एचएसबीसी के खाताधारकों को जल्द ही अपने खातों की जानकारियां भारत से साझा करने की सहमति स्विटजरलैंड सरकार को देनी होगी नहीं तो वह इन जानकारियों को सार्वजनिक कर देगी.
काले धन को बढ़ावा देने के लिए दुनिया भर में आलोचनाओं और संभावित कानूनी कार्रवाइयों का सामना कर रहे एचएसबीसी बैंक ने अपने भारतीय ग्राहकों को एक ईमेल भेजा है. इस मेल में ग्राहकों से उनके खातों से जुड़ी जानकारियों को भारत के साथ साझा करने के लिए स्विटजरलैंड सरकार को सहमति देने के लिए कहा गया है. इन खाताधारकों को जल्द ही किसी तीसरी संस्था द्वारा ईमेल के जरिये एक पत्र भेजा जाएगा. इस पर हस्ताक्षर करने के बाद ग्राहकों को सीधे इसे स्विटजरलैंड की सरकार को भेजना होगा. इसके बाद स्विटजरलैंड इनके खातों और लेन-देन से जुड़ी तमाम जानकारियां भारत को सौंप देगा.
अंग्रेजी अखबार इकनॉमिक टाइम्स के मुताबिक करीब एक सप्ताह पहले यह ईमेल बैंक के ग्राहकों को भेजा गया था. ब्रितानी मूल के एचएसबीसी बैंक के एक रिलेशनशिप अधिकारी द्वारा भेजे इस ईमेल में यह भी कहा गया है कि यदि यह सहमति बैंक को एक निश्चित समय में नहीं मिली तो स्विटजरलैंड की सरकार - जिसके पास खातों से जुड़ी जानकारी पहले से है - इसे अपने ऑफिशियल गजट में छाप कर सार्वजनिक कर देगी. इसके बाद इस जानकारी को वहां से कोई भी हासिल कर सकता है.
एचएसबीसी बैंक और स्विटजरलैंड सरकार के इस कदम के बाद अब खाताधारकों के पास विकल्प बहुत सीमित रह गए हैं. इससे पहले वे यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करते रहते थे कि सरकार को मिली जानकारियां चोरी की हैं
इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में इस मामले से जुड़े कुछ टैक्स प्रोफेशनलों का हवाला दिया गया है जिससे साफ है कि उसे यह जानकारी मेल प्राप्त करने वाले लोगों के आर्थिक मामले देखने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंटों आदि से मिली है. अखबार की रिपोर्ट से यह साफ नहीं है कि यह ईमेल सिर्फ बैंक के भारतीय ग्राहकों को ही भेजा गया है या फिर इसे बैंक के अन्य देशों के ग्राहकों को भी भेजा गया है.
एचएसबीसी बैंक और स्विटजरलैंड की सरकार के इस कदम के बाद अब इस बैंक में खाता रखने वालों के पास विकल्प बहुत सीमित रह गए हैं. इससे पहले वे अपने बारे में भारत को मिली जानकारियों से यह कहकर पल्ला झाड़ लेते थे कि ये चुराये गई जानकारियां हैं जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. भारत की लाख कोशिशों के बावजूद स्विटजरलैंड भी 'चोरी' की जानकारी कहकर अब तक इन पर कोई भी कदम उठाने से इनकार करता रहा था.
दरअसल 2011 में फ्रांस सरकार ने भारत को 628 ऐसे भारतीयों की सूची सौंपी थी जिनके खाते एचएसबीसी बैंक की जिनेवा शाखा में थे. फ्रांस सरकार को यह जानकारी एचएसबीसी बैंक के पूर्व कर्मचारी अर्वे फल्सियानी से मिली थी जिन्होंने बैंक पर कालेधन को बढा़वा देने का शक होने पर वहां से बहुत सी जानकारी निकालकर फ्रांस को दे दी थी. इसके बाद एचएसबीसी बैंक में भारतीय खाता धारकों के 1195 खातों की एक सूची पिछले महीने इंडियन एक्सप्रेस ने भी प्रकाशित की थी. यह एक बड़ी सूची का हिस्सा थी जो पेरिस स्थित अखबार ले मोंदे के पत्रकारों को फ्रांस सरकार में मौजूद अपने सूत्रों से मिली थी. इस सूची में पुरानी सूची वाले भारतीय शामिल थे.
यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि एचएसबीसी बैंक ने यह ईमेल नोटिस केवल अपने उन भारतीय खाताधारकों को भेजा है जिनके खाते जनवरी 2011 में या उसके बाद भी चल रहे थे.
यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि एचएसबीसी बैंक ने यह ईमेल नोटिस केवल अपने उन भारतीय खाताधारकों को भेजा है जिनके खाते जनवरी 2011 में या उसके बाद भी चल रहे थे. इसपर इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में दो चार्टर्ड अकाउंटेंटों के हवाले से लिखा गया है कि भारतीय खाताधारकों में से कइयों ने इससे पहले ही अपने बैंक अकाउंट बंद कर दिए थे. 'इनका पैसा या तो दुबई या सिंगापुर भेज दिया गया. अब कोई तरीका नहीं कि भारतीय टैक्स विभाग इन पर कार्रवाई कर सके....लेकिन जिन्होंने ऐसा नहीं किया है वे अब फंस गए हैं' रिपोर्ट में ये सीए कहते हैं.
एक महीने पहले स्विटजरलैंड के क्रेडिट स्विस बैंक के अधिकारियों ने भी अपने भारतीय ग्राहकों से फोन पर बात की थी. इस बातचीत में उनसे जानी-मानी ऑडिट फर्मों द्वारा जारी ऐसे प्रमाणपत्र बैंक को भेजने के लिए कहा गया था जिनसे पता चलता हो कि बैंक में जमा उनकी रकम अवैध नहीं है. इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा न करने पर अधिकारियों का कहना था कि बैंक उनके खाते बंद करके उनकी सारी रकम एक बैंक ड्राफ्ट के जरिये उनके पते पर भेज देगा.
भारत सरकार ने फ्रांस से मिली 628 लोगों की सूची पर आगे न बढ़ पाने की स्थिति में 2013 में कोशिश की थी कि सूची में मौजूद लोग ही एचएसबीसी को स्विस गोपनीयता कानूनों से सुरक्षित अपने खातों की जानकारी देने के लिए लिख दें. लेकिन ज्यादातर खाताधारकों ने पहले तो ऐसा किया ही नहीं और जिन्होंने किया भी उनमें से अधिकांश ने बाद में बैंक को कह दिया कि उनसे ऐसा दबाव में करवाया गया था. अब भारत सहित अन्य देशों के दबाव में स्विटजरलैंड सरकार और बैंक ने ही जब ऐसा करने का सोच लिया है तो कई लोगों के लिए अपनी जानकारियां और छुपाना संभव नहीं होगा.
यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि एचएसबीसी के इन खातों में से ज्यादातर किसी व्यक्ति की बजाय ऐसी कंपनियों के नाम हैं जो टैक्स हैवन देशों और जगहों पर ट्रस्टों के तौर पर पंजीकृत हैं. जिन लोगों के नाम ईमेल भेजे गए हैं वे इन ट्रस्टों के लाभार्थी हैं.