दिल्ली-एनसीआर में 10 साल से पुरानी डीजल गाड़ियों पर रोक लगाने का एनजीटी का फैसला ठीक से लागू करवाने के लिए जो संसाधन चाहिए उनका एक बड़ी हद तक अभाव है.
अच्छी सेहत के लिए रोज सुबह की सैर पर जाने वाले वर्धमान कौशिक को इस दौरान अक्सर लगता था कि जो हवा उनके फेफड़ों में जा रही है वह उल्टा उनकी सेहत पर बुरा असर डाल रही है. गुड़गांव में रहने वाले इस 26 साल के वकील ने फरवरी 2014 में इस मसले को लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में एक याचिका दायर की. तब कौशिक ने शायद ही सोचा होगा कि उनकी यह छोटी सी पहल आगे बढ़ते-बढ़ते दो बड़े और अहम फैसलों का सबब बन जाएगी.
एनजीटी ने दिल्ली-एनसीआर में 10 साल से पुरानी डीजल गाड़ियों पर प्रतिबंध लगा दिया है. उसने दिल्ली सरकार से 10 साल से ज्यादा पुरानी गाड़ियों की सूची जमा करने को भी कहा है. इसके अलावा उसने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा से उन फाइलों और नोटिंग्स की भी मांग की है जो ये बताती हों कि उसके पुराने आदेशों का पालन किया जा रहा है. गौरतलब है कि इससे पहले नवंबर 2014 में एनजीटी ने 15 साल से पुराने सभी वाहनों पर रोक लगा दी थी.
10 साल पुरानी गाड़ियों को जब्त करने की कार्रवाई युद्धस्तर पर शुरू कर दी जाए तो सवाल यह है कि इन गाड़ियों को रखा कहां जाएगा?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दिल्ली की हवा दुनिया में सबसे ज्यादा खराब है. गुड़गांव में रहने वाले कौशिक उम्मीद जताते हैं कि एनजीटी का यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा. पर्यावरण कार्यकर्ताओं सहित कई लोगों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है. वे उम्मीद कर रहे हैं कि इसके बाद दिल्ली और आसपास की हवा का स्तर सुधरेगा. वे सरकार से मांग कर रहे हैं कि इस आदेश को कड़ाई के साथ लागू किया जाए.
मुश्किलें
परिवहन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में करीब 83 लाख गाड़ियां पंजीकृत हैं. इनमें लगभग छह लाख डीजल वाहन हैं जिनमें से करीब डेढ़ लाख से भी ज्यादा 10 साल से पुराने हैं. अभी तक विभाग 15 साल पुराने वाहनों पर ही कार्रवाई को लेकर जूझ रहा था कि इस नए आदेश ने उसके माथे पर बल डाल दिए हैं. उसने 15 साल पुराने वाहनों के दोबारा रजिस्ट्रेशन पर तो रोक लगा दी है, लेकिन जो गाड़ियां अब तक सड़कों पर दौड़ रही हैं उन पर कोई बड़ी कार्रवाई करने में वह असफल रहा है. एनजीटी ने उससे 15 साल पुराने वाहनों की विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन वह इसे उपलब्ध कराने में नाकाम रहा. अब 10 साल पुराने डीजल वाहनों को हटाने के आदेश के बाद उसके सामने एक नई मुश्किल खड़ी हो गई है.
दरअसल समस्या यह है कि दिल्ली-एनसीआर में ऐसे आदेश का पालन करवाने के लिए एक बड़ा और सक्षम तंत्र भी चाहिए. इसका फिलहाल अभाव दिखता है. हालत यह है कि 26 नवंबर को दिए गए एनजीटी के आदेश के बाद अब तक सिर्फ 1100 वाहन ही जब्त किए जा सके हैं.
दिल्ली परिवहन विभाग की एनफोर्समेंट यूनिट में 200 लोग हैं. जानकारों का मानना है कि इतने बड़े काम के लिए यह संख्या बहुत कम है. दिल्ली में 26 एंट्री प्वाइंट हैं. परिवहन विभाग की टीम इनमें से सात की ही निगरानी कर पाती है. जानकारों के मुताबिक इस काम में ट्रैफिक पुलिस की मदद ली जा सकती है और उसके कुल 6000 के स्टाफ में से 2000 लोग इस काम के लिए लगाए जा सकते हैं.
