पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी को 2004 में इस बात का आश्वासन दिया था कि जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित नहीं किया जाएगा.
पिछले साल लोकसभा चुनाव से पहले जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले थे. इसके तुरंत बाद उन्होंने कांग्रेस को समर्थन देने वाला बयान जारी कर दिया था. भाजपा ने तब कांग्रेस पर सांप्रदायिक आधार पर चुनाव लड़ने का आरोप लगाया था. अब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का एक पत्र सामने आया है जिससे पता लगता है कि उन्होंने इमाम बुखारी को 2004 में इस बात का आश्वासन दिया था कि जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित नहीं किया जाएगा.
20 अक्टूबर 2004 को मनमोहन सिंह ने यह पत्र इमाम बुखारी के 10 अगस्त 2004 को उन्हें लिखे पत्र के जवाब में लिखा था. अपने पत्र में मनमोहन सिंह बुखारी के पत्र का हवाला देते हुए लिखते हैं कि 'मैंने संस्कृति मंत्रालय और एएसआई को एक तय समय में जामा मस्जिद की मरम्मत का काम पूरा कराने के निर्देश दे दिए हैं. संस्कृति मंत्रालय ने यह भी फैसला किया है कि वह जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित नहीं करेगा.' यह पत्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने दिल्ली हाइकोर्ट में जमा किया है जो जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित किए जाने से संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रहा है.
पत्र से साफ है कि इमाम बुखारी ने अपने पत्र में जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित न करने की मांग की थी जिसे तब के प्रधानमंत्री ने मान लिया था. हालांकि ऐसा किये जाने की कोई वाजिब वजह थी नहीं.
बड़ी अजीब सी बात है. पत्र से साफ है कि इमाम बुखारी ने अपने पत्र में जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित न करने की मांग की थी जिसे तब के प्रधानमंत्री ने मान लिया था. हालांकि ऐसा किये जाने की कोई वाजिब वजह थी नहीं. मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा बनवाई गई जामा मस्जिद सन् 1656 में बनकर तैयार हुई थी और यह देश की सबसे बड़ी मस्जिद भी है. पुरातात्विक महत्व की होने की वजह से इसकी मरम्मत आदि का खर्चा भारत सरकार ही उठाती रही है और यह काम एएसआई ही करता रहा है. यह बात न केवल मनमोहन सिंह के पत्र से स्पष्ट होती है बल्कि एएसआई ने कोर्ट को दिए अपने एक एफिडेविट में भी कहा है कि 'जामा मस्जिद के शाही इमाम लगातार संरक्षण के लिए एएसआई से मदद मांगते रहे हैं. जहां तक धन की बात है तो वह भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा आवंटित किया जाता रहा है और ऐसा कभी शाही इमाम या वक्फ बोर्ड द्वारा नहीं किया गया.'
जबकि सैयद अहमद बुखारी पर जामा मस्जिद को - जोकि असल में वक्फ बोर्ड की संपत्ति है - अपनी निजी जागीर की तरह इस्तेमाल करने और उसका स्वरूप बिगाड़ने के आरोप लगते रहे हैं. अदालत में बुखारी के खिलाफ याचिका दायर करने वाले सुहैल अहमद खान के मुताबिक न केवल बुखारी ने यात्रियों के लिए बने विश्रामगृह पर कब्जा कर लिया बल्कि उसके पड़ोस में अपने बेटे के लिए एक घर भी बनवा दिया है. मस्जिद कैंपस में आम लोगों के प्रयोग के लिए बने मीटिंग हॉल - जन्नतनिशां - पर इमाम बुखारी के छोटे भाई याह्या का कब्जा है तो इसके एक गेट पर स्थित सरकारी डिस्पेंसरी पर उनके एक और भाई हसन बुखारी का. इसके अलावा मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि मस्जिद के बाहर के पार्कों और मैदानों में से किसी को बुखारी परिवार ने अपनी निजी पार्किंग बनाया हुआ है तो किसी को सार्वजनिक, जिससे परिवार को बड़ी मोटी कमाई होती है. तहलका द्वारा की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक मस्जिद के गेट नंबर एक के पास मौजूद कॉर्पोरेशन के मैदान पर भी बुखारी बंधुओं का ही कब्जा है. इस पार्क को लोग शादी-ब्याह जैसे समारोहों के लिए इस्तेमाल करते थे. लेकिन अब ऐसा करने के लिए उन्हें बुखारी परिवार को एक मोटी रकम देनी पड़ती है. इसी रिपोर्ट में सैयद शहाबुद्दीन कहते हैं, ‘कुछ समय पहले इमाम अहमद बुखारी के छोटे भाई याह्या बुखारी ने मस्जिद में ही मूर्ति बेचने की दुकान खोल ली थी जिसकी इस्लाम में सख्त मनाही है.’
सैयद अहमद बुखारी पर जामा मस्जिद को - जोकि असल में वक्फ बोर्ड की संपत्ति है - अपनी निजी जागीर की तरह इस्तेमाल करने और उसका स्वरूप बिगाड़ने के आरोप लगते रहे हैं.
