मुलायम सिंह यादव को इतनी पार्टियों की पार्टी का मुखिया बनने का मौका मिला है तो उनके परिवार को इस पर खुश होना चाहिए. लेकिन हो इसका उल्टा रहा है.
मुलायम सिंह यादव ने जनता परिवार के विलय की घोषणा कर दी. लेकिन कई पेंच खुले छोड़ दिए. एक ऐसी पार्टी का ऐलान हुआ, जिसका न नाम तय हुआ और न चुनाव निशान. कहने को परिवार बसने जा रहा है लेकिन तकरार अभी जारी है. मुलायम सिंह इस जनता परिवार के नए मुखिया होंगे. उन्हें इतनी पार्टियों की पार्टी का मुखिया बनने का मौका मिला है तो उनके परिवार को इस पर खुश होना चाहिए. लेकिन हो उल्टा रहा है. उनका परिवार इसपर खुश होने की बजाय उनसे नाराज है.
मुलायम के फैसले से अखिलेश नाखुश
मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी अभी परिवारवादी पार्टी है. लोकसभा में पांचों सांसद मुलायम के अपने परिवार के हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनके बेटे हैं. अखिलेश अपने पिता के नए फैसले से खुश नहीं हैं. इसीलिए जब मुलायम ने अपनी पार्टी के विलय की घोषणा की तो ऐसे महत्वपूर्ण समय पर भी वे उनके साथ नहीं थे. वे जर्मनी चले गए थे. पता चला है कि जर्मनी जाने से पहले उन्होंने नेताजी से साफ कह दिया था कि वे पार्टी के विलय के फैसले से सहमत नहीं है. इसके बावजूद मुलायम ने इस पर मुहर लगा दी. लेकिन अखिलेश यादव के विरोध की वजह से नई पार्टी के नाम और निशान का ऐलान उन्होंने अभी नहीं किया है.
जब मुलायम ने अपनी पार्टी के विलय की घोषणा की तो ऐसे महत्वपूर्ण समय पर अखिलेश यादव उनके साथ नहीं थे. वे जर्मनी चले गए थे.
मुलायम के निर्णय से भाई नाराज़
जो मुलायम सिंह यादव के परिवार और समाजवादी पार्टी की राजनीति को करीब से जानते हैं, वे अच्छे से इस बात को भी जानते हैं कि मुलायम अपने भाई राम गोपाल यादव से पूछे बगैर कोई बड़ा काम नहीं करते. लेकिन पार्टी का विलय एक ऐसा फैसला है जो उन्होंने रामगोपाल यादव के विरोध के बावजूद किया. विलय अब तक टलता रहा तो इसलिए भी कि रामगोपाल विदेश में थे. जब वे लौटे तो सीधे अपने गांव चले गए. विलय अभी अधूरा है और यह अधूरा ही रह जाए इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. वजह यह है कि जिस कमेटी को पार्टी का नाम, झंडा और चुनाव निशान तय करना है उसमें रामगोपाल यादव भी हैं.
आखिर विलय के विरोध में मुलायम परिवार क्यों?
दरअसल मुलायम सिंह के परिजनों को उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने परिवार की हैसियत की चिंता है. मुलायम सिंह यादव को छोड़ दें तो अभी उनके परिवार में ऐसा कोई नहीं जिसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा देश का प्रधानमंत्री बनने की हो. वे इस बात को मानते भी हैं कि उत्तर प्रदेश से बाहर उनकी पार्टी या उऩकी कोई पहचान नहीं. अगर उत्तर प्रदेश एक देश होता तो जनसंख्या के लिहाज से दुनिया के दस सबसे बड़े देशों में शामिल होता. मुलायम सिंह के परिवार की दुविधा यही है. कहीं देश की राजनीति के चक्कर में इतने बड़े प्रदेश की सत्ता से भी कहीं परिवार हाथ नहीं धो बैठे. मुलायम का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं रहता और जनता परिवार में कई ऐसे नेता हैं जो खुद को मुलायम के बाद इस पार्टी का सबसे वरिष्ठ नेता बताने से नहीं चूकते. ऐसे में अखिलेश और रामगोपाल यादव की चिंता है कि कहीं ऐसा न हो कि जो पार्टी अभी मुलायम परिवार के इर्द-गिर्द उसके इशारों पर चलती है उस पर बाहरी नेताओं का कब्जा हो जाए.
इसलिए मुलायम सिंह यादव का परिवार अब भी चाहता है कि जनता पार्टी के विलय में कोई न कोई रोड़ा अटका रहे. उनकी पहली पसंद होगी कि पहले बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार अपनी पार्टी का विलय करें फिर देखा जाएगा.
क्या 'विलय' के बाद भी नहीं बसेगा जनता परिवार?
मुलायम के बारे में एक बात सब जानते हैं, वे अपने फैसले से पलट सकते हैं और पलटने में वक्त भी नहीं लगाते. वे एक बार ऐसा ममता बनर्जी के साथ कर चुके हैं और 1998 में सोनिया गांधी के साथ भी. इस बार बात इतनी आगे तो बढ़ चुकी है कि उनके लिए अपने फैसले से पलटना मुश्किल होगा. लेकिन यह भी सच है कि वे अभी तक सिर्फ ऐसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही हैं जिसका कोई अस्तित्व नहीं है. अगर शुद्ध राजनीतिक लहजे से देखें तो अब भी मुलायम सिर्फ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हैं और लालू यादव राष्ट्रीय जनता दल के. जब तक विधिवत तरीके से सभी छह पार्टियां अपने दल का विलय नहीं करती तब तक यह विलय सिर्फ कागजी और बेमानी होगा. मुलायम परिवार यही चाहता है, ऐलान हो पर विलय नहीं. जनता परिवार के बाकी नेता चाहते हैं, ऐलान हो गया तो विलय भी जल्दी होना चाहिए. इम्तिहान मुलायम का है - वे अपने परिवार की सुनते हैं, या एक बार फिर से नए बने जनता परिवार को चुनते हैं.