राहुल गांधी के छुट्टी पर जाते ही सोनिया गांधी की यह सक्रियता और आक्रामकता अनायास नहीं है. इसकी अपनी वजहें हैं.
पिछले दस सालों में सोनिया गांधी का यह अंदाज़ कभी नहीं देखा गया. सोनिया सड़क पर निकलीं. किसानों से मिलीं. राजस्थान से लेकर हरियाणा तक का दौरा किया. लोकसभा में भाषण दिया. आखिर ऐसा क्या हुआ कि जब राहुल गांधी छुट्टी पर निकले, सोनिया गांधी सियासत में सक्रिय हो गईं? यह सक्रियता, आक्रामकता और तत्परता अनायास नहीं. इसकी अपनी वजहें हैं.
सोनिया संन्यास नहीं ले रहीं!
कांग्रेस के कुछ नेताओं की मानें तो सोनिया दिखाना चाहती हैं कि वे सियासत से संन्यास नहीं ले रहीं. यह संदेश राहुल के लिए भी है और उनके समर्थक अति-उत्साही नेताओं के लिए भी. कांग्रेस में ऐसा पहली बार हुआ जब गांधी परिवार का सदस्य अध्यक्ष के पद पर है, फिर भी उसे बदलने की बात हो रही है. ऐसी हिम्मत पहले किसी ने नहीं की थी. चूंकि ऐसा करने वाले राहुल के करीबी थे और उनके लिए ही ऐसा कर रहे थे, इसलिए बचे रहे. राहुल जब छुट्टी पर गए तो सोनिया ने दिखा दिया, बॉस कौन है और पार्टी कैसे चलती है.
सोनिया-कैंप अब भी राहुल कैंप से ताकवर
किसी भी पार्टी का बुरा वक्त तब शुरू होता है जब ऊपर से नीचे तक वह पार्टी दो धड़ों में बंट जाए. पिछले पांच सालों में कांग्रेस के साथ ऐसा ही हुआ. जैसे-जैसे राहुल गांधी की ताकत बढ़ी, वैसे-वैसे कांग्रेस में राहुल गांधी का कैंप बनता चला गया. वैसे यह कैंप राहुल ने नहीं बनाया. राहुल के करीबी नेताओं ने उनके नाम पर यह काम किया. बुजुर्ग और पुराने नेता सोनिया के साथ रहे, 24 अकबर रोड की राजनीति में जो कभी खुद को फिट नहीं कर पाए वैसे पुराने और युवा नेता राहुल के नाम की माला जपने लगे. चूंकि कैंप मां-बेटे के नाम पर बंटे थे इसलिए थे दोनों ही मजबूत. इसलिए बार-बार फैसलों में विरोधाभास भी नजर आया. जब राहुल गांधी छुट्टी पर गए तो कांग्रेस में सोनिया कैंप के नेताओं को मौका मिल गया. वे सोनिया को समझाने में कामयाब रहे कि वे ही नरेंद्र मोदी से मुकाबला कर सकती हैं, कोई और नहीं.
सोनिया सच में मोदी को पसंद नहीं करतीं!
सोनिया गांधी की 'स्ट्रीट फाइट पॉलिटिक्स' में बहुत कुछ पर्सनल भी है. कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता यह बताते हैं कि अगर सोनिया को सियासत में सबसे ज्यादा किसी व्यक्ति से दिक्कत है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है. वे किसी भी सूरत में मोदी को पांच साल से ज्यादा कुर्सी पर बर्दाश्त नहीं कर सकतीं. इस सियासी दुश्मनी के पीछे मौत का सौदागर जैसे बयान हैं. मोदी के सोनिया और उनके पर परिवार पर लगातार होते रहे हमले हैं. वे जब कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते हैं तो यह नारा सबसे ज्यादा सोनिया को ही चुभता है.
सोनिया चक्रव्यूह बना रही हैं
मोदी सरकार और अटल सरकार, दोनों में एक समानता दिख रही है. मोदी सरकार भी जीडीपी, इकॉनमी और शेयर बाजार जैसे पैमानों को देखकर मान रही है कि देश में विकास हो रहा है. पिछली एनडीए सरकार के वक्त ‘इंडिया शाइन’ कर रहा था. इस बार अच्छे दिन आ गए हैं. जबकि इस देश की एक बड़ी सच्चाई यह है कि गांव और किसान जो साठ फीसदी वोटर की पहचान है, वह न जीडीपी की आंकड़ेबाजी समझता है, न ही शेयर बाजार के उछाल से उसका दिल उछाल मारता है. सोनिया 2004 में वाजपेयी सरकार को हरा चुकी हैं. उन्हें यह भरोसा है कि वे 2019 में उसी तरह से मोदी सरकार को भी हरा सकती हैं.
