सरदार वल्लभ भाई पटेल के वंशजों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत बन रही सरदार पटेल की विशाल मूर्ति उनसे मेल नहीं खाती.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट कहे जाने वाले स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को लेकर एक विवाद खड़ा होता दिख रहा है. इस परियोजना के तहत गुजरात में देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति बननी है. यह दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति होगी और इसकी ऊंचाई अमेरिका स्थित स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से भी दोगुनी कही जा रही है.
लेकिन पटेल के वंशज और उनके कस्बे के लोग इस मूर्ति से खुश नहीं है. खबरों के मुताबिक उनका कहना है कि इसमें सरदार पटेल के व्यक्तित्व और तेज की झलक नहीं है. उनकी नाराजगी की वजह यह भी है कि उन्होंने मूर्ति के पहले प्रतिरूप को देखकर जो सुझाव दिए थे उन पर दूसरा प्रतिरूप बनाते हुए कोई ध्यान नहीं दिया गया. मूर्ति बनाने का काम मशहूर मूर्तिकार राम वी सुतार के जिम्मे है.
उनका तर्क है कि स्टैचू ऑफ यूनिटी में छोटी से छोटी बात का ध्यान रखा जाना चाहिए, यह सुझाव भी कि कुछ बड़े कलाकारों की समिति बनाई जाए जो समय-समय पर काम की निगरानी करती रहे.
गौरतलब है कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का 18 फीट ऊंचा प्रतिरूप बीते साल दिसंबर में आणंद जिले के करमसाड़ में प्रदर्शित किया गया था. यहां सरदार वल्लभ भाई पटेल का पैतृक निवास है. बताया जाता है कि मूर्ति को देखने के बाद पटेल के वंशजों ने कहा था कि इसमें कुछ बदलाव होने चाहिए. उन समेत करमसाड़ कस्बे के अन्य लोगों ने सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट (एसवीपीआरईटी) को कुछ सुझाव भी दिए थे. यह ट्रस्ट इसी परियोजना के लिए बना है. लेकिन कुछ दिन पहले जब राज्य की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने बारडोली के बाबन गांव में सरदार पटेल की मूर्ति के 30 फीट ऊंचे प्रतिरूप का अनावरण किया तो इसे देख कर करमसाड़ कस्बे के लोग नाराज हो गए. उनका आरोप था कि उनके सुझावों पर ट्रस्ट ने कोई ध्यान नहीं दिया.
खबरों के मुताबिक सरदार पटेल के भतीजे मनुभाई के बेटे भूपेंद्रभाई पटेल का कहना है कि उन्होंने करमसाड मेमोरियल में मूर्ति का प्रतिरूप देखा तो पाया कि उसमें सरदार पटेल के तेज और व्यक्तित्व की झलक नहीं है. सरदार पटेल के घर और उनके स्कूल को नेशनल हेरिटेज स्टेटस दिलाने के लिए आंदोलन कर रहे संगठन टीम करमसाड के रमेश पटेल का कहना है कि मूर्ति का चेहरा सरदार पटेल के चेहरे जैसा नहीं है. पटेल की दोनों आंखों में फर्क था, लेकिन मूर्ति में दोनों आंखें एक जैसी दिखाई गई हैं. इसी तरह के झोल नाक, हाथ, उंगलियों, गर्दन और कंधे की बनावट में भी हैं. उनका तर्क है कि जब इतना पैसा खर्च हो रहा है तो स्टैचू ऑफ यूनिटी में छोटी से छोटी बात का ध्यान रखा जाना चाहिए. उनका सुझाव है कि कुछ बड़े कलाकारों की समिति बनाई जाए जो समय-समय पर इस परियोजना की निगरानी करती रहे.
कहा जा रहा है कि मूर्ति का चेहरा सरदार पटेल के चेहरे जैसा नहीं है. इस तरह के झोल नाक, हाथ और कई दूसरे अंगों की बनावट में भी हैं.
उधर, खबरों के मुताबिक एसवीपीआरईटी के एक अधिकारी का कहना है कि अब भी परियोजना में बदलाव किया जा सकता है. उनका कहना है कि काम स्थानीय लोगों और जाने-माने इतिहासकारों से सुझाव के बाद ही शुरू हुआ है. इस परियोजना को पूरा करने का ठेका लारसन एंड टूब्रो (एलएंडटी) को मिला है. परियोजना की वेबसाइट बताती है कि इसका काम अप्रैल 2018 तक पूरा हो जाएगा.
करीब दो साल पहले नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की 138वीं जयंती के मौके पर गुजरात के साधु बेट में उनकी 182 मीटर ऊंची मूर्ति निर्माण का शिलान्यास किया था. यह विशालकाय प्रतिमा साधु बेट में नर्मदा किनारे बन रही है. इसके लिए देश के हर कोने से किसानों के खेत में इस्तेमाल हुए लोहे के टुकड़े और मिट्टी इकट्ठा करने का अभियान भी चलाया गया था.
वैसे इस परियोजना पर यह पहला विवाद नहीं है. इसके आलोचक इस विशाल कवायद को फिजूलखर्च मानते रहे हैं. नरेंद्र मोदी के विरोधियों का यह भी कहना है कि यह भाजपा की अतीत के नायकों को कब्जाने की कोशिश का एक हिस्सा है. उधर, गुजरात सरकार का कहना है कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भारत के लिए गर्व का प्रतीक होगी और इससे पर्यटन भी बढ़ेगा.