आईपीसी की धारा 124ए न सिर्फ पुलिस को अनावश्यक और असीमित अधिकार देती है बल्कि इसके जरिये व्यवस्था से असहमति जताने वालों को परेशान करने के कई उदाहरण भी रहे हैं.
अगले महीने हो रहे टी20 विश्व कप में भारत अगर पहले ही दौर में बाहर हो जाए और इससे निराश क्रिकेट प्रेमी पोस्टरों के साथ विरोध प्रदर्शन करें जिससे हुड़दंग मच जाए तो क्या उन्हें या टीम के खिलाड़ियों को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा हो सकती है? किसी को भी यह सवाल बेतुका लग सकता है. लेकिन भारत में अपराधों को लेकर सजा का निर्धारण करने वाली सबसे बड़ी किताब यानी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में एक धारा ऐसी है जिसके तहत ऐसा किया जा सकता है. क्रिकेट प्रेमियों को सजा देने के लिए तर्क यह दिया जाएगा कि उनके पोस्टरों पर लिखी बातों से लोगों का गुस्सा भड़का जिससे हुड़दंग मचा. इसी तरह खिलाड़ियों के खिलाफ यह तर्क दिया जा सकता है कि वे यदि हारते नहीं तो लोग इस तरह की तख्तियां नहीं बनाते और बवाल भी नहीं खड़ा होता.
दरअसल आईपीसी की धारा 124ए को लेकर बनाए गए प्रावधान इतने ही अस्पष्ट हैं कि इनकी आड़ लेकर लोगों को आसानी से देशद्रोह का आरोपी बनाया जा सकता है.
आजादी के पहले से लेकर अब तक इस धारा के तहत बहुत से लोगों को इन्हीं अस्पष्ट प्रावधानों की आड़ में गिरफ्तार किया जा चुका है. इनमें सामाजिक कार्यकर्ता, नेता, आंदोलनकारी, पत्रकार, अध्यापक और यहां तक कि छात्र भी शामिल हैं.
बीते साल ऐसे ही अस्पष्ट प्रावधानों के चलते देश की सबसे बड़ी अदालत ने आईटी एक्ट की धारा 66ए को निरस्त कर दिया था. उसके बाद कई लोगों ने सवाल किया था कि क्या आईपीसी की धारा 124ए के साथ भी ऐसा ही नहीं होना चाहिए. अब जेनयू में देश विरोधी नारे प्रकरण में वहां के छात्र संघ कन्हैया कुमार की 124ए के तहत गिरफ्तारी के बाद यह सवाल फिर पूछा जाने लगा है. यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आजादी के पहले से लेकर अब तक इस धारा के तहत बहुत से लोगों को इन्हीं अस्पष्ट प्रावधानों की आड़ में गिरफ्तार किया जा चुका है. इनमें सामाजिक कार्यकर्ता, नेता, आंदोलनकारी, पत्रकार, अध्यापक और छात्र तक शामिल हैं.
इस सवाल के जवाब तक पहुंचने के लिए आईपीसी की इस धारा को जानने के साथ-साथ उन वजहों का जिक्र करना भी जरूरी है जिनके चलते इसे खत्म करना बेहद जरूरी बताया जा रहा है.
क्या है धारा 124ए?
आईपीसी की धारा 124ए कहती है कि अगर कोई भी व्यक्ति भारत की सरकार के विरोध में सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गतिविधि को अंजाम देता है जिससे देश के सामने सुरक्षा का संकट पैदा हो सकता है तो उसे उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है. इन गतिविधियों का समर्थन करने या प्रचार-प्रसार करने पर भी किसी को देशद्रोह का आरोपी मान लिया जाएगा. इन गतिविधियों में लेख लिखना, पोस्टर बनाना और कार्टून बनाना जैसे वे रचनात्मक काम शामिल हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी आधार हैं.
लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इन गतिविधियों से पैदा होने वाले खतरे को कैसे मापा जाएगा, इसको लेकर धारा 124ए साफ तौर पर कुछ भी नहीं बताती. इसकी परिभाषा के इस कदर अस्पष्ट होने के कारण यह धारा संविधान की उस भावना के खिलाफ भी खड़ी नजर आती है, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को अपनी असहमति जताने का हक हासिल है. इसके बावजूद यह धारा आज भी आईपीसी की मोटी किताब में उसी अकड़ के साथ मौजूद है जो इसमें 135 साल पहले तब थी जब अंग्रेजी हुकूमत के नुमाइंदों ने इसे आईपीसी में शामिल किया था.
हालांकि 1962 में आया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला धारा 124ए के दायरे को लेकर कई बातें साफ कर चुका है, लेकिन तब भी इस धारा को लेकर अंग्रेजों वाली जमाने की रीत का पालन ही किया जा रहा है. माना जाता है कि तब आईपीसी में देशद्रोह की सजा को शामिल करने का मकसद ही सरकार के खिलाफ बोलने वालों को सबक सिखाना था. 1870 में वजूद में आई यह धारा सबसे पहले तब चर्चा का विषय बनी जब 1908 में बाल गंगाधर तिलक को अपने एक लेख के लिए इसके तहत छह साल की सजा सुनाई गई. तिलक ने अपने समाचार पत्र केसरी में एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था- देश का दुर्भाग्य. 1922 में अंग्रेजी सरकार ने महात्मा गांधी को भी धारा 124 ए के तहत देशद्रोह का आरोपी बनाया था. उनका अपराध यह था कि उन्होंने अंग्रेजी राज के विरोध में एक अखबार में तीन लेख लिखे थे. तब गांधी जी ने भी इस धारा की आलोचना करते हुए इसे भारतीयों का दमन करने के लिए बनाई गई धारा कहा था. आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहर हाल नेहरू ने भी कहा था कि अगर उनकी चले तो वे इस धारा को खत्म कर दें.
