इस कहानी में जो गांव हैं उनकी जगह कोई भी ऐसा गांव हो सकता है जहां विस्थापन और पुनर्वास का कम से कम एक दौर चला हो.
जब तवा नदी के किनारे स्थित रिसॉर्ट से आप हाथों में चाय का कप पकड़े नदी की ओर देखेंगे तब ऐसा लगेगा जैसे इस से सुन्दर नजारा हो ही नही सकता. उस जगह की खूबसूरती आपके जीवन में चल रहे हर तनाव को दूर कर देगी. लेकिन प्रकृति का दिया हुआ तोहफा शायद मुठ्ठी भर लोगों के नसीब में ही होता है.
वही नदी जो हमारे लिए बहुत खूबसूरत है कई लोगों के लिए दुख का कारण भी है. तवा नदी में बने डैम के चलते आसपास के 44 गांव विस्थापित हो चुके हैं. वे डूब क्षेत्र में आ रहे थे. विस्थापन ने इन गांव के लोगों से इनके दशकों पुराने घर ही नहीं छीने बल्कि उनके रोजगार के साधन, बैठने के ठिये, बरसों-दशकों के रिश्ते भी छीन लिए. लेकिन हम इन लोगों की बात नहीं करेंगे. बात करेंगे उनकी जो कहीं और से पास में ही आकर कुछ समय पहले बसे हैं. वैसे किसी की भी बात करो विस्थापन की कहानी तो वही है. ऐसी कहानियों की कमी भी नहीं. क्योंकि विस्थापन की प्रक्रिया सिर्फ होशंगाबाद के इसी इलाके में नहीं बल्कि मध्य प्रदेश की कई जगहों पर चल रही है. देश में कई जगह चल रही है.
Displacement cut out
Displacement cut out
पहले इसका नाम सिर्फ घोड़ानार था और यह पचमढ़ी के पास था. करीब दो साल पहले प्रशासन ने उठाकर इसे होशंगाबाद के पास के जंगलों में रख दिया और इसके नाम के आगे नया लगा दिया
जब तवा डैम को पार करके आप मढ़ई गांव की तरफ जंगल के रास्तों से गुजरते हैं तो आपको एक छोटा सा स्कूल दिखाई पड़ता है. उस स्कूल के सामने दिखाई पड़ता है एक कतार में बने एक जैसे दिखने वाले ऐसे छोटे-छोटे घरो का समूह जो एक बेतरतीब से सहज माहौल में एक किस्म की कृत्रिमता भर देता है. किसी को भी यह देख कर हैरानी जरूर होगी कि जंगल में ये घर अचानक कैसे प्रकट हो गए. पूछने पर मालूम चलता है कि यह एक नया बसा गांव है - नया घोड़ानार. पहले इसका नाम सिर्फ घोड़ानार था और यह पचमढ़ी के पास था. करीब दो साल पहले प्रशासन ने उठाकर इसे होशंगाबाद के पास के जंगलों में रख दिया और इसके नाम के आगे नया लगा दिया. यही कहानी नया परसापानी और नया चूरना की भी है. अचानक ही पचासों साल पुराने ये गांव नये हो गए हैं.
वर्ष 2013 में इन तीनों गांवों का विस्थापन हुआ था क्योंकि पचमढ़ी के जंगलों में इनकी मौजूदगी जानवरों के लिए ठीक नहीं थी. वहां के फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की तो कम से कम यही राय थी. उन्हें तुरंत वहां से हटाने की कवायद शुरु हुई और पुनर्वास के लिए 10 लाख रुपए की राशि या पांच एकड़ जमीन देने का वादा किया गया.
अच्छी बात यह है कि प्रशासन ने वादा निभाया और गांव वालों को पैसे मिल गए. कुछ को जमीन. इस लिहाज से घोड़ानार, परसापानी और चूरना के विस्थापनों में ऊपर से ज्यादा खामियां नहीं ढूंढ़ी जा सकती हैं. देश में तो ऐसे-ऐसे विस्थापित भी मौजूद हैं जो कई-कई बार विस्थापन झेल चुके हैं. ऐसे भी जिन्हें पुनर्वास के नाम पर मध्ययुग में पहुंचा दिया गया. या फिर ऐसे जिन्हें मुआवजा सालों के इंतजार के बाद मिला भी तो जिंदगी की सुरसा जैसी जरूरतों के सामने तिनका भर भी नहीं था.
