नेपाल में आए भयानक भूकंप ने माउंट एवरेस्ट पर जो असर छोड़ा है उससे उन दसियों हजार लोगों के सामने खाने के लाले पड़ गए हैं जिनके बिना दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी पर फतह पाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.
नेपाल में भयानक तबाही मचाने वाले भूकंप ने इस देश दो बड़े प्रतीकों को भी जबर्दस्त झटका दिया है. एक राजधानी काठमांडू और दूसरा एवरेस्ट. इन दोनों पर हर नेपाली गर्व करता है. अपनी राजधानी, वहां के मठ-मंदिर और सांस्कृतिक प्रतीक आम नेपाली नागरिक को जितना गौरवान्वित करते हैं, उतना ही गौरव ‘सागर माथा’ यानी माउंट एवरेस्ट भी उसको महसूस करवाता है.
काठमांडू की तबाही बहुत बड़ी है मगर वहां पुनर्निर्माण संभव है. परंतु एवरेस्ट में जो तबाही हुई है उसकी भरपाई फिलहाल तो असंभव सी दिखती है. प्रकृति के इस सबसे संवेदनशील इलाके में अब तक की यह सबसे बड़ी जनहानि है. 25 अप्रैल को आए भूकंप के बाद एवरेस्ट बेस कैंप में पुमोरी पर्वत शिखर से हुए एक भयानक हिमस्खलन के कारण भारी तबाही हुई. 18 से अधिक पर्वतारोही व शेरपा मारे गए और 70 से ज्यादा बुरी तरह घायल हुए. समूचा बेस कैंप तबाह हो गया.
इस भूकंप के कारण एवरेस्ट पर नेपाल की ओर से आरोहण कर पाना असम्भव हो गया है.  नई हिम दरारें और नए एवलांच जोन बन जाने से यह रास्ता बेहद खतरनाक और अस्थिर हो गया है.
हालांकि एवरेस्ट में 1922 के पहले ब्रिटिश पर्वतारोहण अभियान के साथ ही मौतों का सिलसिला शुरू हो चुका था. उस अभियान में सात जून 1922 को सात शेरपा मारे गए थे. इसके बाद दूसरा बड़ा हादसा 1970 में हुआ जब छह शेरपाओं समेत आठ लोग एवरेस्ट का शिकार बने. अप्रैल 2014 में फिर एक बड़े हादसे में 16 शेरपा एवलांच में दब कर मारे गए. अब तक 15 हजार से ज्यादा पर्वतारोही एवरेस्ट पर आरोहण का प्रयास कर चुके हैं जिनमें से 2014 के आखिर तक 3308 लोग शिखर पर पहुंच भी चुके हैं. लेकिन सफलता की इस कहानी में 280 लोगों ने अपनी जान भी गंवाई है.
अब तक एवरेस्ट में हुई मौतों के पीछे ज्यादातर अति उत्साह, मानवीय भूल, खराब मौसम, बीमारी या दुर्घटना जैसे कारण जिम्मेदार होते थे. लेकिन इस बार हादसे की वजह भूकंप बना है. इस भूकंप के कारण एवरेस्ट पर नेपाल की ओर से आरोहण कर पाना असम्भव हो गया है क्योंकि बेस कैंप इलाके में तबाही के साथ साथ खुम्भू ग्लेशियर, खुम्भू आइस फाॅल और उससे ऊपर के इलाके की पूरी हिम बनावट ही अस्त व्यस्त हो गई है. नई हिम दरारें और नए एवलांच जोन बन जाने से यह रास्ता बेहद खतरनाक और अस्थिर हो गया है.
सामान्यतः एवरेस्ट पर चढ़ाई के दो रास्ते हैं. एक नेपाल वाला परम्परागत मार्ग और दूसरा तिब्बत वाला. नेपाल वाले रास्ते में जो आधार शिविर पड़ता है उसे साउथ बेस कैंप कहते हैं और तिब्बत वाले आधार शिविर को नार्थ बेस कैंप. इस बार तबाही साउथ बेस कैंप में हुई, हालांकि भूकंप के झटके नार्थ बेस कैंप में भी महसूस किए गए.
कठिन और दुर्गम होने के बावजूद पर्वतारोही और ट्रैकर इसी रास्ते को प्राथमिकता देते हैं. क्योंकि इसमें ऊंचाई के हिसाब से शरीर का तालमेल यानी एक्लेमेटाइजेशन भी आसानी से हो जाता है.
