भारत में रंगभेद का अपना अलग संस्करण है जो लिंगभेद से जुड़कर और भयानक हो जाता है.
अक्सर सुनने में आता है कि जैसे हमारे यहां जातिभेद है वैसे पश्चिम में रंगभेद. कहने वालों का आशय शायद यह होता हो कि हर समाज में भेदभाव का कोई न कोई अनिवार्य रूप तो होता ही है. हमारे यहां जातिभेद है तो क्या! यहां रंगभेद तो नहीं है. लेकिन सच यह है कि भारत रंगभेद से अछूता नहीं है. बल्कि यहां इसका अपना अलग संस्करण है जो लिंगभेद से जुड़कर और भयानक हो जाता है. विदेशी रंगभेद से भारतीय रंगभेद इस मामले में अलग है कि वहां काले रंग का कोप स्त्री-पुरुष दोनों पर रहता है. लेकिन भारत में काले या सांवलेपन को खासतौर से स्त्रियों के संदर्भ में देखा, सुना, कहा और परिभाषित किया जाता है.
हाल ही में भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि राजीव गांधी यदि किसी सांवली या काले रंग की नाइजीरियन से विवाह करते तो कांग्रेस उसे अपने नेता के रूप में स्वीकार ही नहीं करती. मतलब कि सोनिया गांधी अपने गोरे रंग के कारण आज इस पद और ओहदे पर हैं. इससे कुछ समय पहले गोआ के मुख्यमंत्री लक्षमीकांत पारसेकर ने हड़ताल कर रहीं नर्सों को कहा था कि वे धूप में बैठकर हड़ताल न करें क्योंकि इससे उनका रंग ‘डार्क‘ होगा जिसकी वजह से उनकी वैवाहिक संभावनाएं बिगड़ेंगी.
गोरा बनाने वाली क्रीम के विज्ञापनों में सावले रंग की लड़की सिर्फ हीनता की शिकार दिखती हैं. सांवले रंग की लड़की मतलब कि जिसे गोरे रंग की लड़की से बदला जाना है.
विदेश में कोई राष्ट्रीय नेता ऐसी रंगभेदी टिप्पणी इस तरह खुलेआम नहीं कर सकता. लेकिन हमारे यहां ऐसी लिंगभेदजनित रंगभेदी टिप्पणियां अक्सर ही सुनने को मिल जाती हैं. कुछ साल पहले एक पति ने अपनी पत्नी के सांवले रंग को लेकर उसे इतने ताने मारे कि  अंततः पत्नी ने तंग आकर आत्महत्या कर ली थी. सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति को धारा 498अ के तहत दो साल की सजा सुनाई थी. अदालत का कहना था कि किसी स्त्री से उसके रुप-रंग के बारे में अभद्र बात कहना उसके साथ किये जाने वाले शारीरिक उत्पीड़न से भी बुरा है. यह किसी संवेदनशील स्त्री को सदमे में डालकर उसकी मौत का कारण भी बन सकता है. रंगभेद के भारतीय संस्करण के ऐसे कई उदाहरण हमारे समाज में बिखरे पड़े हैं.
रंगभेदी टिपणियां अक्सर किसी बड़े विरोध प्रदर्शन का कारण नहीं बनतीं. एक तो लड़कियों या स्त्रियों का अपना कोई एकजुट संगठन या समूह नहीं है. दूसरे, सिर्फ गोरा रंग ही सुंदरता का पर्याय है, यह सोच पूरे स्त्री वर्ग के दिमाग में जमी हुई है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि यहां काला या सांवला रंग अधिकतर लड़कियों और स्त्रियों के संदर्भ में ही परिभाषित है. सांवला या काला रंग भारतीय लड़कियों के लिए जितना बड़ा अभिशाप है उतना लड़कों के लिए नहीं. सांवले रंग की लड़की के जन्म पर किसी गोरे रंग की बच्ची से ज्यादा दुख और अफसोस जताया जाता है. विवाह के समय ज्यादा दहेज देकर लड़की के सांवले रंग के 'अवगुण' की भरपाई करने की कोशिश की जाती है. सांवली लड़कियों पर अक्सर ही ज्यादा मेहनती होने, पढ़ाई में ज्यादा अच्छा होने और ज्यादा सुघड़ता से काम करने का दबाव रहता है.
प्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी और लेखिका व उदयोगपति प्रभा खेतान की आत्मकथाएं हमें बताती हैं कि सांवले रंग ने कैसे उनके बचपन में जहर घोला, जिसका असर उनके पूरे व्यक्तित्व पर जिंदगी भर रहा. सांवला रंग भारतीय लड़कियों को हीन महसूस करने को बाध्य करता है, उनके आत्मविश्वास को खत्म करता है. उनके व्यक्तित्व को बेरहमी से कुचलता है.