लेकिन उससे पहले और भी कई चीजें सुनिश्चित करनी होंगी. मसलन जब्त किए जाने वाले वाहनों को उठाने और उन्हें रखने के लिए पूरी व्यवस्था हो. अभी विभाग के पास करीब 100 क्रेनें हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही हैं जो ट्रक जैसे बड़े वाहनों के लिए बनी हैं. क्रेनों की व्यवस्था हो भी जाए और 10 साल पुरानी गाड़ियों को जब्त करने की कार्रवाई युद्धस्तर पर शुरू कर दी जाए तो मुश्किल यह आएगी कि इन गाड़ियों को रखा कहां जाएगा? बताया जा रहा है कि दिल्ली में दस साल पुरानी डेढ़ लाख से भी ज्यादा डीजल गाड़ियों में से आधी भी सड़कों पर दौड़ रही हों तो उन्हें जब्त करने के लिए करीब चार सौ फुटबाल के मैदानों जितनी जगह चाहिए होगी.
'हम ये नहीं कर सकते कि हर गाड़ी को रोककर जांच करने लगें क्योंकि इससे एक तो जाम लगेगा, दूसरे लोगों को असुविधा होगी और प्रदूषण भी बढ़ेगा.'
दिल्ली में ट्रैफिक पिट कही जाने वाली इस तरह की व्यवस्था की मौजूदा क्षमता फिलहाल 9000 वाहनों की है. इनमें सबसे बड़ी व्यवस्था परिवहन विभाग के बुराड़ी स्थित कार्यालय में है जहां एक बार में 2000 ट्रक या 4000 कारें रखी जा सकती हैं. लेकिन इस जगह का कुछ हिस्सा उन वाहनों के लिए भी रखना होता है जिन्हें किन्हीं दूसरे कारणों से जब्त किया गया है. किसी तरह जगह की व्यवस्था हो भी जाती है तो इतनी बड़ी संख्या में रखी गई गाड़ियां या उनके पार्ट चोरी न होने लगें, यह सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त स्टाफ भी चाहिए. यही वजह है कि रोजमर्रा के कामों के लिए ही स्टाफ की तंगी से जूझ रहे परिवहन और यातायात विभाग के अधिकारी परेशान हैं. वैसे यह केवल इन दो विभागों की ही बात नहीं है. मिठाई से लेकर मकान बनाने तक तमाम गतिविधियों के नियमन के लिए देश में कई कानून हैं, लेकिन संसाधनों के मोर्चे पर ऐसी ही तंगी के चलते उनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पाता.
फिर एनजीटी के इस फैसले से जुड़ी व्यावहारिक दिक्कतें अपनी जगह हैं. जैसा कि एक अधिकारी कहते हैं,' हम ये नहीं कर सकते कि हर गाड़ी को रोककर जांच करने लगें. इससे एक तो जाम लगेगा, दूसरे लोगों को असुविधा होगी और प्रदूषण भी बढ़ेगा.' ऐसे में अधिकारियों के लिए पहला काम होगा परिवहन विभाग से उन डीजल गाड़ियों की सूची मांगना जिनका रजिस्ट्रेशन 2005 के पहले का है. लेकिन जानकारों के मुताबिक पूरी संभावना है कि यह रिकॉर्ड गड्डमड्ड हो क्योंकि तब रिकॉर्ड को डिजिटल रूप में रखने की व्यवस्था या तो शुरूआती दौर में थी या कई जगहों पर थी ही नहीं. यानी इस पर भी पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता. यह बात दिल्ली के अलावा गुड़गांव, नोएड़ा, गाजियाबाद और फरीदाबाद पर भी लागू होती है.
सवाल यह भी उठ रहा है कि इस आदेश के बाद दूसरे राज्यों से रोज दिल्ली आने वाली उन हजारों बसों का क्या होगा जो लाखों सवारियों को लाती-ले जाती हैं. उन वाहनों पर क्या कार्रवाई होगी जिन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य जाने के क्रम में दिल्ली से होकर गुजरना पड़ता है? हजारों लोगों की आजीविका इन वाहनों से जुड़ी हुई है. उनका क्या होगा? यही वजह है कि बहुत से लोग मान रहे हैं कि इस समस्या पर समग्रता से विचार करने की जरूरत है.
विकल्प
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण से निपटने के लिए वाहनों को हटाना कोई बहुत कारगर उपाय नहीं है. उनके मुताबिक पुरानी डीजल गाड़ियों पर एकतरफा प्रतिबंध से बेहतर है कि उनसे प्रदूषण संबंधित नियमों का सख्ती से पालन करने को कहा जाए. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट कहती है कि गाड़ी कितनी पुरानी है, इससे ज्यादा अहम बात यह है कि उसका रखरखाव कैसे किया गया है इसलिए जोर सालाना फिटनेस टेस्ट पर होना चाहिए.
फिलहाल तो सरकारी तंत्र इस माथापच्ची में जुटा दिखता है कि एनजीटी के इस फरमान का पालन किस तरह हो.