भारत के रोहन बोपन्ना और कनाडा की गैब्रिएला डाब्रोवस्‍की की जोड़ी ने प्रतिष्ठित फ्रेंच ओपन टूर्नामेंट के मिक्‍स्‍ड डबल्‍स वर्ग का खिताब अपने नाम कर लिया है. फाइनल में उन्होंने कोलंबिया के राबर्ट फारा और जर्मनी की लीना ग्रोएनेफील्ड की जोड़ी को 2-6, 6-2, 12-10 से शिकस्‍त दी. बोपन्ना दूसरी बार किसी ग्रैंडस्लैम के फाइनल में पहुंचे थे. 2010 में उन्होंने पाकिस्तान के ऐसाम उल हक कुरैशी के साथ अमेरिकी ओपन पुरूष युगल फाइनल में जगह बनाई थी जहां उन्हें ब्रायन बंधुओं (बाब और माइक ब्रायन) की मशहूर जोड़ी ने हराया था. इस जीत के साथ रोहन बोपन्ना ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने वाले लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्जा जैसे खिलाड़ियों की सूची में शामिल हो चुके हैं.

लेकिन ऐसा क्यों है कि एक तरफ डबल्स में भारतीय खिलाड़ी असाधारण प्रदर्शन करते हैं वहीं सिंगल्स मुकाबलों में उनका प्रदर्शन औसत से आगे नहीं बढ़ पाता? सानिया मिर्जा डबल्स में छह ग्रैंडस्लैम खिताब जीत चुकी हैं. 2015 में 42 की उम्र में अपना 17वां ग्रैंडस्लैम टाइटल जीतने वाले पेस इस स्तर का खिताब जीतने वाले सबसे उम्रदराज खिलाड़ी बन चुके हैं.

डबल्स में भारतीय खिलाड़ी बीते कुछ समय से लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन जहां सिंगल्स मुकाबलों की बात आती है तो उनकी उपलब्धियां कहीं छोटी नजर आती हैं. सिंगल्स में सानिया मिर्जा कभी 27वीं रैंकिंग से आगे नहीं बढ़ पाईं. कुछ ऐसा ही मामला लिएंडर पेस का भी है जिन्होंने डबल्स और मिक्स्ड डबल्स को मिलाकर 18 ग्रैंड स्लैम खिताब जीते हैं. वे न सिर्फ 40 साल के पार वाली उम्र में ग्रैंडस्लैम जीतने वाले दुनिया के एकमात्र खिलाड़ी हैं बल्कि 100 से ज्यादा जोड़ीदार बनाकर डबल्स मुकाबले खेलने का विश्व रिकॉर्ड भी उनके ही नाम है. पेस 1999 में डबल्स की शीर्ष रैंकिंग पर रह चुके हैं लेकिन सिंगल्स रैंकिंग में वे भी अधिकतम 73वें स्थान तक ही पहुंच सके.

डेविस कप में कृष्णन ने 50 सिंगल्स मैच जीते हैं. यह कारनामा अब तक कोई भारतीय खिलाड़ी नहीं कर पाया. इसलिए उन्हें टेनिस के सिंगल्स मुकाबलों में आज भी भारत का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माना जाता है  

इस बात में कोई दो राय नहीं कि इन दोनों खिलाड़ियों ने भारतीय टेनिस के नाम कई उपलब्धियां दर्ज करवाई हैं. लेकिन एक अलग नजर से देखें तो इनका प्रदर्शन कुछ सवाल भी पैदा करता है. जैसे कि क्या हमारे खिलाड़ियों में सिंगल्स जीतने का दमखम नहीं है इसलिए हमने डबल्स मुकाबलों को अपनी ताकत बना लिया? या फिर डबल्स मुकाबलों को जीतने के लिए एक अलग काबिलियत की जरूरत है जो हमारे खिलाड़ियों में है?

इन दोनों सवालों का सबसे सही जवाब क्या है इसको समझने में भारतीय टेनिस का इतिहास हमारी काफी मदद कर सकता है. इस इतिहास को उन तीन खिलाड़ियों के करियर से समझा जा सकता है जिन्होंने अलग-अलग कालखंड में भारतीय टेनिस का प्रतिनिधित्व किया. इनमें सबसे पहला नाम है रामनाथन कृष्णन का. कृष्णन 1960 और 70 के दशक टेनिस खेला करते थे. उन्हें एक तरह से भारत का सर्वकालिक महान टेनिस खिलाड़ी कहा जा सकता है. 1960-61 में वे सिंगल्स की छठवीं रैकिंग रखते थे और दहाई के नीचे रैंकिंग पाने वाले वे भारत के अब तक अकेले खिलाड़ी हैं. कृष्णन के पिता खुद टेनिस खिलाड़ी थे और उनकी देखरेख में ही कृष्णन ने टेनिस खेलना शुरू किया था.

