कारोबार जगत में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन देने के लिए साल भर पहले सेबी ने जो फैसला सुनाया था उसका 313 कंपनियों ने अब तक पालन नहीं किया और जिन्होंने किया भी उनमें से बहुतों ने इसका मखौल उड़ाया.
कारोबार जगत में शीर्ष स्तर पर महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन देने के लिए बीते साल भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक अहम फैसला सुनाया था. सेबी ने एनएसई में सूचीबद्ध 987 कंपनियों को निर्देश दिया था कि वे अपने निदेशक मंडल में कम से कम एक महिला निदेशक की नियुक्ति करें. इसके लिए आखिरी समय सीमा 31 मार्च 2015 तय की गई. लेकिन अब भी 313 कंपनियों ने इस फैसले का पालन नहीं किया है. एनएसई में कुल 1478 कंपनियां सूचीबद्ध हैं. आखिरी तारीख पास देखकर कई कंपनियों ने अफरा-तफरी में महिला निदेशक की नियुक्ति भी की तो उससे इस फैसले के पीछे की भावना का मखौल ही उड़ा. यानी इन मामलों में सक्षमता की बजाय रिश्तेदारी को तरजीह दी गई.
कंपनी कानून 2013 के मुताबिक सालाना 300 करोड़ रुपये से ज्यादा टर्नओवर वाली कंपनियों के निदेशक मंडल में कम से कम एक महिला होना जरूरी है. सेबी के मुताबिक अब भी शीर्ष 500 कंपनियों में करीब एक तिहाई ऐसी हैं जिनमें एक भी महिला निदेशक नहीं है.
गौरतलब है कि कंपनी कानून 2013 के मुताबिक सालाना 300 करोड़ रुपये से ज्यादा टर्नओवर वाली कंपनियों के निदेशक मंडल में कम से कम एक महिला होना जरूरी है. सेबी के मुताबिक अब भी शीर्ष 500 कंपनियों में करीब एक तिहाई ऐसी हैं जिनमें एक भी महिला निदेशक नहीं है. सेबी के चेयरमैन यूके सिन्हा ने कुछ समय पहले इस स्थिति को शर्मनाक बताया था. उन्होंने तय समय सीमा के भीतर इस फैसले का पालन न करने वाली कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भी दी थी.
क्या कार्रवाई हो सकती है?
जानकार बताते हैं कि तय सीमा में महिला निदेशक नियुक्त नहीं किए जाने पर सेबी के पास कंपनियों पर पेनल्टी लगाने का अधिकार है. लेकिन ऐसी कंपनियों की संख्या अगर ज्यादा होती है तो वह एक बार फिर कंपनियों को चेतावनी जारी कर सकता है और उन्हें जल्द से जल्द महिला निदेशक नियुक्त करने को कह सकता है.
सेबी दो बार तय समय सीमा बढ़ा चुका है. पहले उसने इसके लिए एक अक्टूबर 2014 आखिरी तारीख तय की थी. इसके बाद यह छह महीने बढ़ाकर 31 मार्च कर दी गई. सेबी की ओर से हाल में इस बात के संकेत दिए गए थे कि इसे आगे बढ़ाने की उम्मीद कम है.
सक्षमता की बजाय रिश्तेदारी को तरजीह
उधर, तय समय सीमा पास आते ही कंपनियों में अफरा-तफरी मच गई. खबरों के मुताबिक अकेले मार्च में ही 119 कंपनियों ने महिला निदेशक की नियुक्ति की. जानकार मानते हैं कि इससे महज कागजी खानापूरी हो रही है और महिला निदेशकों की नियुक्ति के पीछे जो मकसद था वह पूरा नहीं हो रहा. यह मकसद था लैंगिक विविधता को प्रोत्साहन देना.
जानकारों के मुताबिक ऐसा नहीं है कि सक्षम महिलाओं की कमी है, लेकिन प्रोमोटर निदेशक मंडल में ऐसी महिलाओं की मौजूदगी को लेकर सहज नहीं है और इसलिए वे परिवार की ही किसी महिला को निदेशक मंडल में शामिल करके कागजी कार्रवाई पूरी कर रहे हैं. बताया जाता है कि ऐसी 83 कंपनियां हैं जिन्होंने यह किया है. इनमें रिलांयस इंडस्ट्रीज, वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज, जेके टायर एंड इंडस्ट्रीज, बजाज कॉरपोरेशन और टीवीएस मोटर कॉरपोरेशन शामिल हैं. हालांकि सरकारी कंपनियों के मामले में यह दोष सरकार का है जो निदेशक मंडल की नियुक्तियां करने के लिए जिम्मेदार होती है.
भारत पहला ऐसा विकासशील देश है, जिसने महिला निदेशक की नियुक्ति को जरूरी बनाया है. अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मंचों के दबाव के बाद भारत ने कानून में बदलाव कर लैंगिक विविधता के लिए प्रतिबद्धता जाहिर की थी. लेकिन जो वास्तव में हो रहा है उससे इस प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.