बहुत सी भारतीय महिलाओं ने नौकरीपेशा जीवन जीते हुए दुनिया भर में अपनी उपलब्धियों का डंका बजाया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत में काम करने वाली महिलाओं के लिए हालात अच्छे हैंं.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्ध पत्रिका फोर्ब्स हर साल दुनिया की 100 सबसे प्रभावशाली महिलाओं की सूची जारी करती है. साल 2014 में जब इस पत्रिका ने अपनी सबसे नई सूची जारी की तो उसमें भारत की पांच महिलाएं भी शामिल थी. इनमें से दो अरुंधति भट्टाचार्य व चंदा कोचर क्रमश: भारतीय स्टेट बैंक तथा आईसीआईसीआई बैंक की कमान संभाल रही हैं. इससे पहले भी कई दूसरी भारतीय महिलाएं इसी तरह फोर्ब्स की सूची में शामिल होती रही हैं. खास बात यह है कि इन महिलाओं में अधिकतर वे हैं जिन्होंने नौकरीपेशा जीवन जीते हुए यह मुकाम हासिल किया है. इस लिहाज से देखा जाए तो कई लोगों को लग सकता है कि भारत में महिलाओं के लिए नौकरी करने की परिस्थितियां बहुत अनुकूल हैं.
सबसे चिंता की बात यह है कि भारत की कामकाजी आबादी में महिलाओं की भागीदारी लगातार कम होती जा रही है. ग्रामीण भारत में 11 साल के दौरान कामकाजी आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी 35 से गिरकर 30 फीसदी रह गई.
लेकिन सच्चाई यह नहीं है. दरअसल भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां नौकरीपेशा महिलाओं के लिए काम करने की स्थितियां बेहद खराब हैं. यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक माने जाने वाले देशों में सबसे ऊपर बताया जाने वाला सोमालिया तक इस मामले में बेहतर स्थिति में है. वहां कुल कामकाजी आबादी में महिलाओं की संख्या 37 फीसदी है जबकि भारत के लिए यह आंकड़ा 25.5 फीसदी है. दुनिया में एक नई तरह की ताकत के रूप में सामने आने वाले ब्रिक्स देशों में भी इस लिहाज से भारत सबसे निचले पायदान पर है.
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री विनोज इब्राहिम ने एक शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला है. साल 2011 तक के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद उन्होंने जितना कुछ भी इस शोध के जरिए जुटाया है वह कहीं से भी नौकरीपेशा महिलाओं के संदर्भ में भारत की स्थिति को संतोषजनक नहीं दिखाता. शोध के मुताबिक सबसे चिंता की बात यह है कि भारत की कामकाजी आबादी में महिलाओं की भागीदारी लगातार कम होती जा रही है.
क्या है कामकाजी महिलाओं का आंकड़ा ?
इस शोध के मुताबिक भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वालों की कुल संख्या का अध्ययन करने पर पता चलता है कि इन क्षेत्रों में साल 2011 में महिलाओं की भागीदारी मात्र 25.5 प्रतिशत थी. सिर्फ ग्रामीण भारत की ही बात करें तो 1999-2000 से लेकर 2011-12 तक की अवधि के दौरान कामकाजी आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी 35 से गिरकर 30 फीसदी रह गई. इस दौरान शहरी भारत की बात करें तो यह आंकड़ा लगभग एक समान (20 प्रतिशत) ही रहा है. हालांकि उनकी संख्या एक करोड़ 90 लाख से बढ़कर दो करोड़ 90 लाख तक पहुंच गई है. ग्रामीण क्षेत्रों में उनका 80 फीसदी हिस्सा खेती में लगा है जबकि शहरों में कामकाजी महिलाओं की सबसे बड़ी भागीदारी अदर सर्विसेज जैसे क्षेत्रों में है जिनमें घरों में झाड़ू-पोछा और खाना बनाने जैसे काम शामिल हैं. इंजीनियरिंग और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में उनकी हिस्सेदारी 16 और 18 फीसदी है. इसका एक मतलब यह है कि अच्छी शिक्षा और रोजगारपरक प्रशिक्षण के मामले में आधी आबादी अब भी काफी पीछे है.
कारण
भारत में नौकरी पेशा महिलाओं के लिए परिस्थितियों के इस कदर चिंता जनक होने के पीछे जानकारों को कई सारी वजहें दिखती हैं. जानकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि कार्य क्षेत्रों से महिलाओं की इस गिरती दर के लिए उनकी पारिवारिक परिस्थितियां सबसे ज्यादा जिम्मेदार मानी जा सकती है. क्योंकि अक्सर यद देखा जाता है कि बच्चों की परवरिश, पारिवारिक दबाव और सामाजिक नियम कायदों की मजबूरी के चलते महिलाएं अट्ठी खासे पदों पर रहने के बावजूद नौकरी छोड़ देती हैं. इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्ता परक शिक्षा की कमी के चलते भी कई महिलाएं सीमित दायरे वाली नौकरियां ही कर पाती हैं, जिनमें तरक्की के बहुत कम मौके होते हैं और उनके पद भी स्थायी नहीं होते. इस वजह से कई महिलाएं कुछ साल ही ठीक से नौकरी कर पाती हैं और फिर उन्हें घर बैठ जाना पड़ता है.
समाधान
नौकरीपेशा महिलाओं के लिए भारत में अनुकूल परिस्थितियां एक अपरिहार्य जरूरत है. लेकिन भारत में जिस तरह से कई दूसरे क्षेत्रों में भी महिलाएं भेदभाव की शिकार हैं, उसे देखते हुए यह जल्द होना संभव नहीं लगता. जेनेवा स्थित वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम के सालाना जेंडर गैप इंडेक्स के पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि भारत की महिलाएं स्वास्थ्य, शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में बहुत ज्यादा विषमता की शिकार हैं. दुनिया के 140 से अधिक देशों से जुटाए गए ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मामले में भारत इन देशों में 114 वें स्थान पर है. यानी भारत उन सबसे निचले तीस देशों में शामिल है जो महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा भेदभाव करते हैं.