इस धारा को समाप्त करना क्यों जरूरी है?
धारा 124ए का विरोध करने वाले लोग मानते हैं कि ऐसी कई वजहें हैं जिनके चलते इस धारा को खत्म कर देना चाहिए. सबसे बड़ी वजह तो यही है कि यह धारा संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए अभिव्यक्ति के अधिकार का दमन करती है. जानकारों का तर्क है कि जब संविधान की धारा 19 (1)ए में पहले से ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीमित प्रतिबंध लगे हुए हैं तब 124ए की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए. इसके अलावा धार्मिक उन्माद फैलाने, सामाजिक द्वेष पैदा करने, शांति व्यवस्था बिगाड़ने और किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने जैसे गलत कामों के लिए आईपीसी में पहले से ही अलग-अलग धाराओं में सजा निश्चित की गई है. माना जाता है कि इसके बावजूद धारा 124ए को सिर्फ इसलिए बरकरार रखा गया है ताकि इसकी आड़ में उन लोगों पर नकेल लगाई जा सके जो सरकार के खिलाफ अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं.
कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का मामला इस का सटीक उदाहरण माना जा सकता है. संसद भवन का कार्टून बनाने के चलते महाराष्ट्र की सरकार ने उन्हें 2012 में देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. तब सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भी उनकी गिरफ्तारी को गलत बताया था. उनका कहना था कि असीम त्रिवेदी के खिलाफ कार्रवाई करनी ही थी तो वह 'इंसल्टिंग ऑफ नेशनल ऑनर ऐक्ट' के तहत की जा सकती थी. इस एक्ट के तहत देश के सम्मान सूचक चिन्हों को अपमानित करने संबंधी गतिविधि के लिए सजा दिए जाने का प्रावधान है. चौतरफा आलोचना झेलने के बाद दबाव में आई सरकार ने बाद में ऐसा किया भी.
धार्मिक उन्माद फैलाने, सामाजिक द्वेष पैदा करने, शांति व्यवस्था बिगाड़ने और किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने जैसे गलत कामों के लिए आईपीसी में पहले से ही अलग-अलग धाराओं में सजा निश्चित की गई है.
इस धारा का विरोध करने वाले लोग एक और तर्क देते हैं. कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों को मिलने वाला सबसे बड़ा अधिकार ही असहमति का अधिकार होता है. यानी अगर किसी को लगता है कि उसके देश की व्यवस्था में कुछ खामियां हैं तो वह उनका विरोध कर सकता है. लेकिन इस विरोध को देशप्रेंम की कसौटी पर तौलते हुए लोगों पर देशद्रोह का आरोप मढ़ने के मामले देखे जाते रहे हैं.
समाजशास्त्री आशीष नंदी का ही उदाहरण ले. गुजरात दंगों पर गुजरात सरकार की आलोचना करते एक लेख के लिए तत्कालीन राज्य सरकार ने 2008 में नंदी के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया था. इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने इस पर सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए उसके इस फैसले को हास्यास्पद बताया था. छत्तीसगढ़ में सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन और उत्तर प्रदेश में पत्रकार सीमा आजाद के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ. 2012 में हरियाणा के हिसार में कुछ दलितों पर भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया था. उनका कसूर यह था कि वे दबंगों के जुल्म की शिकायत करते हुए डीएम दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे थे. 22 दिन के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने मुख्यमंत्री का पुतला जलाया था. इसके बाद उन पर 124ए लगा दी गई.
सवाल यह भी है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश में 'देशद्रोह' जैसे शब्द को जगह क्यों मिलनी चाहिए? इस तर्क में इसलिए भी दम है कि इस धारा को बनाने वाले देश इंग्लैंड में भी इसे खत्म किया जा चुका है.
धारा 124ए को लेकर अब तक क्या कुछ हुआ है?
धारा 124ए के अस्पष्ट प्रावधानों को दूर करने की मांग बहुत लंबे समय से की जाती रही है. इसको लेकर साठ के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था. यह फैसला 1992 में 'केदार नाथ सिंह बनाम बिहार सरकार' नामक बहुचर्चित मामले में दिया गया था. शीर्ष अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए आईपीसी की धारा 124 ए की जांच की थी. ऐसा करते हुए उसने इस धारा को संविधान सम्मत तो बताया था, लेकिन इसका दायरा सीमित कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि किसी भी व्यक्ति को देशद्रोही तभी माना जा सकता है जब उसके काम से व्यापक हिंसा भड़क उठी हो. यानी जब तक सुरक्षा का संकट साबित नहीं हो जाता तब तक किसी भी काम को देशद्रोह की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए. 2011 में भी एक फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि बाकी सभी धाराओ की तरह धारा 124ए को भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ अनुकूलता में देखा जाना चाहिए.
इस तरह देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी धारा 124ए में एक तरह का संशोधन ही थी. इसके बावजूद देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए गए अधिकतर लोगों के मामलों में इस टिप्पणी का कहीं से भी पालन होता नहीं दिखता. ऐसे में क्या यह जरूरी नहीं कि एक बार फिर से इस धारा के दायरे को लेकर एक साफ लकीर खींची जाए?