बीते एक दशक के दौरान गुबरैले माजुली में खेती-किसानी के साथ-साथ आम जीवन के लिए संकट बने रहे लेकिन अब कृषि वैज्ञानिकों ने इन्हें नियंत्रित करने का ऐसा तरीका खोज लिया है जिससे लोगों को उनकी उपस्थिति भाने लगी है.
असम का माजुली पूरे भारतीय प्रायद्वीप का सबसे बड़ा नदी द्वीप है. 2001 के आंकड़ों के मुताबिक इसका क्षेत्रफल 400 वर्ग किलोमीटर है. विभिन्न जनजातियों की मिलीजुली आबादी वाले माजुली को छोटा असम कहा जाता है. ब्रह्मपुत्र नदी की दो धाराओं के बीच स्थित माजुली में 23 गांव हैं और विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों ने इस द्वीप को ऐसी जैव विविधता दी है कि ये गांव असम में पर्यटन का प्रमुख केंद्र हैं.लेकिन कभी-कभी वरदान अभिशाप बन भी जाता है. माजुली के साथ भी बीते एक दशक में कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ. जैव विविधता के लिए अनुकूल परिस्थितियों के चलते यह कई प्रजातियों के पशु-पक्षियों का घर तो बन गया लेकिन करीब 10 साल पहले यहां एक ऐसा जीव भी आ गया जिसने लोगों का जीना मुहाल कर दिया. यह कुछ और नहीं बल्कि गुबरैले की एक ऐसी प्रजाति है जो ऑस्ट्रेलिया, जापान, झारखंड के कुछ हिस्से और माजुली में ही पाई जाती है. ये गुबरैले अब तक माजुली के लिए ऐसी समस्या थे कि जिसका सटीक समाधान न तो सरकार के पास था न आम लोगों के. लेकिन अब असम कृषि विश्वविद्यालय ने एक ऐसा समाधान खोज लिया है जिससे ये गुबरैले न सिर्फ यहां खत्म हो सकते हैं, बल्कि लोगों के लिए उत्सव मनाने का मौका भी देते हैं.
अप्रैल-मई के महीनों में माजुली के इन गांवों में लोग शाम को छह से सात बजे के बीच कम ही बाहर निकलते हैं और घरों के खिड़की दरवाजे अच्छे से बंद करके रखते हैंइन गुबरीलों का वैज्ञानिक नाम लेपिडियोटा जीनस है और माजुली में ये सबसे पहले 2005 में देखे गए थे. यहां ज्यादातर लोगों की आजीविका खेती से जुड़ी है और वे अरबी, आलू, गन्ने के साथ मूंग और धान की खेती करते हैं. दस साल पहले उनकी फसलों का बड़ा हिस्सा अचानक सूखने लगा. पहले तो किसानों को लगा कि शायद उनके बीज में खराबी होगी लेकिन जब एक के बाद एक फसलें सूखीं तो पता चला कि फसलों की जड़ में एक कीड़ा लग गया है. अंगूठे के आकार का यह लार्वा किसानों के लिए बिल्कुल ही नया कीट था.
उस साल के बाद हर साल गर्मियों में यहां के लोगों को एक और दिक्कत होने लगी. शाम के समय गांवों की सड़कें गुबरैलों से भरने लगीं. इनकी वजह से दोपहिया वाहनों का सड़कों पर निकलना मुश्किल हो गया. लोग बताते हैं कि यह कीट कब अचानक आंखों से टकरा जाए या कान व नाक में घुस जाए कहा नहीं जा सकता. इनकी वजह से कई दुर्घटनाएं भी हुईं. नतीजतन आज भी अप्रैल-मई के महीनों में माजुली के ग्रामीण शाम को छह से सात बजे के बीच कम ही बाहर निकलते हैं और घरों के खिड़की दरवाजे अच्छे से बंद करके रखते हैं. धीरे-धीरे इन्हें पता चला कि फसलों को बर्बाद करने वाला लार्वा और ये गुबरैला एक ही जंतु है. कृषि अधिकारियों से गांव वालों को ये भी पता चला कि गर्मी दो महीने गुबरैलों का प्रजनन चक्र चलता है और बाकी साल के पूरे दस महीने ये जमीन के भीतर बिताते हैं.
