कम से कम पिछले तीन साल में जनरल वीके सिंह को लेकर जितनी खबरें आई हैं, उनके आधार पर तो यही कहा जा सकता है कि वीके सिंह और विवाद का साथ चोली-दामन जैसा हो गया है. ताजा विवाद सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग के उस हलफनामे के बाद उठा है जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दिया है. अपनी तरह के इस पहले मामले में मौजूदा सेना प्रमुख ने पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह को कटघरे में खड़ा किया है. दलबीर सिंह का आरोप है कि वीके सिंह ने उन्हें गलत आरोप लगाकर प्रताड़ित किया जिसका एकमात्र मकसद आर्मी कमांडर के रूप में उनकी पदोन्नति रोकना था.

इससे एक दिन पहले भी वीके सिंह चर्चा में आए थे जब उनकी पत्नी भारती सिंह ने दिल्ली के एक शख्स के खिलाफ ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाते हुए पुलिस में केस दर्ज करवाया था. सिंह का आरोप है कि यह व्यक्ति छेड़छाड़ कर तैयार की गई ऑडियो-वीडियो क्लिप के जरिये उनके पति को बदनाम करने के नाम पर उन्हें ब्लैकमेल कर रहा है और उनसे दो करोड़ रुपये मांग रहा है.

2014 लोकसभा चुनाव में जिस गाजियाबाद ने उन्हें पौने छह लाख वोटों से जीत दिलाई थी वहां कुछ समय पहले उनकी गुमशुदगी के पोस्टर लग गए थे.

यह कोई पहला मौका नहीं है जब वीके सिंह अपने विवादित बयान को लेकर सुर्खियों में रहे हों. कुछ समय पहले हरियाणा में एक दलित परिवार को जलाने के मामले में की गई टिप्पणी के चलते भी वीके सिंह विवादों में आ गए थे. इस घटना में दो बच्चों के जिंदा जलने की घटना को सिंह ने प्रशासन की असफलता बताते हुए कहा था, ‘हर चीज़ के लिए सरकार जिम्मेवार नहीं, कहीं उसने पत्थर मार दिया कुत्ते को, तो सरकार जिम्मेवार है, ऐसे नहीं है.’ इसके बाद जब उन पर चौतरफा हमला होने लगा तो वीके सिंह ने कहा कि उनके बयान को तोड़मरोड़कर पेश किया गया.

इससे पहले उन्होंने मीडिया पर भी विवादास्पद टिप्पणी की थी. इसे लेकर मीडिया ने जब वीके सिंह पर अपने हमले तेज किए तो उन्होंने यहां तक कह डाला कि वह हथियार लॉबी की शह पर ऐसा कर रहा है. हालांकि, बाद में उन्होंने माफी भी मांगी, लेकिन यह कहते हुए कि यह माफी वे उन मीडिया संस्थानों से नहीं मांग रहे हैं जो उनके खिलाफ स्वार्थों से प्रेरित होकर अभियान चला रहे हैं. देश के 26वें सेना प्रमुख रहे विजय कुमार सिंह के इस दावे में कितना दम है, इसके बारे में पक्का कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना तय है कि भारत के विदेश राज्य मंत्री और गाजियाबाद के सांसद वीके सिंह और विवाद साथ-साथ चलते हैं.