मोदी चाहें न चाहें उनकी सरकार की इमेज प्रो-कोरपोरेट, प्रो-बिजनेसमैन, प्रो-पूंजीपति बनती जा रही है. सोनिया इसी इमेज को और मजबूत करना चाहती हैं. मोदी सरकार और उनकी पार्टी के नेता जितनी बार कहेंगे कि अच्छे दिन आ गए हैं, उस गरीब और किसान के जख्म पर नमक डालेंगे जिसके घर में भूख, भय और भ्रष्टाचार तीनों का राज है. सोनिया वही प्रयोग दोहरा रही हैं जिससे उन्होंने ग्यारह साल पहले भाजपा को हराया था.
सोनिया के सामने मुश्किल कम नहीं
सोनिया के पास रास्ते कम हैं. राहुल गांधी वह सफलता नहीं दिला पाए जिसकी एक मां को उम्मीद थी. प्रियंका गांधी अगर पार्टी में सीधे तौर पर आ जाएंगी तो एक पार्टी में तीन कैंप बन जाएंगे और तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा हो जाएगा. ऐसे में उनकी मजबूरी भी है कि वे पार्टी को खुद संभाले. लेकिन मुश्किल यह है कि कांग्रेस ऐसे कालचक्र में फंसी है जब उसे लगातार हार का मुंह देखना ही पड़ेगा. साल 2017तक जिन-जिन राज्यों में चुनाव होने हैं सभी में कांग्रेस बेहद कमजोर है. बिहार में कांग्रेस लालू और नीतीश के दम पर ही खड़ी हो सकती है. पश्चिम बंगाल में ममता ने अगर सोनिया का साथ दिया तभी कुछ फायदा हो सकता है वर्ना अभी तो वहां कांग्रेस चौथे नंबर पर ही दिख रही है.
उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस का बुरा हाल है. भाजपा, सपा और बसपा के बाद ही उसका नंबर आएगा. असम में भी कांग्रेस लगातार चौथी बार चुनाव जीतेगी, यह बहुत-बहुत मुश्किल है. मतलब सोनिया यह समझती हैं कि दो साल तक कोई अच्छी बड़ी खबर कांग्रेस को नहीं मिलने वाली है. इसलिए कांग्रेस माहौल बना रही हैं. अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित रखने के लिए, एक लंबी लड़ाई के लिए और हो सके तो कुछ ऐसा माहौल बनाने के लिए जिससे एकाध राज्य में कुछ फायदा हो जाए.
सोनिया भी बदलीं हैं, सियासत भी बदली है
2014 के चुनाव में मोदी जीते क्योंकि उन्होंने वोटर से नई बात की. नए सपने दिखाए. 2004 का चुनाव याद करें तो सोनिया ने भी नये तरीके से चुनाव प्रचार किया था. पहली बार बड़े पैमाने पर रैली की जगह रोड शो हुए थे. नेता वोटर के पास गए,वोटर को नेता को देखने या सुनने रैली के मैदान तक नहीं आना पड़ा था. सोनिया इस बार भी नया प्रयोग कर रही हैं. रैली करने की बजाय वे किसानों से लेकर रायबरेली ट्रेन हादसे में जख्मी लोगों तक से मिलने पहुंच रही हैं. किसानों को गले लगा रही हैं. उनके साथ बैठकर बातें कर रही हैं. जो मोदी चाहकर भी नहीं कर सकते. अगर यह लंबे वक्त तक चलता रहा तो मोदी जनता से दूर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे नेता दिखने लगेंगे और सोनिया जनता के करीब दिखने लगेंगी. सोनिया के करीबी नेताओं को पहली बार लगा है उनके पास एक आखिरी मौका है. सोनिया सत्ता के केंद्र में रहेंगी तभी कांग्रेस में उनकी तूती बोलेगी इसलिए अहमद पटेल जैसे नेता भी अब जंतर-मंतर पर दिखते हैं. कांग्रेस का पूरा नेटवर्क एक बार फिर सक्रिय होने लगा है. राहुल गांधी कांग्रेस बदलने की बात करते रह गए, सोनिया गांधी ने बदलाव की शुरुआत कर दी है.