इसके अलावा जामा मस्जिद की मीनार के टिकट, कैमरे आदि की अनुमति देने से हुई लाखों रुपये की कमाई भी बुखारी परिवार की जेब में ही जाती है. लेकिन मस्जिद से इतनी मोटी कमाई करने वाले इमाम बुखारी जब जामा मस्जिद पर खर्च करने की बात आती है तो इसका जिम्मा सरकार पर डाल देते हैं या वक्फ बोर्ड पर. उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों उन्होंने जामा मस्जिद का करोड़ो रुपये का बिजली का बिल यह कह कर देने से मना कर दिया था कि 'अगर वह (वक्फ बोर्ड) चाहता है कि बिल मैं भरूं तो पहले उन्हें जामा मस्जिद मेरे नाम करनी होगी.’
इस सबके बावजूद इतने महत्वपूर्ण स्मारक को शाही इमाम के ही कहने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संरक्षित स्मारक बनाने से मना कर देते हैं. एएसआई ने अपने एफिडेविट में कहा है कि जामा मस्जिद को केंद्रीय संरक्षित स्मारक बनाने का मुद्दा उठा था लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री ने शाही इमाम को भरोसा दिलाया था कि ऐसा नहीं होगा. एएसआई अपने-आप इस स्मारक को संरक्षित घोषित नहीं कर सकता था. अब जोड़ने वाले चाहें तो 2004 में जो मनमोहन सिंह ने किया उसे 2014 में शाही इमाम के कांग्रेस को दिए समर्थन से जोड़कर देख सकते हैं. सीधे-सीधे नहीं तो इस तरह से कि मनमोहन सिंह ने जो किया वह शाही इमाम से 2014 जैसा कुछ करवाने की आशा में ही किया होगा.
यहां यह भी जानना महत्वपूर्ण है कि यदि जामा मस्जिद को प्राचीन स्मारक और पुरातत्व कानून के अंतर्गत संरक्षित कर दिया जाता तो क्या होता? उस हालत में इमारत का संरक्षण बेहतर होता. इसका एक पूजास्थल की तरह से तो प्रयोग होता रहता लेकिन किसी अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने से पहले अनुमति की आवश्यकता होती. और इससे यदि किसी तरह की आय होती तो उसका इस्तेमाल इसके रखरखाव के लिए किया जा सकता था. जबकि अभी इससे होने वाली आय एक ऐसे व्यक्ति की जेब में जाती है जो इसका अधिकारी नहीं है और इसपर खर्चा जनता की जेब से किया जाता है.
जोड़ने वाले चाहें तो 2004 में जो मनमोहन सिंह ने किया उसे 2014 में शाही इमाम के किए से जोड़ सकते हैं. सीधे-सीधे नहीं तो इस तरह से कि मनमोहन सिंह ने जो किया वह शाही इमाम से 2014 जैसा कुछ करवाने की आशा में ही किया होगा
मनमोहन सिंह ने 2004 में इमाम बुखारी के लिए जो किया या जो उनसे उनकी पार्टी ने कराया, वैसा इमाम बुखारी के लिए राजनीतिक फायदे या कई तरह के डरों की खातिर लगातार किया जाता रहा है. हाल की ही बात करें तो 2012 में समाजवादी पार्टी ने भी इमाम बुखारी को खुश करने की कोशिश की थी. सपा ने बुखारी के समर्थन के बदले उनके दामाद उमर अली खान को सहारनपुर की मुस्लिम-बहुल बेहट विधानसभा सीट से टिकट दिया था. लेकिन सपा को जीत का भरोसा दिलाने वाले बुखारी के दामाद ही इतनी भीषण सपा लहर में भी, अपना ही चुनाव हार गए. कांग्रेस को भी बुखारी ने 2014 में समर्थन किया था तो उसका क्या हाल हुआ यह कांग्रेस खुद नहीं सोचना चाहती. यहां एक और मजेदार बात यह है कि सियासत के हर घाट का पानी पी चुके बुखारी ने 2004 के आम चुनाव में भाजपा का समर्थन किया था. लेकिन तब भाजपा को भी बड़ी हार का ही सामना करना पड़ा था.
वैसे परमाणु करार के वक्त भी मनमोहन सिंह की पार्टी करार के पक्ष में इसलिए नहीं थी कि अमेरिका और जॉर्ज बुश के साथ करार करने से देश की मुस्लिम आबादी कांग्रेस से नाराज हो सकती है. लेकिन मनमोहन सिंह इस करार पर अपनी सरकार गिर जाने की हद तक अड़े रहे और न केवल करार किया बल्कि अगला आम चुनाव भी बड़ी शान से जीते. इससे और ऊपर दिए उदाहरणों से दो बातें निकल कर आती हैं. पहली तो यह कि मनमोहन सिंह के ऊपर शाही इमाम को उपकृत करने या उन्हें नाराज न करने का दबाव शायद 'ऊपर' से रहा होगा और दूसरी देश की मुस्लिम आबादी को ठीक से हमारी राजनीति समझ ही नहीं पा रही है जिसका नुकसान अंत में देश और खुद राजनीति भी उठा रही है.