आज इंटरनॉट दिवस है. 25 साल पहले आज ही टिम बर्नर्स ली ने वर्ल्डवाइडवेब को आम लोगों के लिए खोला था. ब्रिटिश वैज्ञानिक टिम ने सूचना के इस क्रांतिकारी तरीके की खोज 1989 में स्विटजरलैंड स्थित मशहूर लैब सीईआरएन में रहते हुए की थी. शुरुआत में इसका मकसद यह था कि दुनिया भर में रह रहे वैज्ञानिक एक-दूसरे से सूचनाएं और अपना काम साझा कर सकें. लेकिन 23 अगस्त 1991 को इसे सबके लिए सुलभ कर दिया गया.

इसके साथ ही इंटरनॉट नाम का शब्द वजूद में आया. यह इंटरनेट और एस्ट्रोनॉट का मेल था. इंटरनॉट उन लोगों को कहा जाता था जो तकनीकी रूप से इंटरनेट को डिजाइन और इस्तेमाल करने में सक्षम थे. असल में इंटरनेट के सबके लिए खुलने के साथ इंटरनेट इंजीनियरिंग टास्क फोर्स और इंटरनेट सोसायटी जैसे संगठन भी वजूद में आने लगे थे. इनके सदस्यों को ही तब इंटरनॉट्स कहा जाता था.

शुरुआत में इसका मकसद यह था कि दुनिया भर में रह रहे वैज्ञानिक एक-दूसरे से सूचनाएं और अपना काम साझा कर सकें. लेकिन 23 अगस्त 1991 को इसे सबके लिए सुलभ कर दिया गया

तब शायद ही टिम ने सोचा हो कि यह छोटी सी शुरुआत कुछ ही दशकों में विशाल वटवृक्ष बन जाएगी. आज दुनिया में करीब तीन अरब लोग इस विराट नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं. दो सितंबर 1969 को जब कंप्यूटर साइंटिस्ट लियोनार्ड क्लाइनरॉक ने अपने साथि‍यों के साथ कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी में दो कंप्‍यूटरों के बीच पहली बार डेटा ट्रांसफर किया था तो उसमें 15 मीटर लंबा केबल इस्तेमाल हुआ था. आज इंटरनेट के इस्तेमाल को ऑप्टिकल फाइबर नाम के जो केबल संभव बना रहे हैं उनकी लंबाई लाखों किलोमीटर बताई जाती है. और यह लगातार बढ़ती ही जा रही है.

यह विस्तार भी जरूरी है. इंटरनेट के ढांचे पर पड़ रहा वजन दिनों दिन असाधारण रफ्तार से बढ़ रहा है. दस साल पहले के मुकाबले आज तस्वीरों, वीडियो और तमाम दूसरे दस्तावेजों के रूप में कई गुना ज्यादा डेटा इधर-उधर जा रहा है. 2005 में ब्रॉडबैंड की अधिकतम स्पीड दो एमबीपीएस थी. आज दुनिया के कई हिस्सों में 100 एमबीपीएस तक डाउनलोड स्पीड की सुविधा उपलब्ध है.

लेकिन इसी फैलाव में एक भयानक समस्या की जड़ भी छिपी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इंटरनेट का बोझ संभालने वाला ढांचा चरमराने लगा है. यही हाल रहा तो आठ साल में इंटरनेट ठप हो सकता है. दरअसल इंटरनेट टीवी, लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग और ऐसी दूसरी तमाम सेवाओं के चलते संचार ढांचे पर पड़ने वाला वजन बहुत बढ़ चुका है. इसे ढोने वाले ऑप्टिकल फाइबर अपनी क्षमता की हद तक पहुंचने लगे हैं. यानी जल्द ही वे और अधिक डेटा ले जाने में सक्षम नहीं होंगे. विशेषज्ञों के मुताबिक हमारे लैपटाप, कंप्यूटर और टैबलेट तक डाटा पहुंचानेवाले ऑप्टिकल फाइबरों के नेटवर्क की क्षमता अगले लगभग आठ वर्षो में पूरी तरह चुक जाएगी. यानी हो सकता है कि 2023 तक इंटरनेट का हाल वैसा ही हो जाए जैसा देहात में बिजली का होता है. यह कब चली जाए और कब आ जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं होता.

‘पिछले कई साल से जितनी जरूरत थी हम उससे कहीं ज्यादा बड़ा ढांचा तैयार करते रहे. लेकिन अब हम उस पड़ाव के नजदीक आ रहे हैं जहां यह रफ्तार कायम रखना नामुमकिन है.’