कृष्णन 1954 में विंबलडन का जूनियर खिताब जीतने वाले एशिया के पहले टेनिस खिलाड़ी बने. बाद के सालों में उन्होंने अपने सभी समकालीन श्रेष्ठ खिलाड़ियों को हराया. 1961 में वे विंबलडन के सेमीफाइनल तक पहुंचे. 1962 में वे चौथी सीड (टूर्नामेंट में खेल रहे खिलाड़ियों की वरीयता) के साथ विंबलडन में शामिल हुए थे लेकिन चोटिल हो जाने के कारण उन्हें इससे हटना पड़ा. डेविस कप में कृष्णन ने 50 सिंगल्स मैच जीते हैं. यह कारनामा अब तक कोई भारतीय खिलाड़ी नहीं कर पाया है. इन्हीं वजहों से उन्हें टेनिस के सिंगल्स मुकाबलों में आज भी भारत का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माना जाता है.

कृष्णन के बाद विजय अमृतराज का दौर आया और एक हद तक उन्होंने अपने पूर्ववर्ती की विरासत को संभाला. अमृतराज ने भी अपने समकालीन कई श्रेष्ठ खिलाड़ियों को हराया, लेकिन वे इसमें उतने सफल साबित नहीं हुए जितने कृष्णन थे. सिंगल्स मुकाबलों में उनकी सबसे अच्छी रैंकिंग 16 रही. अमृतराज के बारे में कहा जाता है कि वे पांच सेट वाले मैचों में शुरुआत तो पूरी दमखम के साथ करते थे लेकिन मैच लंबा खिंचने पर उनके ऊपर थकान हावी हो जाती थी और वे हार जाते थे. शायद यही एक वजह थी कि वे बाद में अपने भाई आनंद के साथ डबल्स मुकाबले खेलने लगे. अमृतराज बंधुओं की इस जोड़ी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खूब नाम कमाया.

मान लिया जाए कि डबल्स खेलने वाला कोई खिलाड़ी दाएं हाथ से खेलता है तो इसकी ज्यादा संभावना होगी कि वह फोरहैंड यानी दाईं तरफ से शॉट मारने में ज्यादा मजबूत हो लेकिन उसका बैकहैंड कमजोर हो सकता है  

लिएंडर पेस को अमृतराज का उत्तराधिकारी कहा जा सकता है. उनका करियर भी कमोबेश उसी रास्ते पर चला. सिंगल्स मुकाबलों में वे भी एक बार शीर्ष वरीयता प्राप्त पीट सैंप्रास को हरा चुके हैं और गाहे-बगाहे अपने से कहीं ऊंची रैंकिंग वाले कुछ और खिलाड़ियों को भी. लेकिन उनके खेल करियर का शीर्ष बिंदु डबल्स मुकाबलों में ही आया और आज 43 साल की उम्र में भी उन्हें डबल्स में दुनिया के सबसे अच्छे खिलाड़ियों में माना जाता है.

भारत में टेनिस के इन तीनों प्रतिनिधि खिलाड़ियों का करियर देखें तो इनमें एक विशेष क्रम नजर आता है. कृष्णन विशुद्ध रूप से सिंगल्स के खिलाड़ी थे तो अमृतराज ने दोनों विधाओं में अपने हाथ आजमाए और कुछ उपलब्धियां अर्जित कीं. वहीं लिएंडर पेस के नाम डबल्स मुकाबलों में ही सबसे ज्यादा उपलब्धियां हैं. यानी बाद के सालों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन डबल्स मुकाबलों में सुधरता गया और सिंगल्स में उनकी रैंकिंग बढ़ती गई. इस क्रम में हम इस समय टेनिस खेल रहे यूकी भांबरी और रोहन बोपन्ना जैसे खिलाड़ियों को भी रख सकते हैं. भांबरी और बोपन्ना भी इस समय अपना सारा ध्यान डबल्स मुकाबलों में लगा रहे हैं.

यह बड़ी विचित्र बात है कि टेनिस की जिस विधा में भारत को सबसे शुरुआती उपलब्धियां मिलीं उसी में वह अब फिसड्डी साबित हो रहा है. यदि हम कृष्णन की तुलना बाकी खिलाड़ियों से करें तो इनमें एक अंतर हमें साफ नजर आता है. इस दक्षिण भारतीय खिलाड़ी के पिता भी टेनिस खिलाड़ी थे और कृष्णन को उन्होंने खुद प्रशिक्षण दिया था. कृष्णन सिंगल्स मुकाबले खेलते हुए बड़े हुए. यह बात उन्हें देश के बाकी खिलाड़ियों से अलग करती है और शायद इसी में इस सवाल का आंशिक जवाब भी छिपा है कि क्यों हमारे यहां अब सिंगल्स के अच्छे खिलाड़ी नहीं हैं.