देश में तो ऐसे-ऐसे विस्थापित भी मौजूद हैं जो कई-कई बार विस्थापन झेल चुके हैं. ऐसे भी जिन्हें पुनर्वास के नाम पर मध्ययुग में पहुंचा दिया गया. या फिर जिन्हें मुआवजा सालों के इंतजार के बाद मिला
लेकिन समय पर तुलनात्मक रूप से ठीक-ठाक मिला मुआवजा भी उखड़ने से जुड़ी हर चीज की भरपायी करने में कितना अक्षम होता है यह इन तीनों ही नये गांवों के निवासियों में से किसी की भी जिंदगी को टटोलने पर पता लग सकता है.
मान सिंह जो अब नया घोड़ानार में अपने घर के आगे बनी छोटी सी दुकान चलाते हैं, विस्थापन की बात सुनते ही दुखी हो जाते हैं, 'हम सालों से वहां बसे थे. वहां रोजगार के दूसरे साधन भी थे. यहां सिर्फ ये दुकान है.' ये पूछने पर कि क्या उन्हें दस लाख रुपए नहीं मिले, वे बताते हैं, 'पैसे तो मिल गए मगर उसमें से आधे से ज्यादा तो खर्च हो गए हमें जमीन के 20,270 रुपए देने पड़े. घर बनवाने की लागत तीन लाख रुपए आई और अब भी घर ठीक से नहीं बना. घर में दरवाजे और खिड़की अबतक नहीं लग पाए हैं. दुकान लगाने में भी कुछ पैसे खर्च हो गए.' मान सिंह यह जरूर मानते हैं कि इस नए गांव में उन्हें बिजली मिली है जो पुराने में नहीं थी. लेकिन उन्हें देखने से ही मालूम पड जाता है कि बिजली उनके जीवन में कम ही रोशनी फैला रही है.
नया घोड़ानार के शासकीय प्राथमिक पाठशाला की अध्यापिका से बात करने पर पता चला कि घोड़ानार, परसापानी के लोगों के साथ न्याय नही हुआ. वे भी 10 लाख रुपये के मुआवजे को नाकाफी बताते हुए कहती हैं कि प्रशासन ने इन्हें 10 लाख रुपए देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी, लेकिन इन लोगों के पैसे खत्म होने के बाद ये कहां जाएंगे. पुराने गांव में खेती के लिए उपजाऊ जमीनें थीं और दूसरे साधन भी थे रोजगार के - तेंदू पत्ता, लकड़ी जैसे - जो यहां नहीं है. अगर प्रशासन और सरकार को इनके विकास की सही में चिंता थी तो इन्हें जंगल के आगे ये गांव बसाने चाहिए थे न कि पीछे. पाठशाला में पढ़ रहे बच्चों से बातचीत करने पर पता चलता है कि वे दो साल तक लगातार यहां पेड के नीचे ही पढ़ते रहे. अध्यापिका बताती हैं, 'इस पाठशाला की इमारत बिल्कुल नई है. हम दो सालों तक इसकी मांग करते रहे तब जाकर यह बनी है. और जैसा कि आप देख सकते है इस एक ही छोटी सी बिल्डिंग में दोनों गांव - नया परसापानी और नया घोड़ानार - के स्कूल चल रहे है. ऐसा लगता है सरकार ने औपचारिकता निभाई है.'
इन लोगों के पैसे खत्म होने के बाद ये कहां जाएंगे. पुराने गांव में खेती के लिए उपजाऊ जमीनें थीं और दूसरे साधन भी थे रोजगार के - तेंदू पत्ता, लकड़ी - जो यहां नही है
नया घोड़ानार से कुछ ही दूरी पर बसा है नया चूरना गांव. इस गांव की सड़कें थोड़ी चौड़ी और घर थोड़े बड़े नजर आएंगे. लेकिन लोगों के हालात वैसे ही हैं जैसे नया घोड़ानार में थे. इस गांव में तादाद यादवों की ज्यादा है. इन्हें भी पांच एकड़ जमीन और 10 लाख रुपए देकर चलता कर दिया सरकार ने. यह पूछने पर कि वे कैसे दो सालों तक अपना घर चलाते रहे वे चुप हो जाते हैं. हम समझ जाते हैं कि जिस दिन उनके पैसे खत्म हो जाएंगे, इनकी दिक्कतें कई गुना बढ़ जाएंगी.