वीके सिंह से जुड़े विवादों में से एक उनके लोकसभा क्षेत्र गाजियाबाद से भी संबंधित है. 2014 लोकसभा चुनाव में जिस गाजियाबाद ने उन्हें पौने छह लाख वोटों से जीत दिलाई थी वहां कुछ समय पहले उनकी गुमशुदगी के पोस्टर लग गए थे. जनप्रतिनिधियों को लेकर इस तरह के पोस्टर लगते रहे हैं. दिलचस्प यह था कि ये पोस्टर ऐसे समय पर लगे थे जब यमन में फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने में उनकी भूमिका की हर तरफ तारीफ हो रही थी. वीके सिंह के खिलाफ ये पोस्टर भारतीय कौटिल्य सेना नाम के एक संगठन ने लगाए थे. इस संगठन का दावा था कि वीके सिंह गाजियाबाद में सिर्फ सम्मान समारोह में आते हैं. संगठन का यह भी कहना था कि किसानों की फसल खत्म हो गई लेकिन स्थानीय सांसद ने इनकी सुध नहीं ली. और न ही वे चीनी बॉर्डर पर शहीद हुए गाजियाबाद के जवान के घर ही जाने की फुर्सत निकाल पाए.

इस विवाद के चलते सरकार के खिलाफ अदालत में जाने वाले वे पहने सेनाध्यक्ष भी बने. हालांकि, बाद में इस मामले में सरकार की जीत हुई

वीके सिंह की टिप्पणी को लेकर एक विवाद तब भी खड़ा हुआ था जब वे भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर पाकिस्तानी दूतावास में आयोजित राष्ट्रीय दिवस समारोह में गए थे. यह 23 मार्च 2015 की बात है. इसके बाद उन्होंने जो ​ट्वीट किया उसका लब्बोलुआब यह था कि वे निजी तौर पर वहां नहीं जाना चाहते थे और वे इस कार्यक्रम में अलगाववादियों को बुलाए जाने को सही नहीं मानते. लेकिन भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर वहां जाना उनकी ड्यूटी का हिस्सा था और वे इसके लिए शर्मिंदा हैं. वीके सिंह ने इस समारोह में पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित के साथ फोटो तो खिंचवाए लेकिन तकरीबन दस मिनट में ही अपनी उपस्थिति की औपचारिकता पूरी करके वे वहां से चलते बने. इससे संबंधित विवाद जब बढ़ा तो यह बात भी सामने आई कि उन्होंने मंत्रिपद से इस्तीफे की पेशकश की है. हालांकि बाद में उन्होंने इससे इनकार कर दिया.

जब वे सेना प्रमुख थे तो उम्र विवाद के चलते चर्चा में आए थे. वीके सिंह के मुताबिक उनका जन्म 10 मई, 1951 को हुआ था. जबकि भारत सरकार उनकी जन्म तिथि 10 मई, 1950 मानती है. इस विवाद के चलते सरकार के खिलाफ अदालत में जाने वाले वे पहने सेनाध्यक्ष भी बने. हालांकि, बाद में इस मामले में सरकार की जीत हुई. इसी दौरान वीके सिंह ने यह कह कर एक बार फिर से सनसनी फैला दी थी कि उन्हें रिश्वत की पेशकश की गई थी. इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर प्रकाशित करके उन्हें एक बार फिर से विवादों में ला दिया कि वीके सिंह के सेना प्रमुख रहते सैन्य तख्ता पलट करने की योजना बनाई जा रही थी. हालांकि, इसे न सिर्फ सिंह ने खारिज किया बल्कि सरकार ने भी इससे पल्ला झाड़ लिया.

सेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त होते ही वीके सिंह के राजनीति में सक्रिय होने को लेकर कयास लगाए जाने लगे थे. कुछ समय बाद वे अन्ना हजारे के साथ दिखने भी लगे. उनके मंचों से देश और समाज की बात करने लगे. उस वक्त ऐसा लगने लगा था कि अन्ना हजारे की टीम से अरविंद केजरीवाल के हटने के बाद जनरल वीके सिंह उनकी जगह भरने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसी बीच हरियाणा में नरेंद्र मोदी की एक रैली हुई और इसमें वीके सिंह उनके साथ मंच पर मौजूद थे. हालांकि, उस वक्त जब उनसे यह पूछा गया कि क्या आप भाजपा में शामिल हो रहे हैं तो उन्होंने कोई साफ जवाब नहीं दिया. उनकी ओर से सिर्फ यह कहा गया कि रैली राजनीतिक नहीं बल्कि पूर्व सैनिकों की थी, इसलिए वे इसमें शामिल हुए. लेकिन कुछ ही दिनों में यह साफ हो गया कि कभी अन्ना हजारे के साथ कदमताल करने वाले वीके सिंह भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने जा रहे हैं. इसके बाद न केवल वे रिकॉर्डतोड़ वोटों से (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद सबसे ज्यादा मतों से) गृहमंत्री राजनाथ सिंह की सीट से चुनाव जीते बल्कि जीतते ही नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री भी बन गए.

