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कांग्रेस की नई मुसीबत पप्पू यादव हैं
लोकसभा सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को निकाला तो पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए लालू प्रसाद यादव की आरजेडी ने है और वे मुसीबत आजकल कांग्रेस के लिए बने हुए हैं. सिर्फ इसलिए नहीं कि वे भाजपा के साथ मिलकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकते हैं बल्कि इसलिए भी कि उनकी पत्नी रंजीत रंजन सुपौल से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ही सांसद हैं. यहां एक परिवार से पति-पत्नी दोनों सांसद हैं और वहां पूरी कांग्रेस पार्टी के बिहार से इस लोकसभा में दो ही सांसद हैं. अब सुनी-सुनाई बात यह है कि कांग्रेस को यह समझ नहीं आ रहा कि वह जनता परिवार के साथ जुड़ाव के बारे में सोचती है तो पप्पू यादव की पत्नी का रुख इस पर क्या रहने वाला है. कांग्रेसी नेताओं की मुश्किल की एक बड़ी वजह यह भी है कि उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि बिहार चुनाव के लिए पार्टी की रणनीति बनाते समय वे श्रीमती रंजन की भूमिका इसमें क्या रखें. अगर वे उन्हें इससे अलग-थलग कर देते हैं तो उनके नाराज होने का खतरा है जो कि लोकसभा में केवल 44 सदस्यों वाली कांग्रेस उठाने की स्थिति में नहीं है. और अगर पार्टी रंजीत रंजन की बिहार चुनाव में कोई भूमिका तय कर देती है तो उस स्थिति में उसके सामने विश्वास का पहले से बड़ा संकट आ खड़ा होता है.
मोदी सरकार के एक साल का कमाल
पिछले दिनों अरुण शौरी ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में नरेंद्र मोदी सरकार की खासी आलोचना कर दी थी. उन्होंने मोदी सरकार को उसकी आर्थिक नीतियों के संबंध में दिशाहीन और समाज में चिंता जगाने वाला बताया था. थोड़ी चुप्पी के बाद सरकार इससे होने वाले नुकसान की भरपायी में लग गई. एक तरफ कुछ भाजपा नेताओं ने ऑफ द रिकॉर्ड इसे अंगूर खट्टे हैं कहा तो दूसरी तरफ वित्तमंत्री अरुण जेटली के घर पर चुने हुए पत्रकारों की एक बैठक आयोजित की गई. इसमें नरेंद्र मोदी खुद भी करीब एक घंटे तक उनसे बोलते-बतियाते रहे. शौरी के कहे से निपटने के इतने तरह के उपायों के पीछे सुनी-सुनाई यह है कि एक तो अरुण शौरी बड़े पत्रकार रहे हैं और उनके पत्रकारिता के क्षेत्र में खासे संबंध हैं, इसलिए सरकार को लग रहा था कि उनकी बात पर मीडिया कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहा है. ऊपर से प्रधानमंत्री की मीडिया से रखी गई दूरी भी सरकार के खिलाफ जा रही थी. इससे भी बड़ी बात थी कि अपना एक साल पूरा होने से ठीक पहले विपक्ष के किसान-विरोधी होने के आरोप झेल रही मोदी सरकार दूसरी दिशा से एक और हमले का खतरा मोल नहीं लेना चाहती थी. उसे पता था कि अगर इस तरह की खबरों का दौर एक बार चल पड़ा तो सरकार का एक साल पूरा होने पर यह बमबारी कितना बड़ा और कैसा स्वरूप ले लेगी, कोई नहीं जानता.
राहुल का पंजाब दौरा - दिल्ली से बनाम पंजाब से
पिछले महीने की अट्ठाईस तारीख को राहुल गांधी पंजाब के दौरे पर गए थे. ट्रेन से. मीडिया में खूब चर्चा हुई. लेकिन जहां अपनी छुट्टी से लौटकर आए राहुल ने इस दौरे पर जो उनसे अपेक्षित था वह बखूबी किया वहीं गुटबाजी के चलते पंजाब कांग्रेस इसका फायदा ठीक से नहीं उठा सकी. पंजाब में कांग्रेस के दो शीर्ष नेताओं - पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख प्रताप सिंह बाजवा - के बीच चल रही सियासी जंग के चलते न तो राहुल गांधी ठीक से किसानों से ही मिल सके और न ही कार्यकर्ताओं से. लोगों की देखी और हमारी सुनी-सुनाई यह है कि कांग्रेस की राज्य इकाई ने राहुल गांधी के लिए जो रात्रिभोज का आयोजन किया था उसमें दोनों गुट इस तरह से राहुल को अपने लोगों से मिलाने और दूसरे गुट की अनदेखी कराने का प्रयास कर रहे थे कि स्थिति बड़ी अजीब सी हो गई थी. इससे भी ज्यादा गड़बड़झाला तब हुआ जब राहुल की सुरक्षा करने वाली एसपीजी ने पंजाब कांग्रेस के बड़े नेताओं से उनके रहने के इंतजाम के बारे में पूछा. पता चला कि इंतजाम तो किया ही नहीं गया है. इसके बाद जैसे-तैसे उनके लिए हिमाचल भवन में एक कमरे का जुगा़ड़ किया गया. सुनी-सुनाई यह भी है कि इसके परिणाम थोड़ा आगे-पीछे पंजाब कांग्रेस में देखने को मिल सकते हैं.