कभी पश्चिमी देश कहते थे कि भारत ने बंदूक के बल पर गोवा को पुर्तगाल से छीन लिया है और वहां जनता त्राहि त्राहि कर रही है. क्रीमिया के रूस में विलय के एक साल बाद भी वे कुछ यही ढोल पीट रहे हैं. क्या है सच्चाई?
पिछले साल के शुरुआती महीनों में यूक्रेन में सत्तापलट के लिए जो कथित क्रांति हुई, वह देश की व्यथित जनता के लिए अब तक की सबसे बड़ी भ्रांति कही जा सकती है. क्रांति हुई थी 1991 तक तत्कालीन सोवियत संघ का हिस्सा रहे यूक्रेन को यूरोपीय संघ और पश्चिमी देशों के सैन्य गुट नाटो का अंग बनाने के लिए. परिणाम हुआ, 'चौबे चले छब्बे बनने, बनकर आए दुबे!' यूरोपीय संघ और नाटो की सदस्यता तो अभी तक मिली नहीं, देश के दक्षिण-पूर्वी स्वायत्तशासी क्रीमिया प्रायद्वीप ने एक जनमतसंग्रह के द्वारा, 16 मार्च, 2014 को अपनी स्वतंत्रता की और दो दिन बाद रूस में अपने विलय की घोषणा कर दी. क्रीमिया तो गया ही, पूर्वी यूक्रेन का रूसीभाषी बहुमत वाला दोनबास इलाका भी किसी भी समय यूक्रेन के हाथ से निकल सकता है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अनुसार वहां एक साल से चल रहा पृथकतावादी गृहयुद्ध अब तक छह हजा़र से अधिक जिंदगियां ले चुका है.
क्रीमिया के रूस में विलय की पहली वर्षगांठ पर पश्चिमी मीडिया वहां केवल कमियों और परेशानियों का ही ढोल पीट रहा है, जिसका असली लक्ष्य रूस और उसके 'विस्तारवादी' राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लांछित करना है
उल्लेखनीय है कि क्रीमिया 1783 से 1954 तक पूरी तरह रूसी भूभाग था. 1954 में सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता निकिता ख्रुश्चेव ने एक अध्यादेश जारी कर इस हिस्से को 'यूक्रेनी-रूसी मैत्री और सहयोग' के एक रस्मी 'उपहार' के तौर पर यू्क्रेन को सौंप दिया था. ख्रुश्चेव स्वयं यूक्रेनी थे और तब यूक्रेन सोवियत संघ का एक गणराज्य हुआ करता था. ख्रुश्चेव ने अपनी मातृभूमि को यह उपहार देते हुए सपने में भी नहीं सोचा था कि साम्यवादी सोवियत संघ कभी बिखर जाएगा, यूक्रेन क्रीमिया सहित रूस से अलग हो जाएगा और क्रीमिया दोनों के बीच एक नए झगड़े की जड़ बन जाएगा.
ख्रुश्चेव की दानवीरता के ठीक 60 साल बाद, 18 मार्च, 2014 को रूस में क्रीमिया के पुनः विलय की पहली वर्षगांठ के बहाने से वहां की मौजूदा स्थिति का आकलन करने गए यूरोपीय पत्रकार और प्रेक्षक वहां की स्थिति बहुत सुखद तो नहीं बताते, पर यह स्वीकार करते हैं कि वहां की जनता का भारी बहुमत विलय का समर्थन करता है. महंगाई, नौकरशाही और बिजली-पानी के अभाव से पीड़ित जनसाधारण यह कहने से नहीं चूकता कि यदि क्रीमिया का रूस में विलय नहीं हुआ होता,  यदि वह अब भी यूक्रेन का हिस्सा होता,  तो उन्हें भी गृहयुद्ध की वही त्रासदी झेलनी पड़ती, जो पूर्वी यूक्रेन में दोनबास इलाके के लोगों को झेलनी पड़ रही है. उन की तरह वे भी आज कट-मर रहे होते.
