जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम से बेहतर व्यवस्था बनाने की कोशिश होनी ही चाहिए थी. लेकिन क्या एनजेएसी वही बदलाव है जो जरूरी था?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने सरकार यानी उसके सबसे बड़े वकील अटॉर्नी जनरल (एजी) मुकुल रोहतगी से पूछा कि क्या ऐसा हो सकता है कि एनजेएसी (नेशनल ज्यूडीशियल अपॉइंटमेंट कमीशन, नई व्यवस्था जो सरकार ने जजों की नियुक्ति के लिए बनाई है) पर सुनवाई वह कर ले और सेकंड जजेज़ वाले फैसले पर (जिसके जरिये 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति उन्हीं के हाथ में दे दी था) पुनर्विचार को एक बड़ी बेंच के हवाले कर दिया जाए.
इस पर एजी का कहना था कि सर्वोच्च न्यायालय को इस आशय का एक स्पष्ट आदेश देना होगा कि वह सेकंड जजेज़ वाले मामले की बात तक नहीं करेगा.
यह अदालत में किन्ही दो पक्षों की नहीं बल्कि सरकार और न्यायपालिका के बीच की भिड़ंत है. ऐसा शायद पिछली बार नब्बे के दशक के शुरुआत में ही देखने को मिला होगा
अदालत के यह कहने पर कि वह अपने ऊपर ऐसा प्रतिबंध कैसे लगा सकती है, मुकुल रोहतगी का कहना था कि फिर तो उसे इस मामले को एक बड़ी बेंच के हवाले ही करना पड़ेगा. साथ ही रोहतगी ने अदालत से यहां तक पूछ डाला कि वह इस मामले को बड़ी पीठ को सौंपने से हिचकिचा क्यों रही है. इसके बाद...
यह किसी ऐसी फिल्म से भी आगे की बात है जिसमें अदालत के जबर्दस्त दृश्य होते हैं और जिसे देखने में कम से कम आज की युवा से थोड़ी कम युवा पीढ़ी को जबर्दस्त आनंद आता है. यह अदालत में किन्ही दो पक्षों की नहीं बल्कि सरकार और न्यायपालिका के बीच की भिड़ंत है. ऐसा शायद पिछली बार नब्बे के दशक के शुरुआत में ही देखने को मिला होगा. तब, जब 1993 में ‘सेकंड’ जजेज़’ वाले मामले में नौ सदस्यों वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जजों की नियुक्ति को सरकार के हाथ से लेकर जजों के ही हाथ में दे दिया था.
अब सरकार ने एनजेएसी कानून के सहारे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति की नई व्यवस्था बनाई है जिसे वह किसी भी कीमत पर लागू करना चाहती है. कानून के क्षेत्र के कई गणमान्य (और न्यायपालिका भी) इसे न्यायपालिका के काम में हस्तक्षेप की तरह देख रहे हैं. मामला अदालत में पहुंचने पर सरकार चाहती है एनजेएसी पर फैसला करते समय 1993 के ‘सेकंड’ जजेज़’ वाले फैसले पर भी नौ या उससे ज्यादा जजों की बेंच एक बार में ही विचार कर ले और टंटा खत्म हो. जबकि पांच जजों की जिस बेंच में अभी यह मामला है वह पहले खुद ही एनजेएसी की वैधता को निर्धारित करना चाहती थी और शायद इसके लिए 1993 वाले फैसले को भी इस्तेमाल कर सकती थी. इसी वजह से एजी कोर्ट से यह मांग कर रहे थे कि या तो वह उस फैसले की बात ही नहीं करे या इस पूरे मसले को बड़ी बेंच के हवाले कर दे. न्यायालय अब इस बात पर विचार कर रहा है कि इस मामले को बड़ी बेंच को सौंपे या नहीं.
कॉलेजियम वाली व्यवस्था का बदलना जरूरी है क्योंकि जजों द्वारा जजों को नियुक्त करने में हितों का टकराव साफ दिखता है जो कि पहले सरकार द्वारा ऐसा करने में भी था क्योंकि अदालतों में सबसे बड़े और सबसे ज्यादा मामले उसी के चलते हैं
सर्वोच्च न्यायालय का कोई जज कैसे नियुक्त होगा इसके बारे में संविधान के अनुच्छेद 124 में लिखा है. इस अनुच्छेद के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति (यानी कि केंद्र सरकार या कैबनेट), जितने उन्हें जरूरी लगें उतने, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों से सलाह के बाद करेंगे. हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए अनुच्छेद 217 है जिसमें कुछ-कुछ इसी तरह की व्यवस्था है.
