एक पुरानी याद है. सिंगल स्क्रीन वाले समय की. एक सिनेमा हाल की, जिसकी चरमराती कुर्सियां खाली नहीं थीं. जोड़े में आई आंखें वहां शाइनी आहूजा के लिए नहीं थीं. वे भट्ट छाप सिनेमा की उस नई अभिनेत्री को देखने आई थीं जिसके लंबे-बेपरवाह बाल कुछ यूं घुंघराले थे जैसे बादल पर चढ़कर समंदर की लहरें उड़ रहीं हों. वो इतनी पतली और लंबी-सी थी कि उस समय की हिंदुस्तानी अभिनेत्रियों जैसी नहीं बल्कि हालीवुड की स्टाइलिश अभिनेत्री लगती थी. वो परदे पर कितनी खूबसूरत लगने वाली है और इमरान हाशमी के साथ उनके प्रेम में वहां क्या-क्या होने वाला है, देखने को आतुर बैठी सैकड़ों आंखों ने फिर उस सिनेमा हाल में वही सब देखा जो ‘गैंगस्टर’ दिखाना चाहती थी.

उस समय किसी को उस एक्ट्रेस के अभिनय की चिंता नहीं थी. दर्शकों को तो बिलकुल भी नहीं. निर्देशक को इसलिए नहीं क्योंकि उनके पास प्रीतम और इमरान हाशमी थे. अभिनेत्री को इसलिए नहीं क्योंकि गैंगस्टर उसकी पहली फिल्म थी, और उसने शायद सुन रखा था कि अभिनय करने की चिंता चिता समान होती है, और ऐसी चिंताओं की शुरूआत आंखों के नीचे डार्क सर्कल्स से होती है.

इंडस्ट्री ने सत्रह साल की इस लड़की को टूटे हुए, दुखी, प्यार में बिखरे हुए और शराबी हो चुके किरदार दिए तो उसने उन्हें ही अपनी पहचान बना लिया

इसलिए कंगना रनोट (राणावत नहीं) नाम की हिमाचल के पहाड़ों से आई उस अभिनेत्री ने कभी अभिनय करने की चिंता नहीं की. जैसा होता गया, और जैसा इंडस्ट्री डिमांड करती रही, वो करती रही. उसका इंडस्ट्री में कोई गॉडफादर नहीं था और परिवार भी उसके साथ नहीं था. इसलिए जब इंडस्ट्री ने सत्रह साल की उस लड़की को टूटे हुए, दुखी, प्यार में बिखरे हुए और शराबी हो चुके किरदार दिए – मीना कुमारी वाले पैरहन में – तो उसने उन्हें ही अपनी पहचान बना लिया.

पहचान जल्द ही स्टीरियोटाइप में बदल गई. सबने उसे उन्हीं किरदारों लायक समझा जिनमें अभिनय कम होता था और अति की तीव्रता ज्यादा. कुछ समय बाद, ‘फैशन’ के ऐसे ही एक किरदार ने उसे 19 साल की उम्र में सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कार तक दे दिया. इसके बाद इंडस्ट्री ने टेलेंट पहचानकर कंगना के लिए उस रास्ते का कर्फ्यू समाप्त कर दिया जिस पर चलकर मुख्यधारा के वे किरदार मिलते हैं, जो खूबसूरत कपड़ों में खूबसूरत मुस्कान बिखेरकर फिल्म को खूबसूरती का टेक्स्चर देते हैं.

मुख्यधारा की इन फिल्मों ने कंगना के खराब अभिनय के हर आयाम से हमको परिचित करवा दिया. अभी तक जो अभिनय हायपरएक्टिव किरदारों के पागलपन के पीछे छिपकर बैठा था, सबके सामने आ गया. अभिनय नहीं सीखी हुई अनगढ़ कंगना अनियंत्रित सांसों वाली बेहद खराब संवाद अदायगी से फिल्म दर फिल्म हमें अपने आप से दूर करती रहीं. क्लोज-अप में भाव जाहिर करने में आने वाली परेशानी परदे पर चौतरफा नजर आने लगी. जिन किरदारों के लिए वे नहीं बनी थीं और जिनके लिए उन्हें बनना था, लेकिन नहीं बन पा रहीं थीं, ऐसे कई किरदार वे निभाती गईं और फिल्में खराब होती गईं. उन्होंने हर दिशा की फिल्में साइन करना शुरू कर दीं, वहीं हमने ‘डबल धमाल’ और ‘रास्कल्स’ के बाद कंगना रनोट की फिल्में देखना छोड़ दीं. वह उम्मीद भी छोड़ दी जो उम्मीद जगाती किसी अभिनेत्री से मिलती है. और ऐसा करके हमने गलती कर दी.

