क्या सिर्फ़ शरीर, कपड़ों और साइज को लेकर अपनी मर्ज़ी और अपने तरीके से जीना ही 'एम्पावरमेंट' है?
जिन दिनों मैंने कुछ अपनी मर्ज़ी और कुछ मजबूरी से, ख़बरों की दुनिया से ख़ुद को काट रखा है, उन्हीं दिनों एक वीडियो पर सोशल मीडिया में मज़ेदार बहस छिड़ी है. जब तक मैं वोग इंडिया के 'एम्पावर' वीडियो तक पहुंची, तब तक मुझसे पहले 51 लाख से ज़्यादा बार इसे देखा जा चुका था और हज़ारों कमेंट पेज पर पहले से भरे पड़े थे. हालांकि एक लूप में छह बार वीडियो देख लेने के बाद भी मुझे समझ में नहीं आया कि इसमें 'एम्पावरमेंट' कहां है!
मुझे एक और बात समझनी है. इस वीडियो को लेकर इतना हल्ला क्यों है? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि निन्यानवे औरतें दीपिका पादुकोण की अगुआई में अपनी मर्ज़ियों का, अपनी ख़्वाहिशों का बखान कर रही हैं? या बहस मर्ज़ियों की उस लिस्ट पर छिड़ी है जो बेधड़क शादी से पहले या उसके बाहर सेक्स या बच्चे पैदा न करने या अपने तरीके से प्यार करने या रात को घर न आने का ढिंढोरा पीट रही है? या शोर इसलिए है कि इन मर्ज़ियों का हमारी-आपकी मर्ज़ियों से कोई वास्ता नहीं है?
बहस मर्ज़ियों की उस लिस्ट पर छिड़ी है जो बेधड़क शादी से पहले या उसके बाहर सेक्स या बच्चे पैदा न करने या अपने तरीके से प्यार करने या रात को घर न आने का ढिंढोरा पीट रही है? या शोर इसलिए है कि इन मर्ज़ियों का हमारी-आपकी मर्ज़ियों से कोई वास्ता नहीं है?
मैं एक बार के लिए इस पूरी बहस से दीपिका पादुकोण को बाहर रखकर देखना चाहती हूं. क्योंकि बात दीपिका की है ही नहीं. बात सिर्फ़ औरतों की भी नहीं है. ये जो मर्ज़ी है - च्वाइस, वह किसकी ख़्वाहिश नहीं होती? अपने तरीके से अपनी पसंद की ज़िन्दगी जीने की इस मर्ज़ी का उम्र, जेंडर, जगह, समाज से कोई वास्ता नहीं होता. इंसान की पूरी ज़िन्दगी ही इस संघर्ष में निकल जाती है कि किस सूरत हम वह बन जाएं, जो हम हो जाना चाहते हैं - अपनी मर्ज़ी के शहंशाह (या अपनी मर्ज़ी की क्वीन!). एक ऐसी दुनिया में होना और जीना हम सबकी ख़्वाहिश होती है, जहां कोई रोक-टोक न हो, जहां अनचाही बंदिशें और क़ायदे हम पर न थोपे जाएं. हमारी सबसे बड़ी तकलीफ़ ही यही होती है कि हमें अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िन्दगी जीने का अक्सर अधिकार नहीं होता. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मर्ज़ी की चादर लड़की के हिस्से आती है तो इतनी भी नहीं होती कि उसे मुंह पोंछने लायक रूमाल भी बनाया जा सके. लेकिन यह मर्ज़ी सशक्तिकरण या बराबरी के नाम पर या वैसे ही किसी को नीचा दिखाने, किसी को तकलीफ़ पहुंचाने से तो जुड़ी नहीं होती. इसका रिश्ता सिर्फ़ प्वाइंट प्रूव करने से नहीं होता.
यह बात अगर दीपिका पर लागू होती है तो उतनी ही फ़िल्मकार होमी अदजानिया पर भी लागू होती है. मर्ज़ियों की ये जो लिस्ट अपनी म्यूज़ दीपिका को होमी ने पकड़ा दी, उसका आधा हिस्सा भी वे अगर अपनी पत्नी (जो इत्तेफ़ाक से वोग इंडिया की फ़ैशन डायरेक्टर भी हैं) के सामने दुहराते तो? मुमकिन है कि होमी की मर्ज़ियां इनसे जुदा न हों, लेकिन ये मुट्ठी भर लोगों की मर्ज़ियां हो सकती हैं. मेरे जैसे किसी आम इंसान की तो नहीं हो सकती. हर 'च्वाइस' अपने साथ एक ज़िम्मेदारी लेकर आती है, और ये बात जितनी दीपिका के मामले में सही है उतनी होमी अदजानिया के बारे में भी, और उतनी ही मेरे-आपके जैसे आम लोगों के लिए भी. पुरुषों के पास विकल्प (या च्वाइस, या मर्ज़ियां) ज़्यादा होते हैं तो उनके हिस्से ज़िम्मेदारियां भी बड़ी होती हैं और होनी भी चाहिए.
