पश्चिमी देशों के साथ ईरान की परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी बातचीत अंतिम दौर में पहुंच गई है और भारत सहित पूरी दुनिया की नजर इसपर लगी है.
स्विट्जरलैंड के दुसान में इस समय ईरान और पी5+1 के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी बातचीत अंतिम दौर में पहुंच चुकी है. पी5+1 देशों के समूह में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी देश- अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन के साथ जर्मनी शामिल है. उम्मीद जताई जा रही है कि यह बातचीत पिछले 12 साल से चले आ रहे विवाद के समाधान की दिशा तय कर देगी.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम 2002 में दुनिया की नजर में आया. तब सरकार विरोधी एक विपक्षी गुट ने यह जानकारी उजागर की थी कि ईरान गुप्तरूप से यूरेनियम परिशोधन और हैवी वॉटर रिएक्टर के निर्माण में लगा हुआ है. परिशोधित यूरेनियम परमाणु रिएक्टर में ईंधन का काम तो करता है लेकिन, इसका उपयोग परमाणु बम बनाने में भी किया जा सकता है.
सऊदी अरब के लिए ईरान की ताकत बढ़ने का मतलब है क्षेत्र में शियाओं का प्रभुत्व बढ़ना. सुन्नी रियासत को यह मंजूर नहीं है. उसका आरोप है कि तेहरान परमाणु हथियार संपन्न हो गया तो क्षेत्र में शिया-सुन्नी संघर्ष बढ़ेगा
इसके बाद से पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका ने ईरान पर परमाणु कार्यक्रम रोकने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. पश्चिम एशिया का यह देश उसी समय से दावा कर रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. लेकिन पश्चिम के दबाव के चलते वह आखिरकार अपने यहां अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (आईएईए) के दल के दौरे के लिए सहमत हो गया. आईएईए की जांच से यह साफ नहीं हुआ कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर रहा है या नहीं. लेकिन एजेंसी ने इसे परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) का मामला बताते हुए 2005 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को सौंप दिया.
2005 के बाद से सुरक्षा परिषद ईरान के खिलाफ छह प्रस्ताव पारित कर चुकी है और कुछ प्रतिबंध लगा चुकी है. 2012 के बाद अमेरिका और यूरोपीय यूनियन ने ईरान पर कई अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए. इनका असर यह रहा कि ईरान का तेल निर्यात और बैंकिंग कारोबार बुरी तरह लड़खड़ा गया.
ईरान के साथ ताजा वार्ता की पृष्ठभूमि नवंबर, 2013 में उस समय बनी जब पी5+1 देशों ने परमाणु कार्यक्रम में आंशिक कटौती के बाद कुछ प्रतिबंध समाप्त कर दिए. कुछ समय की बातचीत के बाद इस मसले के समाधान के लिए जुलाई, 2014 की समयसीमा तय कर ली गई. हालांकि दोनों पक्ष इस समयसीमा में किसी ठोस समाधान तक नहीं पहुंचे. इसके बात यह समयसीमा एक मार्च, 2015 कर दी गई और अब इसे 31 मार्च तक बढ़ा दिया गया है. परमाणु कार्यक्रम में तकनीकी पक्ष पर समझौते की समयसीमा एक जुलाई, 2015 निर्धारित है.
मार्च की शुरुआत में माना जा रहा था कि महीना खत्म होते-होते ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई समझौता हो जाएगा. लेकिन पिछले एक हफ्ते विदेशी मीडिया में आई खबरों को देखें तो पता चलता है कि अभी तक दोनों पक्ष किसी महत्वपूर्ण समझौते पर नहीं पहुंच पाए हैं. हालांकि साथ में कहा जा रहा है कि एक दो दिनों में समझौते के प्रारूप से जुड़ा कोई दस्तावेज जारी किया जाएगा. यह अंतिम समझौता नहीं होगा जिसकी उम्मीद जताई जा रही थी.
ताजा बातचीत का सबसे बड़ा रोड़ा ये है कि ईरान संयुक्त राष्ट्र के सभी प्रतिबंधों, खासकर परमाणु अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों पर लगी रोक को तुरंत हटाने की मांग कर रहा है
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पिछले एक दशक को देखें तो यह कूटनीतिक मोर्चे की सबसे चर्चित और जटिल बातचीत साबित हुई है. इसके जटिल होने की सबसे बड़ी वजह है समझौते में शामिल भागीदारों की मांगें और समझौते से पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ने की आशंका. भारत भी अप्रत्यक्ष रूप से इस समझौते से प्रभावित होगा.