नत्थू यादव जो नया चूरना गांव के निवासी हैं बताते हैं कि उनकी जिंदगी जैसे रुक सी गई है और उन्हें नहीं पता कि आगे क्या करना है. जो जमीनें उन्हें घर बनाने को मिली आजतक उनका पट्टा नहीं मिला. जिस घर में ये लोग रहते हैं वो सोलर लाइट सिस्टम द्वारा चलित है, जिसका बिल 500 रुपए प्रति माह आता है. जबकि सरकार ने वादा किया था कि पांच सालों तक इनके घर बिजली का बिल नहीं आएगा. सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि कई घरों में अभी तक बिजली का काम भी नहीं हुआ और बिजली के उपयोग की कोई गुंजाइश ही नही है. लेकिन इनमें से कुछ में बिजली के बिल आ रहे हैं.
पूराने चूरना गांव में पाठशाला जूनियर हाईस्कूल यानी आठवीं तक थी. जबकि नया चूरना में यह सिर्फ पांचवीं तक ही है. इसके कारण यहां कई बच्चों ने पढ़ना बंद कर दिया है. जो पढ़ रहे हैं उन्हें अब दूर जाना पड़ता है. जिस समय में ज्ञान ही सशक्तिकरण का सबसे बड़ा माध्यम हो उसमें कुछ बच्चों के इस तरह हाशिये पर छूटने की भरपायी कैसे की जा सकती है. अगर चूरना के निवासियों को मिली जमीनों की बात करें तो वे हैं तो लेकिन उनमें पत्थर के सिवा कुछ भी उगाना बेहद मुश्किल है.
सरकार इस इंतजार और कोशिश में है कि कैसे भू अधिग्रहण बिल पास हो और कैसे 'विकास' के लिए जरूरी जमीन आसानी से सरकार को, कारोबार को उपलब्ध हो. दूसरी तरफ नया चूरना के किसान बंजर ज़मीनों के उपजाऊ होने के इंतज़ार में हैं
ऊपर से देखने पर घोड़ानार, परसापानी और चूरना विस्थापितों से जुड़े ये मुद्दे शायद कुछ लोगों को छोटे लगें. लेकिन जब इन्हीं पर जिंदगी टिकी हो तो ये फिर जीवन के मुद्दे ही तो हुए. फिर ये छोटे कैसे हो सकते हैं? क्या हमारे लिए अपने बच्चे को अच्छे स्कूल से बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ाने का मुद्दा कभी छोटा हुआ है? तो फिर अपने और अपने बच्चों के जीवन, समाज, रोजगार, आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान की जिंदगी से कटने के इन लोगों के मुद्दे छोटे कैसे हो सकते हैं. हमें यह जानने-समझने की ज़रूरत है कि गांव वे शहर नहीं होते जहां एक अपार्टमेंट से दूसरे में शिफ्ट होना उतना भावुकता भरा नहीं होता. यहां पूरा गांव ही एक तरह से घर होता है जहां बगल के मकान पड़ोसियों के नहीं अपनों के होते है.
सरकार इस इंतजार और कोशिश में है कि कैसे भू अधिग्रहण बिल पास हो और कैसे 'विकास' के लिए जरूरी जमीन आसानी से सरकार को, कारोबार को उपलब्ध हो. दूसरी तरफ नया चूरना के किसान बंजर ज़मीनों के उपजाऊ होने के इंतज़ार में हैं. नत्थू यादव और उनके जैसे परिवारों की बेटियां बेटी पढ़ाओ के शोर से दूर इस बात के इंतजार में हैं कि कब उनका प्राइमरी स्कूल आठवीं तक हो और वे इसमें पढ़ने जा पाएं. सबको सरकार से उम्मीद है. सरकार भी उम्मीद से है.
जब हम होशंगाबाद के कमिश्नर बीके बाथम से पूछते हैं कि क्या यह विस्थापन लोगों के लिए अच्छा साबित हुआ तो उनका कहना था कि सरकार का मकसद हमेशा ही सामाजिक न्याय करना ही रहा है. उनके यह कहने से ही मालूम चल जाता है कि विस्थापन ने गांव के लोगों से क्या-क्या छीना है यह शायद ही सरकार को कभी मालूम पड़े.
इन नये गांव के लोगों को नये गांवों में मकान तो मिल गए, मगर उनके घर अभी भी पुराने गांव में हैं. उन्हें इन मकानों में अपने घर बसाने में कितना वक्त लग जाएगा, इसका अनुमान हमें, सरकारों को उन लोगों को हो ही नहीं सकता जिन्होंने बलात विस्थापन नहीं झेला हो. लेकिन हममें इतनी संवेदना तो हो ही सकती है कि हम ये आशा कर सकें कि दस लाख रुपए खत्म होने से पहले ही इनके घर बस जाएं.