‘2005 के पहले इस क्षेत्र में कहीं भी यह कीट नहीं देखा गया था. इसका जीवनचक्र आम कीटों की तुलना में काफी लंबा होता है इसलिए माजुली के किसान बुरी तरह प्रभावित हुए'
बीते सालों में किसानों ने यहां कीटनाशकों का प्रयोग करके देखा तो साथ ही बुवाई का तरीका भी बदला लेकिन वे इस कीट का असर नहीं रोक पाए. दरअसल लार्वा जमीन में इतनी गहराई पर होते हैं कि कीटनाशकों का असर उनपर नहीं हो पाता. उल्टा इससे किसानों की खेती की लागत भी बढ़ जाती है. 2012 में इस कीट से निपटने के लिए जापान के कुछ कृषि वैज्ञानिकों की मदद भी ली गई थी. उन्होंने गुबरैलों का प्रजनन चक्र रोकने के लिए कुछ वैज्ञानिक उपाय सुझाए लेकिन वे कभी अमल में नहीं लाए जा सके. नतीजा यह रहा कि बीता पूरा एक दशक माजुलीवासियों के लिए इस विचित्र समस्या से जूझते हुए बीता.
असम कृषि विश्वविद्यालय साल 2004 से इन गुबरैलों की रोकथाम के लिए रिसर्च कर रहा है. वैज्ञानिकों को अभी तक इनके नियंत्रण का कोई पुख्ता और आसान तरीका नहीं मिल पाया है. इसलिए इस साल उन्होंने गुबरैलों से निपटने के लिए ऐसा तरीका खोजा जो न सिर्फ इस कीट का सफाया कर रहा है बल्कि लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा और उत्सव मनाने का जरिया भी बन रहा है. गुबरैलों पर शोध कर रही टीम ने पाया कि ये प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट के बहुत अच्छे स्रोत हैं. शोध से यह भी पता चला कि इनमें कोई जहरीला पदार्थ नहीं पाया जाता. दुनिया के कई हिस्सों में ऐसे कीट आहार के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं. लेकिन विश्वविद्यालय की टीम के सामने यह चुनौती थी कि माजुली के लोगों के बीच आहार के रूप में इन्हें कैसे लोकप्रिय बनाया जाए.
‘हमने गांव वालों से कहा कि इससे पहले गुबरैले तुम्हारी फसल खाएं तुम उन्हें खा जाओ. हम चाहते थे कि गुबरैलों का अभिशाप गांव वालों के लिए वरदान बन जाए’वैज्ञानिकों की टीम ने खुद ही इसका एक बड़ा अच्छा तरीका खोजा. कृषि वैज्ञानिकों ने विश्वविद्यालय के होमसाइंस विभाग के साथ मिलकर गुबरैले के ऐसे व्यंजन तैयार किए जो न सिर्फ स्वाद में बल्कि पोषण में भी कई परंपरागत व्यंजनों को मात दे सकते थे. इन्हीं व्यंजनों में से एक है रोस्टेड बीटल (गुबरैला). यह टमाटर के साथ तैयार किया गया है. टीम ने इस तरह के और भी व्यंजन बनाए हैं.
इसके बाद माजुली में इन व्यंजनो को लोकप्रिय बनाने के लिए एक अभियान चलाया गया. इसके लिए एक गांव में सामुदायिक उत्सव आयोजित किया गया और यहां लोगों को गुबरैले से बने विभिन्न व्यंजन परोसे गए. ये व्यंजन लोगों को इतने भाए कि अब माजुली में लोगों के बीच ये पसंदीदा आहार बनते जा रहे हैं. भट्टाचार्य के सहायक हिमांग्शू मिश्रा एक अखबार से बात करते हुए बताते हैं कि इन व्यंजनों का स्वाद झींगा मछली जैसा है. वे जानकारी देते हैं कि पिछले महीने के पहले हफ्ते में एक लाख से ज्यादा गुबरैलों को पकड़कर ये व्यंजन तैयार किए गए थे. भट्टाचार्य कहते हैं, ‘हमने गांव वालों से कहा कि इससे पहले गुबरैले तुम्हारी फसल खाएं तुम उन्हें खा जाओ. हम चाहते थे कि गुबरैलों का अभिशाप गांव वालों के लिए वरदान बन जाए.’
माजुली में गुबरैलों के पैदा होने और बढ़ने के पीछे जलवायु परिवर्तन व बारिश के बदलते पैटर्न की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है. यहां के ग्रामीणों के बस में यह नहीं है कि वे इसे रोक पाएं. हां लेकिन इससे पैदा हो रहे संकटों को वे अपने लिए अवसरों में जरूर बदल सकते हैं. गुबरैले के व्यंजन बनाकर माजुलीवासी ठीक यही कर रहे हैं.
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