गुजरात सरकार के विवादित आतंकवाद विरोधी बिल, 'गुजरात स्टेट कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम' (गुजकोक) को राज्य विधानसभा से हरी झंडी मिल गई है. मंगलवार को मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल द्वारा इसे विधानसभा में पेश किए जाने के बाद यह पास हो गया. हालांकि विपक्षी पार्टी कांग्रेस के विधायक इस बिल का विरोध करते रहे और उन्होंने इसके खिलाफ सदन से वॉक आउट भी किया. लेकिन राज्य सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होने के चलते इस विरोध की कुछ नहीं चल सकी. इससे पहले भी राज्य सरकार तीन बार (2004, 2008, 2011) इस बिल को विधानसभा से पास करवा चुकी थी, लेकिन तीनों ही बार इसे राष्ट्रपति  (डॉ अब्दुल कलाम तथा प्रतिभा पाटिल) ने नामंजूर कर दिया था. इसकी वजह यह थी कि इस बिल के कुछ प्रावधान इतने विवादित थे, जिनके चलते इस कानून का दुरुपयोग होने की अधिक संभानवाएं थी. बिल में जहां पुलिस को जरूरत से ज्यादा अधिकार देने की बात कही गई थी, वहीं दूसरी तरफ आरोपियों को मिलने वाली जमानत की शर्तों को भी काफी कठोर किया गया था. सूत्रों की मानें तो अभी भी ये प्रावधान मामूली संशोधनों के साथ बिल में मौजूद हैं, लेकिन केंद्र में एऩडीए की सरकार होने के चलते गुजरात सरकार को उम्मीद है कि इस बार उसकी राह का कांटा आसानी से निकल जाएगा. यह बिल सबसे पहले 2003 में तब लाया गया था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे.
बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आडवाणी, जोशी समेत 20 को नोटिस भेजा
1992 के बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह तथा केंद्रीय मंत्री उमा भारती समेत 20 लोगों को नोटिस भेजा है. याचिकाकर्ता महमूद अहमद की अपील पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह नोटिस भेजा है. कोर्ट का कहना है कि चार हफ्ते के अंदर इस नोटिस का जवाब दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट का यह नोटिस ऐसे समय में आया है जब लालकृष्ण आडवाणी को एक दिन पहले ही देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है. याचिकाकर्ता महमूद अहमद ने बाबरी विध्वंस से संबंधित उस मामले में यह अपील दायर की है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पांच साल पहले इन सभी नेताओं को बरी कर दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला 20 मई 2010 को आया था, लेकिन सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने में नौ महीने का समय लगा दिया था, जबकि कानूनी तौर पर यह अपील तीन महीने के अंदर की जानी चाहिए थी. उस वक्त सीबीआई पर इन नेताओं को बचाने के आरोप भी लगे थे. बहरहाल अब याचिकाकर्ता महमूद अहमद की अपील को स्वीकार करके सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को फिर से ताजा कर दिया है. यह मामला 22 साल पुराना है. तब बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद भाजपा और आरएसएस के सीनियर नेताओं के खिलाफ अदालत में मुकदमा दर्ज किया गया था. इन सभी पर आपराधिक षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया गया था. लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इन सभी पर लगे आरोपों को खारिज कर दिया था. इसके बाद यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहुंचा था.
केजरीवाल पर लगा फर्जी फोन करवाने का आरोप
आम आदमी पार्टी की पिछली 49 दिनों की सरकार के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अक्सर भाजपा नेताओं पर आप के विधायकों को खरीदने का आरोप लगाते थे. तब वे कहा करते थे कि भाजपा के कुछ बड़े नेता उनकी पार्टी के विधायकों को फोन करके पैसों का लालच दे रहे हैं. लेकिन अब इस मामले में एक चौंकाने वाला आरोप सामने आया है. आरोप यह है कि आप विधायकों को ये फोन कॉल भाजपा नेता नहीं बल्कि खुद अरविंद केजरीवाल करवाते थे. यह आरोप आम आदमी पार्टी से कुछ ही दिन पहले निकाले गए पूर्व विधायक राजेश गर्ग ने लगाया है. उनका कहना है कि दिसंबर, 2013 में भाजपा नेता अरुण जेतली और नितिन गडकरी के नाम से जो भी फोन आम आदमी पार्टी के विधायकों को आते थे, वे सभी फर्जी थीं और उन्हें खुद अरविंद केजरीवाल करवाते थे. राजेश गर्ग का कहना है कि इसका पता उन्हें तब चला जब पुलिस में शिकायत करने के बाद फोन करने वाले शख्स को पकड़ा गया. गर्ग का कहना है कि केजरीवाल के पीए और दूसरे आप नेता संजय सिंह ने उनसे उस शख्स को छुड़वाने में मदद करने को कहा था. इसके अलावा उन्होंने कहा कि संजय सिंह ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि इस तरह के फोन कॉल पार्टी (केजरीवाल) ही करवा रही थी. गर्ग के इस आरोप पर आम आदमी पार्टी ने अभी तक कोई सफाई नहीं दी है.