सन 1993 से पहले तक जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका प्रधान थी. वह जिसे चाहती थी नियुक्त कर देती थी. तब की कुछ सरकारों ने संविधान के लिखे को कुछ इस तरह से लिया था कि जजों की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश या न्यायपालिका से विचार-विमर्श करना भले आवश्यक हो, लेकिन उसकी सलाह से सहमत होना जरूरी नहीं है.
1993 और 1998 में ‘सेकंड’ और ‘थर्ड जजेज़’ वाले मामलों में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों ने जजों की नियुक्ति की वर्तमान कॉलेजियम वाली व्यवस्था को जन्म दिया. इसके मुताबिक यह अनिवार्य हो गया कि सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश केवल वरिष्ठता के आधार पर ही बनाया जाएगा और बाकी न्यायाधीशों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक कॉलेजियम करेगा.
संविधान ने जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था जबकि कॉलेजियम की व्यवस्था में सरकार की कोई भूमिका थी ही नहीं
यह, तमाम जानकारों के मुताबिक पिछली से बेहतर व्यवस्था थी. लेकिन यह भी सच है कि यह संविधान में जजों की नियुक्ति से जुड़े प्रावधानों से ठीक से मेल नहीं खाती. संविधान ने जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था जबकि कॉलेजियम की व्यवस्था में सरकार की कोई भूमिका थी ही नहीं.
इस व्यवस्था को सही ठहराया जा सकता था यदि यह आदर्श न भी होती तो भी कम से कम पारदर्शी तो होती. लेकिन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने पिछले साल जजों की नियुक्ति से जुड़ी ऐसी कई बातें सार्वजनिक कीं जिनसे लगता है कि इस कॉलेजियम ने कुछ नियुक्तियां पूरी तरह से अतार्किक आधार पर की थीं. इसके अलावा जस्टिस दिनकरण का उदाहरण हमारे सामने है ही, जिनपर लगे तमाम आरोपों के बाद भी उनकी नियुक्ति की अनुशंसा सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने कर दी थी. और कॉलेजियम के एक सदस्य की आपत्तियों के बावजूद पिछले से पिछले मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर की बहन की नियुक्ति का मामला भी है. ये दोनों उदाहरण अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने भी सर्वोच्च न्यायालय में बहस के दौरान तब दिए थे जब अदालत ने उनसे कुछ ऐसे उदाहरण देने को कहा जब कॉलेजियम ने ठीक से काम नहीं किया हो.
इस सब से यह निकल कर आता है कि कॉलेजियम की व्यवस्था पिछली कार्यपालिका वाली व्यवस्था से भले ही बेहतर थी, लेकिन इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने की जरूरत भी थी ही.
एनजेएसी के मुताबिक यदि सरकार किसी सुप्रीम कोर्ट के जज से नाराज है तो कानून मंत्री सिर्फ एक और सदस्य के साथ मिलकर उसे देश का मुख्य न्यायाधीश बनने से रोक सकते हैं
अब विचार कर सकते हैं कि जो नरेंद्र मोदी सरकार ने एनजेएसी वाली नई व्यवस्था बनाई है वह कैसी है. यह व्यवस्था छह लोगों का एक आयोग है जिसमें देश के मुख्य न्यायाधीश के अलावा सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम जज, कानून मंत्री और दो गणमान्य नागरिक भी शामिल हैं. बाद के दो सदस्यों का चुनाव प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की एक समिति करेगी.