क्रीमिया का रूसीकरण
[caption id="attachment_6709" align="alignright" width="300"]क्रीमिया के रूस में विलय की वर्षगांठ मनाते क्रीमियाई नागरिक क्रीमिया के रूस में विलय की वर्षगांठ मनाते वहां के लोग[/caption]
क्रीमिया के रूस में विलय से कौन खुश है और कौन नहीं, यह उसकी वैचारिक सोच से अधिक इस पर निर्भर करता है कि वह रूसी है या ग़ैर-रूसी. लगभग 23 लाख की जनसंख्या वाले इस मनोरम प्रायद्वीप के 60 प्रतिशत निवासी रूसी हैं. 25 प्रतिशत यूक्रेनी हैं और शेष तातार (तुर्कवंशी), आर्मेनियाई, पोलिश और मोल्दावियाई हैं.
सरकारी भवनों पर अब सफ़ेद, नीले और लाल रंग वाला रूसी तिरंगा फ़हराता है. घड़ियां मास्को के समय के अनुसार चलती हैं. पुलिस की वर्दी रूसी पुलिस जैसी है. यूक्रेनी मुद्रा राइवन्या की जगह रूसी रूबल ने ले ली है. टेलीफ़ोन प्रणाली ठीक से काम नहीं कर रही है. मॉस्को या रूस के अन्य शहरों की दिशा में टेलीफ़ोन तो लग जाता है, लेकिन यूक्रेन की दिशा में काफ़ी कठिनाई होती है. दूसरी ओर, रूस में विलय के बाद से डॉक्टरी चिकित्सा सब के लिए मुफ्त हो गई है.
चारों ओर समुद्र से घिरा क्रीमिया प्रायद्वीप केवल एक संकरी पट्टी और एक पुल के द्वारा यूक्रेनी मुख्यभूमि से जुड़ा हुआ है. उसे रूस और यूक्रेन से जोड़ने वाले रेलमार्ग, गैस और पानी की पाइपलानें और बिजली के तार यहीं से हो कर जाते हैं. रेलमार्ग अब बंद हैं. यूक्रेन बिजली, पानी और गैस की आपूर्ति को बाधित करने का कोई मौका नहीं चूकता. कई जगहों पर सप्ताह में केवल तीन ही दिन पानी मिलता है. अतः क्रीमिया को सीधे रूस से जोड़ने के लिए रूस ने पूर्व में, 2018 तक, काला सागर पर कई किलोमीटर लंबा एक नया पुल बनाने की घोषणा की है.
आय बढ़ी, महंगाई भी चढ़ी
एक ही वर्ष में क्रीमिया के लोगों के वेतन आदि आधिकारिक तौर पर औसतन 52.6 प्रतिशत बढ़ गए हैं (औसतन 17,200 रूबल, लगभग 270 डॉलर मासिक), लेकिन जीवनवनिर्वाह ख़र्च भी 53.2 प्रतिशत बढ़ गया है. कुछ लोगों को शिकायत है कि उन्हें वेतन-आदि समय पर नहीं मिलते. रूसी सरकार ने घरों, सड़कों इत्यादि की मरम्मत व अन्य निर्माणकार्यों के लिए 2014 में करीब सवा करोड़ डॉलर दिए, पर उपयोग हुआ केवल 51 लाख का. कारण यह बताया गया कि बहुत सारे घरों व भवनों का निर्माण या तो अवैध रूप से हुआ है या उनकी पैमाइश के सही दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं.
रूस के विरुद्ध पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण वीजा और मास्टरकार्ड जैसे क्रेडिट कार्ड बेकार हो गए हैं. इसी कारण प्रमुख रूसी बैंक भी क्रीमिया में काम नहीं कर रहे हैं
रूस के विरुद्ध पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण वीजा और मास्टरकार्ड जैसे क्रेडिट कार्ड बेकार हो गए हैं. इसी कारण प्रमुख रूसी बैंक भी क्रीमिया में काम नहीं कर रहे हैं. छोटे बैंक ऐसा कोई चेक या बिल स्वीकार नहीं करते, जो रूबल में न हो. सब जगह नकदनारायण की मांग की जाती है. बाहरी निवेश ठप्प पड़ गया है. बैंकों से ऋण प्राप्त कर सकना भी टेढ़ी खीर हो गया है. वास्तव में, क्रीमिया के लोगों को वही परेशानियां हैं जिनका सामना पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण सारा रूस कर रहा है और जिनका मकसद रूसी अर्थव्यवस्था को घुटने टेकने पर विवश करना है.