प्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी और लेखिका व उदयोगपति प्रभा खेतान की आत्मकथाएं हमें बताती हैं कि सांवले रंग ने कैसे उनके बचपन में जहर घोला, जिसका असर उनके पूरे व्यक्तित्व पर जिंदगी भर रहा.
सेल्स गर्ल से लेकर एअर होस्टेस तक गोरा रंग ही अनकही बुनियादी जरूरत है. वैवाहित विज्ञापन से लेकर फिल्मी दुनिया तक हर जगह सिर्फ गोरे रंग की लड़कियां ही मांग में हैं. भारतीय समाज में लड़कियों के लिए सांवला रंग किसी शारीरिक अपंगता जितना ही बड़ा अभिशाप है. गोरा बनाने वाली क्रीम के विज्ञापनों में सावले रंग की लड़की सिर्फ हीनता की शिकार दिखती हैं. सांवले रंग की लड़की मतलब कि जिसे गोरे रंग की लड़की से बदला जाना है. यहां लड़कियों के हुनर से ज्यादा उनके रंग, रूप और फिगर की पूछ है.
रंग को लेकर की गई टिप्पणी कोई ‘इतनी सी‘ बात नहीं है. सवाल तिरस्कार का है. रंग, नस्ल, जाति, संप्रदाय या फिर लिंग के आधार पर किया गया कोई भी तिरस्कार ‘इतना सा‘ नहीं होता. वह भी तब जब कि सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन जीना किसी भी इंसान का नैसर्गिक अधिकार और इच्छा होती है.
आज भारत में गोरा बनाने वाली ‘फेयरनेस क्रीम‘ का बाजार 1800 करोड़ रुपये का है. ब्लीच का 200 करोड़ रुपये का बाजार है. 2012 में भारत में 233 टन फेयरनेस क्रीम की खपत हुई. हालांकि अब लड़कों को भी गोरा बनाने वाली क्रीम बाजार में आ गई हैं, लेकिन फेयर होने और दिखने का दबाव अभी भी लड़कियों को तुलनात्मक रूप से कहीं ज्यादा है.
साल-दर-साल गोरेपन की क्रीमों का बढ़ता बाजार साफ संकेत करता है कि न सिर्फ भारतीय समाज बल्कि पूरी दुनिया के देश एक नए किस्म के रंगभेद को बेहद गुपचुप तरीके से भारी समर्थन दे रहे हैं. ऊपर-ऊपर से हम रंगभेद का चाहे कितना ही विरोध कर लें, गोरेपन के प्रति इतनी ज्यादा आसक्ति काले रंग के प्रति हमारी घृणा को छिपने नहीं दे रही.
ऊपर-ऊपर से हम रंगभेद का चाहे कितना ही विरोध कर लें, गोरेपन के प्रति इतनी ज्यादा आसक्ति काले रंग के प्रति हमारी घृणा को छिपने नहीं दे रही.
अपनी किताब ‘ब्यूटी मिथ‘ में चर्चित लेखिका नाओमी वुल्फ लिखती हैं कि किस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियां सौंदर्य प्रसाधनों के द्वारा सौदर्य का एक झूठ (मिथ) गढ़ती हैं और स्त्री देह को अनुशासित करती हैं. वे कहती हैं, 'इस देह अनुशासन में भी एक मर्दवादी दृष्टि सक्रिय रहती है. जिस तरह से बाजार द्वारा तय किये गए सौंदर्य के पैमानों का प्रकोप बढ़ रहा है उससे, अब किसी के तंज किये बिना भी हम पर हर वक्त सिर्फ गोरा, सुंदर और आकर्षक दिखने का दबाव बढ़ रहा है.'
लड़कियों/स्त्रियों के जीवित रहने में पहले ही कितनी बाधाएं हैं - भ्रूण हत्या, बालिका वध, यौन शोषण, दहेज, बलात्कार, डायन या चुड़ैल घोषित कर देना और न जाने क्या-क्या. गोरे रंग की ‘काली चाहत‘ लड़कियों के जीवन को और भी ज्यादा दबाव और तनाव में रखती है. एक बहुत बड़े तबके को सिर्फ उसके रंग के कारण हीनताबोध में रखना उनके हुनर और उसकी रचनात्मकता को खत्म करता है. सांवली बेटियों को तानामुक्त रखकर और विवाह के बाजार से ‘फेयर‘ बहू की डिमांड खत्म करके इस लिंगभेदी रंगभेद को खत्म करने की शुरूआत की जा सकती है.
लेकिन गोरा करने की क्रीम बेचकर दसियों करोड़ रु का मुनाफा कमाने वाली कंपनियां हमें ऐसा हरगिज नहीं करने देंगी. अति तार्किक और आधुनिक 21वीं सदी रंगभेद का कड़ा विरोध करने के बावजूद इसके दुश्चक्र में फंसे रहने को अभिशप्त है.