पर्वतारोहियों की पहली पसन्द नेपाल वाला मार्ग है. इस रास्ते में पहले काठमांडू से लुकला के तेनजिंग-हिलेरी हवाई अड्डे तक जाया जाता है. वहां से एवरेस्ट बेस कैंप तक का पैदल रास्ता छह दिन लंबा है. इस मार्ग में एवरेस्ट नेशनल पार्क का प्रवेश द्वार भी पड़ता है और नामचे बाजार नामक सबसे बड़ा शेरपा कस्बा भी. नामचे बाजार से आगे खुमजुंग गांव में एडमंड हिलेरी का 1961 में बनवाया गया प्रसिद्ध शेरपा स्कूल और अस्पताल भी पड़ता है. इसके आगे यांगबोचे मठ और गिमबोचे होकर पर्वतारोही साउथ बेस कैंप में पहुंचते हैं. यहीं कालापत्थर से एवरेस्ट के साथ साथ चो-ओयू, लोत्से और मकालू जैसे आठ हजार मीटर से ऊंचे तीन और भव्य हिम शिखरों के भी दर्शन होते हैं. मार्ग में घने जंगल, दूधकोसी और भोटकोसी नदियों का दूधिया जल, सुन्दर घाटियां और तरह-तरह के पक्षी पर्वतरोहियों का मन मोहते रहते हैं. इसलिए कठिन और दुर्गम होने के बावजूद पर्वतारोही और ट्रैकर इसी रास्ते को प्राथमिकता देते हैं. इसमें ऊंचाई के हिसाब से शरीर का तालमेल यानी एक्लेमेटाइजेशन भी आसानी से हो जाता है.
इसके विपरीत तिब्बत की ओर का मार्ग आसान माना जाता है. फ्रेंडशिप हाइवे में शेलकर नामक स्थान से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी गाड़ियों से तय करते हुए आरोही सीधे नार्थ बेस कैंप तक पहुंच सकते हैं. इसके लिए चीन सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है. वाहन और ड्राइवरों का इंतजाम भी चायना-तिब्बत माउण्टेनियरिंग एसोसिएशन (सीटीएमए) करती है. इस मार्ग में 50 किमी चल कर रोंगबूक मठ आता है और फिर 50 किमी बाद उत्तरी रोंगबूक ग्लेशियर में स्थित है नार्थ बेस कैंप. इस मार्ग में खर्च भी कम होता है और चीन ने बेस कैंप तक मोटर सड़क बना कर राह भी बहुत आसान कर दी है. नार्थ बेस कैंप में आरोहियों के हट और टायलेट भी बनाए गए हैं और वहां अस्थाई दुकानें भी हैं.
पिछले वर्ष 16 शेरपाओं के मारे जाने के बाद शेरपाओं ने विरोध स्वरूप पर्वतारोहण का काम बन्द कर दिया था. उनका आरोप था कि नेपाल सरकार तो एवरेस्ट के नाम पर बहुत पैसा कमाती है लेकिन उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए कुछ नहीं होता.
फिर भी एवरेस्ट की चुनौतियों का सामना करने वालों को अब तक परंपरागत नेपाल वाला मार्ग ही ज्यादा पसन्द है. मगर दो वर्ष से लगातार हो रहे हादसों ने अब इसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं. पिछले वर्ष 16 शेरपाओं के मारे जाने के बाद शेरपाओं ने विरोध स्वरूप पर्वतारोहण का काम बन्द कर दिया था. उनका आरोप था कि नेपाल सरकार तो एवरेस्ट के नाम पर बहुत पैसा कमाती है, लेकिन शेरपा पर्वतारोहियों की सुरक्षा और सम्मान के लिए कुछ नहीं किया जाता. इसके बाद नेपाल की ओर से इस क्षेत्र के सभी बड़े पर्वतारोहण अभियान रद्द हो गए थे. इस साल भी एवरेस्ट हादसे के कारण समूचा पर्वतारोहण उद्योग ठप पड़ गया है.