'च्वायस' से 'एम्पावरमेंट' का रिश्ता बाज़ार जोड़ता है. घर आपकी पसंद का हो, गाड़ी आपकी पसंद की हो, कपड़े और घड़ियां आपकी पसंद के हों, पति आपकी पसंद का हो... पसंद का, मर्जी का ये सिलसिला अंतहीन है.
हालांकि फ़िल्मकार के तौर पर होमी अदजानिया की डिटेलिंग का कायल हुआ जा सकता है. अपनी फ़िल्मों में होमी अपनी महिला किरदारों को ठीक वही रहने देते हैं जो वो हो जाना चाहती हैं. वे अपनी मर्ज़ी से अपने फ़ैसले लेती हैं. ग़लत या सही - इसका फ़ैसला करने का हक़ दर्शक को भी नहीं. क्योंकि असल ज़िन्दगी की तरह ही होमी की फ़िल्मों में भी किरदारों की मर्ज़ियां और उनके फ़ैसले हालात की उपज होते हैं. इसलिए दीपिका की मर्ज़ियां समझ में आती हैं. दीपिका के साथ फ़िल्म के डायरेक्टर और कॉपीराइटर की मर्ज़ियां भी समझ में आती हैं. वोग इंडिया की मार्केटिंग टीम इस एड के ज़रिए जो लक्ष्य हासिल करना चाहती थी, वह भी समझ में आता है. सिर्फ़ यह समझ नहीं आता कि यह एड या वोग इंडिया किस तरह हिंदुस्तान की औरतों के 'एम्पावरमेंट' यानी सशक्तिकरण का प्रतिनिधि बन गया? अगर एम्पावरमेंट का रिश्ता सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे शरीर, कपड़ों और साइज़ जैसी बाहरी चीज़ों से जुड़ा है तो वोग इंडिया को अपनी डिक्शनरी में फिर से झांकने की ज़रूरत है.
'च्वायस' से 'एम्पावरमेंट' का रिश्ता बाज़ार जोड़ता है. घर आपकी पसंद का हो, गाड़ी आपकी पसंद की हो, कपड़े और घड़ियां आपकी पसंद के हों, पति आपकी पसंद का हो... पसंद का, मर्जी का ये सिलसिला अंतहीन है. इन मर्ज़ियों के केन्द्र में वोग इंडिया की पाठिकाएं हैं, सोशल मीडिया के यूज़र्स हैं. ये तबका आधुनिक और पढ़ी-लिखी युवा महिलाओं का तबका है, जिसके पास खरीदने की शक्ति है. बाज़ार ने इन्हें एंपावरमेंट के नाम पर सिखा दिया है कि इस शक्ति का सही इस्तेमाल अपनी मर्ज़ी से जीने में होता है.
सशक्तिकरण एकांगी नहीं हो सकता, और न सिर्फ़ अपनी बात करना एक पीढ़ी, एक समाज और एक दुनिया को सशक्त बनाता है. एम्पावरमेंट और एम्पावरमेंट पर भरोसा साथ होने से आता है, अकेले बने रहने से नहीं
एक रिश्ता, एक परिवार, एक समाज, आपसी समझ - जो कुछ भी मानवीय और सुन्दर हो सकता है, वह इन दिनों छद्म आधुनिक होने की निरर्थक कोशिशों के तले दफ़न होता दिखता है. शहरी आभिजात्य संस्कृति जिस च्वाइस को लेकर इतना शोर मचाती है, वह च्वाइस पूरे समाज के लिए क्या मायने रखती है? वह च्वाइस क्या एकाकीपन और ख़ुदगर्ज़ी का सबब नहीं बनती? च्वाइस की इस अंधी दौड़ में कस्बे, छोटे शहर और गांव कहां हैं? उनकी संस्कृति, उनकी संवेदनशीलता और उनके रोज़मर्रा के संघर्षों में इस तरह की च्वाइस का कहां स्थान है? क्या च्वाइस एक इलीट मुद्दा नहीं है?
सवाल तो यह भी उठना चाहिए कि क्या अपनी मर्ज़ी और अपने तरीके से, सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिए जीने का मतलब ही 'एम्पावरमेंट' है? ऐसी मर्ज़ियों की मेरी लिस्ट जहां शुरू होती है वहीं किसी के लिए बंदिशों और नियमों की सरहदें बनने लगती हैं. ठीक वैसे ही जैसे किसी और की ऐसी मर्जियां मेरी तकलीफ़ का सबब बनती है. हम अपने लिए और एक-दूसरे के लिए इतना भर याद रख लें तो बहुत होगा. इसलिए क्योंकि सशक्तिकरण एकांगी नहीं हो सकता, और न सिर्फ़ अपनी बात करना एक पीढ़ी, एक समाज और एक दुनिया को सशक्त बनाता है. एम्पावरमेंट और एम्पावरमेंट पर भरोसा साथ होने से आता है, अकेले बने रहने से नहीं.