90 प्रतिशत क्रीमियाई रूसी नागरिकता से संतुष्ट
यह जानने के लिए कि यूक्रेन से अलग होने के बाद क्रीमिया के लोगों की सोच-समझ में क्या परिवर्तन आया है, गत जनवरी में यूक्रेनी उपभोक्ता शोध संस्था ने वहां एक जनमत सर्वेक्षण करवाया. इस सर्वेक्षण में 90 प्रतिशत से अधिक लोगों ने कहा कि सारी परेशानियों के बाद भी वे अब रूस का नागरिक होने से 'संतुष्ट' हैं.
क्रीमिया के रूस में विलय की पहली वर्षगांठ पर पश्चिमी मीडिया वहां केवल कमियों और परेशानियों का ही ढोल पीट रहा है, जिसका असली लक्ष्य रूस और उसके 'विस्तारवादी' राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लांछित करना है. इस ढोल पिटाई में सबसे आगे जर्मन मीडिया जानबूझ कर भूल जाता है कि 1989 में बर्लिन दीवार गिरने और 1990 में जर्मनी का एकीकरण होने के बाद पूर्वी जर्मनी में स्थिति और भी दयनीय थी. पूर्वी जर्मनी पर पश्चिमी पूंजीवाद थोपने के अंधाधुंध अभियान से सारे उद्योग-धंधे पिट गए थे. भयंकर बेरोज़गारी से हाहाकार मच गया था. पश्चिम जर्मनों की पूर्वी जर्मनी में पिटाई तक हो जाती थी. जर्मनी के दोनों भागों के बीच रोज़गार के अवसरों, वेतनों और पेंशनों के बीच का अंतर एकीकरण के 25 साल बाद भी दूर नहीं हुआ है.
क्रीमिया पर पश्चिम का रवैया वैसा ही है जैसा कभी गोवा के भारत विलय के समय था
1961 में गोवा के भारत में विलय के बाद भी पश्चिमी मीडिया की यही गुहार हुआ करती थी कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों को भंग किया है. बंदूक के बल पर गोवा को पुर्तगाल से छीन लिया है. नेहरू के राज में गोवा की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है. यदि आज की बात करें, तो तथ्य यह है कि संसार का एक सबसे धनी और सुव्यवस्थित देश जर्मनी जब एकीकरण के 25 साल बाद भी पूर्वी जर्मनी को पुराने पश्चिमी जर्मनी के बराबर नहीं उठा पाया,  तब एक ही साल में क्रीमिया के लोगों के सारे दुख-दर्द दूर करने में रूस की विफलता की निंदा वह भला किस मुंह से कर सकता है? जर्मनी के दोनों भागों के बीच बराबरी के लिए वहां जनता से ढाई दशक से 'एकजुटता-अधिभार' नाम का एक ऐसा अलग कर जबर्दस्ती ऐंठा जा रहा है जिसका कोई अंत ही नहीं दिखता. रूस ने तो अपने यहां ऐसा कोई कर तक नहीं लगाया है.
अंतरराष्ट्रीय क़ानून किसी दंडविधान-संहिता की तरह स्पष्ट नियमावली नहीं हैं. राज्यों के बीच संबंधों की परंपराओं, संधियों-समझौतों और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में निहित जिन सिद्धांतों को अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तौर पर पेश किया जाता है, उन की सभी विधिवेत्ता एक जैसी व्याख्या नहीं करते. हो सकता है कि गोवा का भारत में या क्रीमिया का रूस में विलय पूरी तरह अतंरराष्ट्रीय क़ानून सम्मत न हो. पर वह बहुमत की जनाकांक्षा-सम्मत तो है ही, इसलिए अनैतिक कतई नहीं हो सकता.