मई का महीना एवरेस्ट आरोहण के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है. इसलिए अप्रैल में एवरेस्ट बेस कैंप में तीर्थ यात्रा का सा माहौल होता है. दुनिया भर के पर्वतारोही, ट्रैकर और प्रकृति प्रेमी वहां पहुंचते हैं. तेनजिंग और हिलेरी ने भी एवरेस्ट पर 1953 में 23 मई को ही पहली बार विजय प्राप्त की थी. कुछ वर्ष पूर्व 2011 में 23 मई को ही 37 अलग-अलग पर्वतारोही दलों के 169 पर्वतारोहियों ने आरोहण करके एक रिकार्ड बनाया था. इस बार भी अप्रैल में 24 पर्वतारोही दलों ने साउथ बेस कैंप एरिया में अपने-अपने तम्बू गाड़े थे. बेस कैंप का यह इलाका लगभग पांच किलोमीटर में फैला हुआ है. यह पूरा क्षेत्र मोरेन है यानी ग्लेशियरों के साथ आई मिट्टी और चट्टानों से बना है. इस ऊबड़-खाबड़ इलाके में निचले भाग को लोअर बेस कैंप और उपरी भाग को अपर बेस कैंप कहते हैं. अपर बेस कैंप में ही इस बार सर्वाधिक तबाही हुई है.
sherpa
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25 अप्रैल की उस डरावनी दोपहर से पहले इस इलाके में हर बार की तरह दुनिया भर के पर्वतारोही दलों के दर्जनों टेण्ट लगे हुए थे. अलग-अलग धर्म, संस्कृति और भाषाओं वाले 24 पर्वतारोहियों और ट्रैकरों का एक मेला सा लगा था. मगर एवलांच के बाद एक झटके में वहां का सारा परिदृश्य बदल गया. इस दुर्योग के बीच एक संयोग यह था कि बेस कैंप में हर अभियान दल की अपनी-अपनी संचार व्यवस्था थी, इसलिए पलक झपकते ही एवरेस्ट पर भूकंप की सूचना दुनिया भर में एक बड़ी खबर बन गई. पश्चिमी देशों के लिए एवरेस्ट के कारण ही नेपाल का भूकंप एक बड़ी खबर बन पाया और पूरी दुनिया का ध्यान तत्काल इस त्रासदी ओर गया. दूसरा संयोग यह रहा कि प्रायः हर अभियान दल के डाक्टर बेस कैंप में ही होने के कारण घायलों को जरूरी मदद तुरंत मिल गई. एवरेस्ट बेस कैंप में सभी दलों के बचे हुए सदस्यों ने लगभग 32 घंटे तक बचाव और राहत का काम किया जिससे कई पर्वतारोहियों की जान बच गई और अगले दिन तक मौसम ठीक रहने के कारण बेस कैंप के घायलों को हेलीकाप्टरों से नीचे भेजा जा सका. अगर यह सब नहीं होता तो एवरेस्ट बेस कैंप में मरने वालों की संख्या बहुत ज्यादा होती.
एवरेस्ट की छाती पर लगे घाव बहुत गहरे हैं
मगर जो घाव एवरेस्ट की छाती पर लगे हैं उनका उपचार इंसान के हाथ में नहीं है. इस भूकंप और उसके कारण आए एवलांच के बाद इस ओर से एवरेस्ट आरोहण के सारे मार्ग में बहुत सारी तब्दीलियाँ हो गई हैं. पुराने रास्ते खत्म हो गए हैं, नई हिमदरारें बन गई हैं और पूरा इलाका अस्थिर हो गया है. खुम्भू ग्लेशियर भी पहले से कहीं अधिक खतरनाक हो गया है और वहां नए नए एवलांच जोन पैदा हो गए हैं.
बेस कैंप से लुकला तक के पैदल मार्ग की भी बुरी स्थिति है. कई पुल टूट गए हैं. रास्ते के गांवों में ज्यादातर घर क्षतिग्रस्त हो गए हैं. इस पूरे मार्ग पर आना-जाना फिलहाल सम्भव नहीं है. इसके कारण इस साल का तो पूरा पर्वतारोहण सीजन बर्बाद ही हो गया है क्योंकि ट्रैकिंग एजेंसीज एसोसिएशन आॅफ नेपाल (टीएएएन) और नेपाल पर्यटन दोनों ने ही इस वर्ष की सारी पर्वतारोहण गतिविधियां स्थगित कर दी हैं. अगले वर्ष क्या होगा यह फिलहाल कह पाना सम्भव नहीं है. लेकिन नेपाल के पर्वतारोहण व्यवसाय को इस बात की आशंका है कि इस त्रासदी के मौके का लाभ उठाते हुए अगर चीन ने अपनी आरोहण नीतियों और विदेशी अभियानों को अनुमति देने की नीतियों में बदलाव कर दिए तो यह भी हो सकता है कि भविष्य में विदेशी पर्वतारोही उसी रास्ते को तरजीह देने लगें. वह मार्ग पहले से ही अधिक सस्ता और सुविधा पूर्ण है. अगर ऐसा हुआ तो यह नेपाल के पर्वतारोहण उद्योग के लिए घातक सिद्ध होगा.
