इस पूरी चुनावी प्रक्रिया से बाहर हो जाना है.
ऐसे में न्यायशास्त्र का वह सिद्धांत बेहद प्रासंगिक नजर आता है जिसके मुताबिक, 'भले ही हजार दोषी बच जाएं, मगर एक भी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए.' चुनाव सुधारों को लेकर यह सुझाव देते वक्त विधि आयोग को कम से कम इतना तो जरूर सोचना चाहिए था.