कुछ समय पहले दुनिया के अग्रणी इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और टेल्कॉम फर्मों की लंदन की रॉयल सोसायटी में एक बैठक हुई. इसका विषय यही था कि दुनिया पर मंडरा रहे इस खतरे को टालने के लिए क्या किया जा सकता है. इस बैठक के आयोजनकर्ताओं में से एक प्रोफेसर एंड्रयू एलिस कहते हैं, ‘हम प्रयोगशाला में उस बिंदु के करीब हैं जहां हम एक सिंगल ऑप्टिकल फाइबर के जरिये अब और ज्यादा डेटा नहीं भेज सकते.’

एंड्रयू के मुताबिक डेटा ढ़ोने वाली व्यवस्था की क्षमता जितनी बढ़ाई जा रही है, मांग भी उतनी ही जल्दी बढ़ जा रही है. आपूर्ति का मांग से आगे रहना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. वे कहते हैं, ‘पिछले कई साल से हम बहुत अच्छे से ऐसा करते रहे हैं. जितनी जरूरत थी हम उससे कहीं ज्यादा बड़ा ढांचा तैयार करते रहे. लेकिन अब हम उस पड़ाव के नजदीक आ रहे हैं जहां यह रफ्तार कायम रखना नामुमकिन है.’समाधानइंटरनेट की मौजूदा क्षमता बनाये रखने के लिए और भी ज्यादा ऑप्टिकल फाइबर बिछाए जा सकते हैं. लेकिन इसमें होने वाले मोटे निवेश का बोझ आखिर में उन लोगों की जेब पर ही पड़ेगा जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं. जानकारों के मुताबिक यह बोझ इतना हो सकता है कि इंटरनेट आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाए. यानी ऐसी स्थिति में आपको अच्छी स्पीड वाले इंटरनेट के लिए ज्यादा पैसा देना होगा या फिर कछुए जैसी रफ्तार वाले इंटरनेट से समझौता करना पड़ेगा.

हाल ही में ऐसे ऑप्टिकल फाइबर का भी परीक्षण किया गया है जो लगभग 255 टेराबाइट प्रति सेकंड के हिसाब से डेटा का आदान-प्रदान कर सकता है. यह अभी इस्तेमाल किये जाने वाले कमर्शियल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क की क्षमता से करीब 21 प्रतिशत अधिक है. इस नए ऑप्टिकल फाइबर की मदद से आने इंटरनेट पर पड़ रहे दबाव को कम किया जा सकेगा. लेकिन यह सब होगा धीरे-धीरे ही. जबकि मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है.

अभी ब्रिटेन की 16 फीसदी तक बिजली इंटरनेट को चलाने पर खर्च हो रही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक 2035 तक ब्रिटेन की लगभग सारी बिजली इंटरनेट खा रहा होगा .

एक और समस्या ऊर्जा की भी है. उदाहरण के लिए अभी ब्रिटेन की 16 फीसदी तक बिजली इंटरनेट को चलाने पर खर्च हो रही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक इंटरनेट का इस्तेमाल जिस रफ्तार से बढ़ रहा है उस हिसाब से यह मांग हर चार साल बाद दोगुनी हो जाएगी. इस तरह देखें तो 2035 तक ब्रिटेन की लगभग सारी बिजली इंटरनेट खा रहा होगा. यही बात काफी हद तक दुनिया के सारे देशों के लिए लागू होती है. इतनी ऊर्जा कहां से आएगी? विशेषज्ञों के मुताबिक इस विषय पर भी आपात चर्चा की जरूरत है.

जब क्लाइनरॉक और उनके साथियों ने एक कंप्यूटर में दूसरे कंप्यूटर में डेटा भेजने का पहला प्रयोग किया था तो इसके तहत पहला संदेश लॉगिन शब्द टाइप करके भेजा जाना था. अक्षर एल और ओ तो सफलतापूर्वक भेज दिए गए लेकिन इसके बाद सिस्टम क्रैश हो गया. इस तरह इंटरनेट के जरिये भेजे जाने वाला पहला संदेश बना एलओ. वैज्ञानिकों को आशंका है कि आपात उपाय नहीं किए गए तो इस नेटवर्क द्वारा भेजा जाने वाला आखिरी संदेश भी जल्द ही देखने को मिल सकता है.