फिलहाल तो सीटीएमए ने तिब्बत की ओर से भी सभी पर्वतारोहण अभियानों को रद्द कर दिया है और सभी अभियान दल वापस लौटने लगे हैं. लेकिन इसकी वजह अभियान दलों में शामिल शेरपा और अन्य भारवाही हैं. क्योंकि ये नेपाल के सभी भूकंप प्रभावित इलाकों के हैं और इन सभी को अपने घर और परिवार को चिन्ता परेशान कर रही है.
त्रासदी के मौके का लाभ उठाते हुए अगर चीन ने अपनी आरोहण नीतियों और विदेशी अभियानों को अनुमति देने की नीतियों में बदलाव कर दिए तो यह भी हो सकता है कि भविष्य में विदेशी पर्वतारोही चीन वाले रास्ते को तरजीह देने लगें.
नार्थ बेस कैंप में भूकंप का असर बताते हुए ‘एल्पनग्लो एक्सपिडिशन’ की मोनिका पिरीस ने अपनी डायरी में लिखा, ‘25 अप्रैल को नार्थ बेस कैंप में हम अगले दिन के आरोहण की तैयारी कर रहे थे. हमारे शेरपा सरदार ने बताया कि आज 8300 मीटर तक रोप फिक्स कर ली जाएगी. तभी अचानक हमें धरती घूमती महसूस हुई, घबराहट सी होने लगी. इसी दौरान सामने की पहाड़ी से कुछ पत्थर गिरते दिखाई दिए. 2-3 मिनट तक ऐसा हुआ. यह एक जबर्दस्त भूकंप था. हमारे शेरपा साथी भी चिंतित हो गए. हम अपने अगले कदम की सोच ही रहे थे कि हमें अपने संचार तंत्र से खबर मिली कि नेपाल में बड़ा भूकंप आया है. हमारे शेरपाओं को अपने घर और परिजनों की चिन्ता हो रही थी क्योंकि 2011 में भी उनके गांवों में भूकंप ने नुकसान पहुंचाया था. इस परिस्थिति में अभियान जारी रख पाना सम्भव नहीं था. हम भारी मन से विदा ले रहे हैं.’
उस समय मोनिका ने जो सोचा था स्थितियां उससे कहीं खराब हैं. पूरी खूम्भू वैली में तबाही है. नामचे बाजार में कई घर रहने लायक नहीं रह गए. थाने और खुमजुंग में बड़ी तबाही आई है. ये एवरेस्ट मार्ग के मुख्य गांव हैं. इलाके का पूरा सड़क संपर्क खत्म हो गया है. ताजा संकट का समाधान कुछ हो भी गया तो भी असली समस्या आर्थिक है. इस पूरे इलाके की करीब 50 हजार से भी ज्यादा ग्रामीण शेरपा आबादी पूरी तरह पर्वतारोहण पर आश्रित है. पिछले वर्ष भी हादसे के बाद सीजन ठप्प हो गया था और इस वर्ष तो भयावह भूकंप ने सब खत्म ही कर दिया है. ऐसे में हर कोई भविष्य के लिए आशंकित है.
नेपाल की अर्थव्यवस्था में एवरेस्ट का अहम योगदान है. पर्वतारोहण से उसे अच्छी-खासी विदेशी मुद्रा मिलती है. नेपाल को हर एवरेस्ट अभियान दल से परमिट शुल्क के एवज में अभियान दल की सदस्य संख्या के मुताबिक 25 से 70 हजार डालर तक मिलते हैं. एक व्यक्ति के लिए 25 हजार और सात सदस्यों के दल के लिए 70 हजार डालर देने पड़ते हैं. सागरमाथा नेशनल पार्क के लिए 100 डालर प्रति सदस्य तथा खुम्भू आइसफाल फीस के रूप में 2375 डालर प्रति टीम देने होते हैं. सैटेलाइट फोन के लिए प्रति फोन 2300 डालर तथा गार्बेज एण्ड ह्यूमन वेस्ट डिस्पोजल के लिए 4000 डालर लिए जाते हैं. इसके अलावा बीमा तथा अन्य मदों में भी प्रति टीम 10 से 30 हजार डालर तक देने पड़ते हैं. किसी न किसी रूप में नेपाल सरकार को मिलने वाली इस रकम के अलावा याक और हैलीकाप्टर भाड़े, शेरपा व अन्य भारवाहियों के मेहनताने, गाइड, सहायक गाइड, कुक, लाॅयजन अफसर आदि की रकम को मिला कर एक औसतन पर्वतारोही दल नेपाल की आय में तीन लाख डालर तक का इजाफा करता है. जाहिर है पर्वतारोहण बन्द हो जाने से इस वर्ष यह सारी रकम बट्टे खाते में जा चुकी है. इस तरह भूकंप शेरपाओं के इलाके के लिए दोहरा संकट खड़ा कर रहा है.