हरियाणा के भिवानी जिले के एक गांव बपोरा में जन्मे वीके सिंह की शुरुआती पढ़ाई पिलानी के बिरला पब्लिक स्कूल में हुई. इसके बाद वे राष्ट्रीय सैन्य अकादमी में चले गए. उन्होंने वेलिंगटन के डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और अमेरिका के आर्मी वॉर कॉलेज से भी सैन्य प्रशिक्षण लिया है. सेना में वे 14 जून, 1970 को भर्ती हुए थे. सेना में उनके योगदान के लिए उन्हें अतिविशिष्ट सेवा मेडल और परम विशिष्ट सेवा मेडल भी मिले हैं.

कुछ समय पहले 'करेज ऐंड कन्विकशन' के नाम से अपनी आत्मकथा लिखने वाले वीके सिंह को टेनिस, बैडमिंट और गोल्फ खेलना पसंद है. इसके अलावा उन्हें फोटोग्राफी का भी शौक है. कम ही लोगों को मालूम है कि वीके सिंह ने बॉलीवुड की एक फिल्म में भी काम किया है. 1991 में आई फिल्म प्रहार: दि फाइनल अटैक में उन्होंने कर्नल की भूमिका निभाई थी. इस फिल्म में नाना पाटेकर, माधुरी दीक्षित और डिंपल कपाड़िया जैसे कलाकार थे और इसका निर्देशन भी नाना पाटेकर ने ही किया था. फिल्म में वीके सिंह की भूमिका एक ऐसे कर्नल की थी जो आतंकवादियों द्वारा बंधक बनाए गए स्कूली बच्चों को छुड़ाने की रणनीति बनाता है.

संयोग देखिए कि फिल्मी पर्दे पर जिस तरह का काम उन्होंने 24 साल पहले किया, उससे मिलता—जुलता काम उन्होंने इसी साल अप्रैल में यमन में भी किया. यमन में भले ही आतंकवादियों ने भारतीय नागरिकों को बंधक नहीं बनाया हो लेकिन वहां बंधक बनाए जाने और जान जाने, दोनों का ही खतरा था. यमन में चलाए गए मिशन राहत में उन्होंने जो भूमिका निभाई उसके लिए भारत सरकार की खासी तारीफ हो रही थी. लेकिन शायद वे इससे संतुष्ट नहीं थे. इसलिए उन्होंने ट्वीट कर दिया कि मीडिया को यमन में उनका किया पाकिस्तान दिवस पर जाने से कम आकर्षित करता है. इसके बाद जब मीडिया ने उन्हें आड़े हाथों लिया तो उन्होंने उसकी तुलना वेश्या से कर दी और फिर जैसाकि ऊपर लिखा है उसपर हथियारों की लॉबी के शह पर काम करने की तोहमत लगाकर उससे सशर्त माफी भी मांग ली.

अब जनरल दलबीर सिंह के आरोपों के बाद वीके सिंह फिर विवादों में आ गए हैं. जैसा कि हर घटना के साथ होता है, इस मामले में भी कुछ समय तक हंगामा होगा और फिर शांति हो जाएगी. लेकिन वीके सिंह का अतीत देखते हुए कहा जा सकता है कि यह शांति भी उनसे जुड़े किसी अगले विवाद से पहले का अल्पविराम ही होगी.