बातचीत में शामिल पक्ष और उनकी मांगें :

ईरान क्या चाहता है ?
पश्चिम एशिया का यह देश चाहता है कि उसके ऊपर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं और उसके परमाणु कार्यक्रम को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिल. ताजा बातचीत का सबसे बड़ा रोड़ा ये है कि ईरान संयुक्त राष्ट्र के सभी प्रतिबंधों, खासकर परमाणु अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों पर लगी रोक को तुरंत हटाने की मांग कर रहा है.
कहा जा रहा है कि इस समझौते पर ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी का पूरा राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा हुआ है. वे ईरान के कट्टरपंथी धड़े के खिलाफ जाकर अमेरिका और पश्चिमी देशों से बातचीत कर रहे है. यदि यह समझौता कारगर रहा तो ईरान की अर्थव्यवस्था खस्ताहालत से उबर जाएगी. ईरान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल और दूसरा सबसे बड़ा गैस उत्पादक देश है. बातचीत सफल रहती है तो वह इन संसाधनों के इस्तेमाल से जल्दी ही अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर ले आएगा. इसके अलावा देश में विदेशी निवेश का भी रास्ता खुल जाएगा.
अमेरिका की मुश्किल
ईरान जिस मात्रा और तेजी से यूरेनियम का परिशोधन कर रहा है वह अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता है. पिछले महीने अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक साक्षात्कार में कहा था कि किसी भी समझौते में ईरान को अपनी परमाणु गतिविधियों पर कम से कम दस साल के लिए रोक लगानी होगी. अमेरिका इसके लिए बातचीत में एक लिखित आश्वासन चाहता है. लेकिन ईरान पहले ही इस बात को नकार चुका है. वह जुलाई के पहले किसी भी लिखित समझौते को स्वीकार करना नहीं चाहता.
ईरान की घरेलू मुश्किलों से अलग ओबामा के लिए भी राजनीतिक स्तर पर यह मामला सुलझाना आसान नहीं है. अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकनों का बहुमत है और वे परमाणु कार्यक्रम पर ईरान को किसी भी तरह की ढील देने के पक्ष में नहीं हैं. रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों ने नौ मार्च को ईरान सरकार को पत्र लिखकर बता दिया है कि वे हर हाल में समझौता खारिज करेंगे.
पी5+1 के देश क्या चाहते हैं ?
फ्रांस समझौते को 15 साल तक बढ़ाना चाहता है. और इसके बाद आईएई द्वारा दस साल की निगरानी अवधि तय करना चाहता है. ये सभी देश सामूहिक रूप से ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाना चाहते हैं. मंदी के दौर से गुजर रहे यूरोप के लिए ईरान से कारोबारी संबंध बहुत फायदेमंद साबित होंगे.
सऊदी अरब और इजरायल की चिंताएं
ये दोनों देश बातचीत में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हैं लेकिन, समझौते से जुड़ी एक बड़ी बहस इनको लेकर ही है. ईरान इजरायल को मान्यता नहीं देता. ऐसे में ज्यादातर इजरायलियों के लिए यह पड़ोसी देश उनके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है. इजरायल के बारे में कहा जाता है कि वह पश्चिम मध्य एशिया का अकेला देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं. वह अतीत में कह भी चुका है कि कभी नौबत आई तो ईरान पर परमाणु हमला करने से नहीं चूकेगा.
सऊदी अरब के लिए ईरान की ताकत बढ़ने का मतलब है क्षेत्र में शियाओं का प्रभुत्व बढ़ना. सुन्नी रियासत को यह मंजूर नहीं है. उसका आरोप है कि तेहरान परमाणु हथियार संपन्न हो गया तो क्षेत्र में शिया-सुन्नी संघर्ष बढ़ेगा.
समझौता हुआ तो भारत को क्या मिलेगा?
भारत खाड़ी के देशों से अपनी जरूरत का तकरीबन 80 फीसदी तेल और गैस आयात करता है. 2006 में प्रतिबंध लगने के पहले ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था. इन प्रतिबंधों की वजह से भारत का तेल आयात इराक पर निर्भर हो गया. ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई समझौता होता है कि भारतीयों के लिए सस्ते कच्चे तेल का एक और स्रोत खुल जाएगा.
इस समय भारतीय तेल कंपनियां ओएनजीसी विदेश और रिलायंस इंडस्ट्रीज इराक में निवेश के प्रस्ताव पर चर्चा कर रही हैं. उम्मीद जताई जा रही है कि ईरान समझौते के बाद इन कंपनियों को निवेश के लिहाज से भी काफी अच्छे अवसर उपलब्ध कराएगा.