महिलाओं को परिवार व नौकरी में संतुलन बिठाने का प्रशिक्षण देना हो या उनके बच्चों के लिए डे केयर सेंटर खोलना, अब भारतीय कंपनियां अपनी महिला कर्मचारियों के प्रति काफी संवेदनशील रवैया अपनाने लगी हैं.
पिछले साल भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक आदेश जारी कर सालाना 300 करोड़ रुपये वाली कंपनियों के निदेशक मंडल में कम से कम एक महिला सदस्य की नियुक्ति को अनिवार्य किया था. इसके लिए पिछले महीने की 31 तारीख की समयसीमा निश्चित की गई थी. लेकिन हाल ही में खबर आई कि देश की 300 से ज्यादा कंपनियों ने यह आदेश नहीं माना है. इसका संदेश यह गया कि भारतीय कंपनियां महिलाओं के साथ भेदभाव करती हैं. वे महिला कर्मचारियों को कम आंकती हैं और उन्हें आगे नहीं बढ़ाना चाहतीं. लेकिन हाल ही में कुछ कंपनियों के मानव संसाधन विभाग से मिली जानकारियां एक अलग संदेश देती हैं. ये बताती हैं कि भारतीय कंपनियां अपनी महिला कर्मचारियों की सहूलियतों के लिए एक कदम आगे बढ़कर काम कर रही हैं.
टाटा समूह की कंपनी टाटा कैमिकल ने नियम बनाया है कि जब तक बच्चा एक साल का नहीं हो जाता महिलाएं काम करने का समय अपनी सहूलियत से चुन सकती हैं
प्रतिभावान महिला कर्मचारियों को अपने से जोड़े रखने और कामकाजी माहौल को उनके लिए ज्यादा सुविधाजनक बनाने के लिए कुछ कंपनियां श्रम कानूनों से आगे जाकर उन्हें सुविधाएं दे रही हैं. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एचसीएल, एमटीएस इंडिया, एयरटेल, डाबर और टाटा समूह जैसी जानीमानी कंपनियां इस मामले में एक नई लीक गढ़ रही हैं. ये मातृत्व लाभ, सुरक्षा, घर-परिवार और कामकाज आदि जैसे मसलों से जुड़ी दिक्कतें दूर करने के लिए अपने-अपने स्तर पर कई काम कर रही हैं.
मातृत्व अवकाश का ही मामला देखें तो अभी कानून के हिसाब से किसी कामगार महिला को तीन महीने का अवकाश मिलना चाहिए. इस दौरान उन्हें वेतन भी दिया जाता है. देश की कुछ कंपनियों ने मातृत्व अवकाश की समयावधि में इजाफा कर दिया है. डाबर अपने यहां चार महीने तो गोदरेज छह महीने का मातृत्व अवकाश देती है. टाटा समूह की कंपनी टाटा कैमिकल ने नियम बनाया है कि जब तक बच्चा एक साल का नहीं हो जाता महिलाएं काम करने का समय अपनी सहूलियत से चुन सकती हैं. भारती एयरटेल ने अपने कार्यालयों में महिला कर्मचारियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए किराने और फल-सब्जियों के स्टोर तो खोले ही हैं, वह उनके छोटे बच्चों को ध्यान में रखकर डे केयर सेंटर भी चला रही है.
आमतौर पर देखा गया है कि महिला कर्मचारी मां बनने के बाद घर-परिवार और नौकरी के बीच संतुलन नहीं बना पातीं और आखिर में उन्हें अपनी मूल कंपनी छोड़नी पड़ती है. यह बड़ी वजह है कि कॉर्पोरेट जगत में महिलाओं की संख्या कम है. सॉफ्टवेयर और टेक्नोलॉजी कंपनी एचसीएल इन स्थितियों से निपटने के लिए एक कार्यक्रम चलाती है. इसके तहत महिलाओं को परिवार और नौकरी के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. कंपनियों में लैंगिक विविधता न होने से भी महिला कर्मचारियों को काम करने का सहज माहौल नहीं मिल पाता. एक्सिस बैंक ने इसी बात को ध्यान में रखकर किसी महिला कर्मचारी की खाली हुई जगह पर महिला कर्मचारी को ही नियुक्त करने का नियम बनाया है.
पिछले दिनों शहरों के सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं से छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. कंपनियां इस दिशा में भी आगे बढ़कर पहल कर रही हैं. टेलीकॉम कंपनी एमटीएस इंडिया ने अपनी महिला कर्मचारियों के लिए कैब में अलग से सुरक्षाकर्मी उपलब्ध करवाए हैं.
महिलाओं को सुविधाएं देने की बात सिर्फ ऊपर बताए उदाहरणों से ही पता नहीं चलती. एक अंतर्राष्ट्री एचआर कंसल्टेंसी फर्म के एऑन हेविट के सर्वे के हिसाब से 76 प्रतिशत भारतीय कंपनियों ने अपनी महिला कर्मचारियों की सहूलियतों का ध्यान रखने के लिए बजट बढ़ाया है. ये उदाहरण बताते हैं कि फिलहाल भले ही सेबी को कंपनियों के निदेशक मंडल में महिलाओं की नियुक्ति के लिए नियम बनाने पड़ रहे हों लेकिन भविष्य में नौकरी करने की दिक्कतें कम होते ही कॉर्पोरेट जगत में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ेगी और शायद निदेशक मंडल में भी.