बड़े पुरस्कारों के साथ सुखद स्मृतियां ही जुड़ी होती हैं. लेकिन शशि कपूर के मामले में यह बात शायद आधी सच होगी. 1971 में उनके पिता पृथ्वीराज कपूर को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा हुई थी. लेकिन पुरस्कार लेने से पहले ही पृथ्वीराज कपूर की मौत हो गई. इसके बाद पुरस्कार उनके बेटे और शशि कपूर के बड़े भाई राज कपूर ने ग्रहण किया. 1987 में यह सम्मान राजकपूर को देने का ऐलान हुआ. दो मई 1988 को पुरस्कार समारोह के दौरान मंच पर जाने के लिए वे कुर्सी से खड़े हुए तो अचानक उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी. राज कपूर की हालत देखते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमण प्रोटोकॉल तोड़कर खुद उनके पास पहुंचे और उन्हें पुरस्कार प्रदान किया. कुछ समय तक होश में रहने के बाद राजकपूर अचेत हो गए. राष्ट्रपति के काफिले में चलने वाली एंबुलेंस से उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. वहां एक महीने तक जूझने के बाद वे दो जून 1988 को वे चल बसे.

यही वजह है कि 2015 में शशि कपूर को यह पुरस्कार मिला तो इस सम्मान पर खुशी जताते हुए प्रशंसकों ने उनके स्वास्थ्यलाभ की भी कामना की. इन दिनों अक्सर व्हीलचेयर पर दिखने वाले शशि कपूर के बारे में कहा जाता है कि महीने में उनके 10 दिन अस्पताल में ही गुजरते हैं.

18 मार्च 1938 को कोलकाता में जन्मे शशि कपूर ने बड़े भाई राजकपूर की फिल्मों आग (1948) और आवारा (1951) फिल्म में बाल कलाकार के तौर पर अभिनय किया. आवारा में उन्होंने राज कपूर के बचपन की भूमिका निभाई थी. बाद में वे एक थिएटर ग्रुप में शामिल हो गए और दुनिया भर में घूमे. इसी दौरान उन्हें ब्रिटिश अभिनेत्री जेनिफर कैंडल से प्रेम हुआ. 1958 में सिर्फ 20 साल की उम्र में शशि कपूर ने खुद से तीन साल बड़ी जेनिफर से शादी कर ली.

मुख्य अभिनेता के तौर पर अभिनय की शुरुआत शशि कपूर ने 1961 में धर्मपुत्र से की. यह यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी दूसरी फिल्म थी. इसके बाद उन्होंने कई यादगार फिल्में कीं. जब-जब फूल खिले, कन्यादान, शर्मीली, सत्यम शिवम सुंदरम, दीवार, त्रिशूल, कभी-कभी और नमक हलाल में उनकी भूमिकाएं हमेशा के लिए दर्शकों के जेहन में बस गईं. कुल मिलाकर उन्होंने 116 फिल्मों में अभिनय किया. एक दौर में वे इतने व्यस्त हो गए थे कि दिन में कई फिल्मों की शूटिंग करते थे. इसी वजह से राजकपूर मजाक में कहते थे कि उनका भाई टैक्सी हो गया है. अमिताभ के साथ उनकी जोड़ी सुपरहिट रही. इन दोनों कलाकारों ने एक साथ 11 फिल्मों में काम किया है. इनमें दीवार, सुहाग, त्रिशूल और नमक हलाल सुपर हिट रहीं. उनका मशहूर ‘मेरे पास मां है’ वाला डॉयलॉग दीवार फिल्म का ही था.

दीवार के एक मशहूर सीन में अमिताभ बच्चन और निरूपा रॉय के साथ शशि कपूर
दीवार के एक मशहूर सीन में अमिताभ बच्चन और निरूपा रॉय के साथ शशि कपूर

लेकिन व्यावसायिक सिनेमा के बड़े स्टार शशि कपूर का मन समानांतर सिनेमा में भी उतना ही लगता था. यही वजह है कि बाद में वे फिल्म निर्माता की भूमिका में आ गए. अपने प्रोडक्शन हाउस फिल्म वाला के तहत उन्होंने श्याम बेनेगल के साथ जुनून बनाई, गोविंद निहलानी के साथ विजेता, अपर्णा सेन के साथ 36 चौरंगी लेन और फिर गिरीश कर्नाड के साथ उत्सव. 1979 में जुनून के लिए उन्हें बतौर निर्माता राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. 1986 में आई न्यू डेल्ही टाइम्स में अपने अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 2011 में शशि कपूर पद्मभूषण से नवाजे गए.

शशि कपूर ने पृथ्वी थियेटर को स्थायी बनाते हुए उसे एक नया आयाम दिया. वैसे यह उनके पिता का सपना था. 1942 में 150 कलाकारों के घूमंत दल के रूप में पृथ्वी थियेटर शुरू करने वाले पृथ्वीराज कपूर चाहते थे कि इसका एक स्थायी ठिकाना हो. इसके लिए उन्होंने मुंबई में एक प्लॉट भी ले लिया था. लेकिन 1972 में उनकी मौत हो गई. 1978 में इसी जमीन पर शशि कपूर ने पृथ्वी थिएटर शुरू किया. हिंदुस्तानी रंगमंच को इस संस्था और समृद्ध बनाया. शशि और जेनिफर की इस पहल से कई प्रतिभाशाली कलाकार निकले. फिलहाल इसकी कमान उनके बेटे कुणाल कपूर के हाथ में है.

शशि कपूर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले भारत के शुरुआती अभिनेताओं में से भी एक हैं. उन्होंने कई ब्रिटिश और अमेरिकन फिल्मों में काम किया. इनमें हाउसहोल्डर (1963), शेक्सपियर वाला (1965), बॉम्बे टाकीज (1970), तथा हीट एण्ड डस्ट (1982) शामिल हैं. सिद्धार्थ (1972) एवं मुहाफिज़ (1994) में भी उनकी भूमिकाएं सराही गईं. 90 के दशक में गिरती सेहत की वजह से शशि कपूर ने फिल्मों में काम करना लगभग बंद कर दिया था. 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘जिन्ना’ उनके सिने करियर की अंतिम फिल्म थी. ब्रिटेन और पाकिस्तान में प्रदर्शित इस फिल्म में उन्होंने सूत्रधार की भूमिका निभाई थी.