कृष्णन के पिता ने उनके लिए अपने घर के पास ही एक टेनिस कोर्ट बनवाया था. ऐसी सुविधा देश में हर एक टेनिस खिलाड़ी को नहीं मिल सकती. कहने को इस समय भारत में कई टेनिस कोर्ट हैं लेकिन स्तरीय कोर्ट गिने-चुने क्लबों में हैं. इतनी कम संख्या होने की वजह से हमारे खिलाड़ियों के टेनिस खेलने और सीखने की शुरुआत ही डबल्स मुकाबलों से होती है. लंबे समय तक वे सिंगल्स मुकाबलों की प्रैक्टिस ही नहीं कर पाते. बड़े शहरों में जहां ऐसे कोर्ट हैं वहां टेनिस में रुचि रखने वाले बच्चों को प्रैक्टिस के लिए प्रति घंटे छह सौ से लेकर छह हजार रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं. यह कीमत शहर, कोर्ट और कोच के ऊपर निर्भर करती है. जाहिर है कि दूसरे खेलों के मुकाबले टेनिस भारतीयों के लिए काफी खर्चीला है और यह भी एक वजह है कि खिलाड़ियों को सिंगल्स मैचों की प्रैक्टिस के लिए काफी कम समय मिलता है.

कहने को इस समय भारत में कई टेनिस कोर्ट हैं लेकिन स्तरीय कोर्ट गिनेचुने क्लबों में हैं. इतनी कम संख्या होने की वजह से हमारे खिलाड़ियों के टेनिस खेलने और सीखने की शुरुआत ही डबल्स मुकाबलों से होती है  

डबल्स मुकाबलों से टेनिस का प्रशिक्षण लेने का मतलब है कि खिलाड़ी कोर्ट में किसी एक तरफ ज्यादा मजबूती से खेलेगा और दूसरी तरफ वह कमजोर होगा. मान लिया जाए कोई खिलाड़ी दाएं हाथ से खेलता है तो इसकी ज्यादा संभावना होगी कि वह फोरहैंड यानी दाईं तरफ से शॉट मारने में ज्यादा मजबूत हो लेकिन उसका बैकहैंड कमजोर हो सकता है. सिंगल्स मुकाबलों में आपको लगातार फोरहैंड और बैकहैंड शॉट खेलने पड़ते हैं. जाहिर है ऐसे में वे खिलाड़ी ज्यादा आगे जाएंगे जिनकी सिंगल्स मैच की प्रैक्टिस ज्यादा है. सानिया मिर्जा के खेल में भी यह देखा जा सकता है कि वे बैकहैंड शॉट में विरोधियों के सामने पस्त हो जाती हैं.

एथलेटिक्स की सभी प्रतियोगिताओं में माना जाता है कि टेनिस के सिंगल्स मुकाबले में सबसे ज्यादा स्टेमिना की जरूरत पड़ती है. यह खिलाड़ियों में धीरे-धीरे ही विकसित होता है. शुरुआत में एक लंबे अरसे तक डबल्स मैच खेलने से हमारे खिलाड़ियों में वह स्टेमिना नहीं आ पाता. प्रशिक्षण के स्तर पर यह खामी देश में सिंगल्स के चैंपियन खिलाड़ी पैदा करने में सबसे बड़ी बाधा तो है, लेकिन इसका फायदा भी हमारे खिलाड़ियों को डबल्स मुकाबलों मिलता है.

दो साल पहले अमेरिका की टेनिस खिलाड़ी वीनस विलियम्स भारत आईं थीं. वे अपनी बहन सेरेना के साथ जोड़ी बनाकर 14 ग्रैंड स्लैम खिताब जीत चुकी हैं. अपनी यात्रा के दौरान डबल्स मैचों पर बात करते हुए उनका कहना था कि इनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि आप अपने पार्टनर को कितने जल्दी समझते हैं और उसे कितना सम्मान देते हैं. भारतीय खिलाड़ी इस मामले में अव्वल माने जा सकते हैं क्योंकि यह उनके प्रशिक्षण का अनिवार्य हिस्सा रहता है.

बेशक भारतीय खिलाड़ी डबल्स में ज्यादा अच्छा प्रदर्शन करते हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उनके सिंगल्स का प्रदर्शन बिल्कुल ही लचर हो. लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्जा से लेकर सोमदेव देवबर्मन और रोहन बोपन्ना तक ने सिंगल्स मुकाबलों में अपने से ऊंची वरीयता प्राप्त खिलाड़ियों को हराया है. हालांकि वे अपने प्रदर्शन में निरंतरता नहीं रख पाए फिर भी उन्होंने इस मिथक को तोड़ा है कि भारतीय खिलाड़ियों की फिटनेस में कोई बुनियादी कमी होती है. यानी इस समय भले ही हम सिर्फ डबल्स के चैंपियन पैदा कर रहे हों लेकिन भविष्य में टेनिस प्रशिक्षण की सुविधाएं बढ़ने के साथ-साथ किसी भारतीय के सिंगल्स मुकाबलों में ग्रैंड स्लैम चैंपियन बनने की उम्मीद लगाई जा सकती है.