अब इसपर कई जानकारों को जो आपत्तियां हैं उनमें पहली यह है कि एनजेएसी में न्यायपालिका के सदस्यों की भूमिका प्रमुख नहीं है. इसका एक कारण तो यह है कि अगर कोई दो सदस्य किसी नियुक्ति को वीटो कर देते हैं तो वह नियुक्ति नहीं होगी. इसका मतलब यह हुआ कि यदि किसी की नियुक्ति पर तीन न्यायाधीशों को कोई एतराज नहीं है या वे इसे चाहते है तब भी जरूरी नहीं है कि वह नियुक्ति हो ही. ज्ञानियों को लगता है कि ऊपर से भले लगता हो कि इसमें कार्यपालिका के सदस्य की संख्या एक - कानून मंत्री - ही है लेकिन बाकी के जो दो सदस्य हैं उन्हें चुनने वाली समिति में राजनेताओं - प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष - का वर्चस्व है जोकि अपने मतलब के लिए एक होकर अपने हिसाब के लोगों को एनजेएसी का सदस्य बना सकते हैं. अब इन दोनों चीजों को एक साथ रखें तो समझ में आता है कि यदि सरकार किसी सुप्रीम कोर्ट के जज से नाराज है तो कानून मंत्री सिर्फ एक और सदस्य के साथ मिलकर उसे देश का मुख्य न्यायाधीश बनने से रोक सकते हैं. या हाईकोर्ट के किसी चीफ जस्टिस को सुप्रीम कोर्ट का जज बनने से रोक सकते हैं. अब ऐसे में जज सरकार या बड़े राजनेताओं के खिलाफ निर्णय देने से पहले दस दफा सोच सकते हैं.
इसके अलावा जो दूसरी चीज है वह यह कि एनजेएसी कानून में यह नहीं कहा गया है कि एनजेएसी की बैठकों का कोरम क्या होगा. यानी कि इसकी बैठक में कम से कम कितने और कौन से सदस्य मौजूद रहने चाहिए इस बारे मे कानून में कुछ नहीं कहता. इस संबंध में एनजेएसी खुद अपने जो नियम बनाएगा, उसमें व्यवस्था कर सकता है. हालांकि बेहतर यह होता कि इसके बारे में कानून में ही व्यवस्था दे दी जाती.
एनजेएसी एक्ट की जिस खामी की ओर किसी का ध्यान नहीं गया है वह यह है कि आयोग की बैठक में जब भी मुख्य न्यायाधीश के चयन की प्रक्रिया चल रही होगी तो इसमें न्यायपालिका के तीन में से एक सदस्य भाग ही नहीं ले सकता है.
एनजेएसी एक्ट के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर की जाएगी यदि वह इसके लायक होगा तो. लेकिन वह इसके लायक क्यों नहीं होगा इसके बारे में कानून में अस्पष्टता है. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिसों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करते समय भी एनजेएसी एक्ट में कहा गया है कि वरिष्ठता के अलावा उनकी योग्यता को कई और पैमाने पर भी कसना होगा लेकिन इनके बारे में स्पष्ट तौर पर कानून में नहीं लिखा गया है.
इसके बाद आती है एक और बेहद महत्वपूर्ण बात जिसपर शायद अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया है. एनजेएसी कानून की धारा 5(1) कहती है कि 'आयोग के जिस सदस्य के नाम पर विचार चल रहा होगा वह आयोग की बैठक में भाग नहीं लेगा.' इसका सीधा-सीधा मतलब यह होगा कि आयोग की बैठक में जब भी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के चयन की प्रक्रिया चल रही होगी तो इसमें न्यायपालिका के तीन में से एक सदस्य भाग ही नहीं ले रहा होगा. क्योंकि सबसे पहले तो मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ सदस्य के नाम पर ही विचार किया जाएगा जो कि आयोग का भी सदस्य होगा ही.
पिछली कॉलेजियम वाली व्यवस्था का बदलना इसलिए जरूरी है क्योंकि जजों द्वारा जजों को नियुक्त करने में हितों का टकराव साफ दिखता है जो कि 1993 से पहले सरकार द्वारा ऐसा करने में भी था क्योंकि अदालतों में सबसे बड़े और सबसे ज्यादा मामले उसी के चलते हैं या उसे चलाने वालों के. ऐसे में नियुक्ति की व्यवस्था में न्यायपालिका या कार्यपालिका में से किसी एक को मजबूत और कमजोर करने की बजाय (फिर भले ही यह संविधान में ही क्यों न दिया हो) यह ऐसी हो कि दोनों को बराबर मजबूती देकर नियुक्तियों में गड़बड़ियों को कमजोर करे. इस दिशा में एनजेएसी पहल तो करता है लेकिन मुकम्मल से थोड़ा कम. इसे थोड़ा और कम कहने का मन कर सकता है यदि हमें नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जस्टिस सदाशिवम को राज्यपाल बनाना याद आ जाता है.