गजेंद्र सिंह की जिस चिट्ठी को नेता सुसाइड नोट बता रहे हैं दरअसल वह उसका शिकायत पत्र था. गजेंद्र आम आदमी पार्टी की रैली में मरने नहीं आया था. वह अपनी बात कहने आया था.
ये एक किसान की आत्महत्या से ज्यादा मंच पर बैठे नेताओं की आत्मा की हत्या का मामला है. गजेंद्र सिंह कल्याणवत की मौत से पहले जो संसद मौन थी, मौत के बाद उसमें गजेंद्र की गूंज सुनाई दे रही थी. अगर नेताओं के भाषण को छोड़कर तथ्यों पर ध्यान दें तो साफ लगता है गजेंद्र आम आदमी पार्टी की रैली में मरने नहीं आया था. वह अपनी बात कहने आया था. वह ज़िंदा घर लौट जाना चाहता था.
गजेंद्र की जिस चिट्ठी को नेता सुसाइड नोट बता रहे हैं दरअसल वह उसका एक छोटा सा भाषण था. इस भाषण में उसकी शिकायतें थी. उसकी समस्या का जिक्र था. इसमें वह अपने घर जाने की बात कर रहा था. वह आम आदमी पार्टी के मंच से इस भाषण को देना चाहता था. लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाया तो मंच पर बैठे नेताओं और इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण कर रहे कैमरों का ध्यान खींचने के लिए पेड़ पर चढ़ गया. उसकी तस्वीर पूरे देश ने देखी. लेकिन किसी ने उसे समझा-बुझाकर नीचे उतारने की ठीकठाक कोशिश नहीं की. नेताओं ने तो बिलकुल नहीं. जो बातें उसके चले जाने के बाद हो रही हैं, उस तरह की कोशिशें ज़िंदा रहते होतीं तो शायद वह बच जाता.
आजकल आम आदमी पार्टी में इतने षडयंत्र चल रहे हैं कि मंच पर बैठे नेता पेड़ पर चढ़े गजेंद्र को भी उसी का हिस्सा समझ रहे थे. कुमार विश्वास ने तो मंच से ऐसा कहा भी था.
मंच पर बैठे आम आदमी पार्टी के नेताओं और उस पेड़ के बीच बस कुछ कदमों का ही फासला था. वहां जाने में एक मिनट का वक्त लगता. लेकिन उस फासले को मंच पर बैठे बीस नेताओं में से किसी ने तय नहीं किया. चाहे कुमार विश्वास हों या संजय सिंह. ये सब बार-बार दिल्ली पुलिस से ही कहते रहे. वह भी पता नहीं कैसे कि उसके सिपाहियों ने मुख्यमंत्री की भी बात नहीं सुनी. आजकल आप में इतने षडयंत्र चल रहे हैं कि मंच पर बैठे नेता पेड़ पर चढ़े गजेंद्र को भी उसी का हिस्सा समझ रहे थे. कुमार विश्वास ने तो मंच से ऐसा कहा भी था. उन्हें चिंता इस बात की थी कि कहीं उनकी रैली खराब न हो जाए. एक किसान ने इनकी रैली में आए कैमरों का ध्यान जो अपनी ओर खींच लिया था.
अफसोस की बात यह है कि गजेंद्र सिंह की मौत की खबर मिलने के बाद भी रैली चलती रही. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने माइक पकड़ा, दो लाइन में किसान के प्रति संवेदना व्यक्त की और करीब पंद्रह मिनट लंबा भाषण दिया. इसके बाद माइक के सामने खुद केजरीवाल आए. उन्होंने भी भाषण की शुरुआत में गजेंद्र की बात की. कहा ग्लानि हो रही है, ज्यादा नहीं बोलूंगा. फिर करीब सात मिनट बोले. आम आदमी पार्टी के ही सांसद धर्मवीर गांधी ने ठीक कहा, 'रैली बंद हो जानी चाहिए थी. उस राजनीति सभा को शोक सभा में बदल देना चाहिए था.'
पेड़ पर बैठकर उसने पहले अपने भाई को फोन किया, उससे कहा उपमुख्यमंत्री ने बुलाया है. टीवी पर देखो, जिस चैनल पर देखोगे, मैं ही दिखूंगा.
गजेंद्र दौसा का किसान था. साफा बांधने-बेचने का काम भी करता था. उसकी एक वेबसाइट थी - जयपुरीसाफे डॉट कॉम. फेसबुक पेज भी था. यानी कि वह सिर्फ किसान नहीं था. वह राजनीति में भी था. पहले समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ना चाहता था. फिर कांग्रेस से टिकट पाने की कोशिश की. कांग्रेस से निराशा मिली तो आम आदमी पार्टी की झाड़ू थाम ली. उसी झाड़ू के साथ वह दौसा से दिल्ली आ गया. घर वालों से कहकर आया था कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने उसे रैली में बुलाया है. जब हजारों की भीड़ में वह गुम हो गया तो उसने अपने लिए पेड़ का रास्ता चुना. पेड़ पर बैठकर उसने पहले अपने भाई को फोन किया, उससे कहा उपमुख्यमंत्री ने बुलाया है. टीवी पर देखो, जिस चैनल पर देखोगे, मैं ही दिखूंगा. थोड़ी देर बाद उसने अपनी बहन को फोन किया. उससे कहा, टीवी ऑन करो, मैं दिख रहा हूं. यह वादा किया कि शाम को जब घर लौटेगा तो मिलता जाएगा. जाहिर सी बात है उसे मरना नहीं था. लेकिन शाम से पहले ही उसके मौत की खबर घरवालों तक पहुंच गई.
गजेंद्र की मौत को अब एक मिस्ट्री बनाया जा रहा है. वह कैसे गिरा? क्या उसका पैर फिसल गया? क्या टहनी टूट गई? क्या उसे खुदकुशी के लिए उकसाया गया. ये तमाम सवाल मीडिया में हेडलाइन बन रहे हैं. अफसोस इस बात का है जब गजेंद्र ज़िंदा था तब सियासत का शिकार था, और मौत के बाद सियासतदानों का हथियार बन गया है. भारत के किसान की यही नियति है. गजेंद्र तो फिर भी किस्मत वाला है कि उसका नाम लिया जा रहा है. विदर्भ और बुंदेलखंड में तो सिर्फ 'इतने' या 'उतने' किसान मरते हैं. उनका नाम कभी हमें पता पड़ा है!