नेपाल की अर्थव्यवस्था में एवरेस्ट का अहम योगदान है. नेपाल को हर एवरेस्ट अभियान दल से परमिट शुल्क के एवज में अभियान दल की सदस्य संख्या के मुताबिक 25 से 70 हजार डालर तक मिलते हैं.
2003 से फोत्र्से गांव में खुम्भू क्लाइम्बिंग सेण्टर (केसीसी) से जुडे़ यारिक दोर्जी कहते हैं, ‘हम हर वर्ष 80 युवाओं को तैयार करके पर्वतारोहण के लिए भेजते हैं. इस वर्ष के प्रशिक्षुओं को तो खाने के लाले पड़ने वाले हैं.’ केसीसी 2003 में स्थापित किया गया था. पर्वतारोही और एंकर एलेक्स लाॅव की स्मृति में एलेक्स लाॅव चेरिटेबल फाउण्डेशन ने इसकी स्थापना की थी. 1999 में पाकिस्तान में हुए एक एक पर्वतारोहण हादसे में लाॅव की मृत्यु हो गई थी. यह सेंटर अब बेहतरीन शेरपा पर्वतारोही तैयार करने का एक नामी संस्थान बन चुका है. शेरपा इलाके में ऐसे कई सेंटर हैं. ज्यादातर विदेशी मदद से चलते हैं. इस इलाके का भविष्य अब इन्ही मददगारों के सहारे पर टिका है. अभी से ही पर्याप्त मदद और आर्थिक सहायता के आश्वासन मिलने लगे हैं. कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि के अनेक पर्वतारोही संगठनों ने मदद के लिए कदम बढ़ाए हैं. ये सभी नगद पैसा न बांटकर भोजन, भवन, स्कूल, अस्पताल, शिक्षा आदि के लिए मदद की पेशकश कर रहे हैं.
फ्रेंड्स आॅफ सागरमाथा नेशनल पार्क ने अपने सदस्यों से नेपाल की मदद का आह्वान करते हुए कहा है, ‘अभी तो यही बेहतर हो सकता है कि हम सब एक ठोस येाजना बनाएं कि तत्काल हम कैसे मदद कर सकते हैं. दीर्घ कालीन योजना के लिए यही हो सकता है कि हम लोग ज्यादा से ज्यादा संख्या में नेपाल जाएं, ट्रैकिंग करें, क्लाइम्बिंग करें और नेपाल के ध्वस्त गांवों, कस्बों और शहरों को पुर्नजीवित करने के लिए नेपाल में पैसा लाएं’.
बेहद विपरीत परिस्थितियों में रहने वाले शेरपाओं को नेपाल के डेढ़ दर्जन से अधिक जातीय समूहों में सबसे समृद्ध माना जाता है और यह सब एवरेस्ट का ही प्रताप है जिसे शेरपा मानते और पूजते हैं. शेरपाओं को इसका संतोष है कि इस बड़े हादसे के बाद भी एवरेस्ट की ऊंचाई कम नहीं हुई. यानी दुनिया का मुकुट होने की उसकी पदवी बरकरार है. एवरेस्ट से ही अपने अस्तित्व को जुड़ा मानने वाले शेरपा अब भी एवरेस्ट की ओर ही उम्मीद से देख रहे हैं कि वह उन्हें बुलाए और एक बार फिर दूध कोसी की घाटियां और खुम्भू के गांव पर्वतारोहियों-ट्रैकरों और प्रकृति प्रेमियों की पदचापों से गूंजें. हालांकि नेपाल पर्यटन विभाग के तुलसी गौतम ने यह उम्मीद जताई है कि एवरेस्ट पर जल्द ही पर्वतारोहण शुरू हो सकेगा. लेकिन इस सीजन में तो यह हो पाना किसी भी दशा में सम्भव नहीं दिखता. फिलहाल तो शेरपा गांवों में एवरेस्ट के कृपालु बने रहने की ही कामना की जा रही है.