इसके बाद कंगना ने अपने अभिनय-जीवन का पन्ना पलटकर नई तरह से लिखना शुरू किया. उन्होंने शायद समझ लिया था कि एक वक्त बाद, अच्छा अभिनेता वह होता है जो अच्छी फिल्में चुनता है. इसका सबसे बेहतर उदाहरण आमिर खान हैं जिनकी फिल्मों के चयन ने ही एक औसत अभिनय क्षमता वाले सुपरस्टार को दर्शकों की नजर में महान अभिनेता बना दिया है.

कभी शादी नहीं करने का ऐलान कर देना, अपनी खराब अंग्रेजी को सुधारना तो इस बात को छिपाना नहीं, जैसी अनोखी कारस्तानियों ने कंगना को बाकी समर्थ अभिनेत्रियों से अलग कर दिया है

फिर जो हुआ सब जानते ही हैं. ‘तनु वेड्स मनु’ में जिस कंगना के अभिनय की झलक मिली थी, वह ‘क्वीन’ में अभिनय की महारानी बन गई. अब क्लोज-अप में उनके चेहरे पर अजीब-गरीब एक्सप्रेशन तो आ ही नहीं रहे थे, डायलॉग डिलीवरी भी इतनी बदल चुकी थी कि यकीन करना मुश्किल था. उनके अभिनय से प्यार किया जा सकता था क्योंकि वह हमें यकीन दिला रहा था कि इंसान (आदमी हो या औरत) अकेले भी मजे की जिंदगी जी सकता है. उनके अभिनय ने क्वीन को उस दर्जे की फिल्म बना दिया कि उसे हमारे देश का इकलौता सम्माननीय सम्मान – और इसी वजह से दुर्लभ भी - राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया. सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का. उन्हें भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.

लेकिन कंगना रनोट की तारीफ सिर्फ क्वीन के लिए नहीं होनी चाहिए. ‘रिवाल्वर रानी’ के लिए भी होनी चाहिए. फिल्म कम चली क्योंकि उसमें स्थानीय इलाके वाला लोकल ह्यूमर ज्यादा था. लेकिन फिल्म शानदार के स्तर की थी और कंगना ने वह बोल्ड किरदार निष्ठा से निभाकर दर्शा दिया था कि क्वीन सिर्फ एक तुक्का नहीं है, वे अच्छी-सार्थक फिल्में करने को लेकर – आखिरकार - गंभीर हैं.

कंगना की तारीफ उनकी बेबाकी के लिए भी हो रही है और होती रहनी चाहिए. लेकिन यह भी सच है कि सफलता के बाद की बेबाकी सभी को पसंद आती है. वक्त बदलने से पहले इसी बेबाकी को मुंहफट कहकर खारिज किया जाता है. मगर यह भी सच है कि सफलता के बाद ही लोग सधी चाल चलते हैं, कुछ भी गलत नहीं करते-बोलते हैं. दीपिका पादुकोण इसका उदाहरण हैं. इसलिए कंगना की बेबाकी में सच की खनक है. उनके बेबाक साक्षात्कारों का सोशल मीडिया में वायरल होना, ‘मैंने लेने से मना कर दिए थे, इसीलिए प्रियंका चोपड़ा को सारे अवार्ड मिले’ जैसी सीधी-सपाट बात कर जाना, भारतीय समाज के खोखले संस्कारों पर तंज कर देना, कभी शादी नहीं करने का ऐलान कर देना, बिना किसी गॉडफादर के अपनी ठसक से अपना मुकाम बनाना, सफलता के शोर के बीच में स्क्रिप्ट-राइटिंग के कोर्स के लिए न्यूयार्क जाना, अपनी खराब अंग्रेजी को सुधारना तो इस बात को छिपाना नहीं, जैसी अनोखी कारस्तानियों ने उन्हें अपने वक्त की बाकी समर्थ अभिनेत्रियों से अलग कर दिया है. इतना अलग जितना कोई फिल्मी किरदार कभी नहीं कर सकता.

यह भी आखिरी सच है कि कंगना रनोट की यह ‘क्वीन-साइज’ सफलता किरदार केंद्रित ज्यादा है. अगर ऐसे किरदार न लिखे गए होते, हो सकता है इस अलग कंगना से हम मिले ही न होते. जब तक उन्हें ऐसे कैरेक्टर निभाने के लिए मिलते रहेंगे, और वे उस तरह के कमर्शियल सिनेमा से दूर रहेंगी जिससे वे पहले दूर नहीं रहती थीं, हमारे करीब रहेंगी. हमसे दूर जाएंगी, तो हमें भी मुंह मोड़ के अपने से दूर खड़ा पाएंगीं. इस बार शायद, हमेशा के लिए.