1500 करोड़ की कंपनी खड़ी करने के बाद उससे निकाले जा चुके और अब एक नई कंपनी के चलते सुर्खियों में आए 26 साल के राहुल यादव एक नजर में उभरते भारत का प्रतीक दिखते हैं तो दूसरी तरफ ऐसे शख्स भी जिसके बारे में कहा नहीं जा सकता कि वह कब क्या कर दे.
कोई उन्हें उभरते भारत का प्रतीक कह रहा है तो कोई कॉरपोरेट जगत का अरविंद केजरीवाल. वैसे सिर्फ 26 साल की उम्र तक अगर कोई आईआईटी की पढ़ाई अधूरी छोड़ चुका हो, 1500 करोड़ रु की एक कंपनी बना चुका हो, उससे निकाला जा चुका हो और इसके दो ही महीने बाद नामी निवेशकों की मदद से एक नई कंपनी खड़ी करता दिख रहा हो तो उसे इस तरह के खिताब मिलने स्वाभाविक भी हैं.
इन दिनों राहुल यादव फिर सुर्खियों में हैं. हाउसिंगडॉटकॉम के सीईओ रूप में उनकी विदाई के दो महीने बाद खबर है कि वे एक नई कंपनी के साथ फिर मैदान में उतरने वाले हैं. यह कंपनी डाटा विजुअलाइजेशन के क्षेत्र में काम करेगी जिससे कंपनियों को ग्राहक के व्यवहार का सटीक पूर्वानुमान लगाने में अहम मदद मिल सकेगी. बताया जा रहा है कि कई दिग्गज उन पर दांव लगाने को तैयार हैं. इनमें मोबाइल पेमेंट के क्षेत्र में सबसे बड़ा नाम पेटीएम, चर्चित ई कॉमर्स वेंडर फ्लिपकार्ट और जानी-मानी मोबाइल फोन निर्माता कंपनी माइक्रोमैक्स शामिल है. पेटीएम के मुखिया विजय शेखर शर्मा ने एक वेबसाइट से बातचीत में इसमें निवेश की पुष्टि की है. सूत्रों के हवाले से खबरें तो यह भी आ रही हैं कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुखिया मुकेश अंबानी ने भी राहुल यादव के इन नए उद्यम में दिलचस्पी दिखाई है.
अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा था कि हाउसिंगडॉटकॉम के बोर्ड के सदस्यों और निवेशकों में कोई भी बौद्धिक रूप से इतना सक्षम नहीं है कि उनके साथ कोई समझदारी भरी चर्चा की जा सके.
यादव को बीती जुलाई में हाउसिंगडॉटकॉम से निकाल दिया गया था. इस ऑनलाइन प्रॉपर्टी सर्च पोर्टल को यादव ने 2012 में अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर खड़ा किया था. लेकिन निवेशकों के साथ उनकी पटरी नहीं बैठी और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इसके बाद उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा था, 'मैं वापस आऊंगा और 100 गुना ज्यादा ताकत के साथ. 30 दिन बाकी हैं. क्या दुनिया तैयार है?' 30 दिन तो नहीं, लेकिन करीब दो महीने बाद वे हाजिर हैं.
दरअसल राहुल यादव की शख्सियत में दो धाराएं साथ-साथ चलती दिखती हैं. अखबारों और टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक पर चर्चा का विषय बना हुआ यह 26 साल का युवा लोगों के मन में अपने जैसा होने का अरमान जगाता है. तो दूसरी तरफ अपनी अप्रत्याशित प्रवृत्ति की वजह से इस युवा की छवि एक ऐसे शख्स की भी है जो अंजाम की चिंता किए बगैर कब क्या कर दे, कहा नहीं जा सकता.
जैसे बीती मई में राहुल यादव ने ऐलान किया कि वे हाउसिंगडॉटकॉम में अपनी 150-200 करोड़ रु की हिस्सेदारी कर्मचारियों में बांट देंगे. इससे पहले उनका कंपनी से इस्तीफा भी चर्चा में रहा था. 30 अप्रैल को खबरों में आए इस इस्तीफे में उन्होंने लिखा था कि हाउसिंगडॉटकॉम के बोर्ड के सदस्यों और निवेशकों में कोई भी बौद्धिक रूप से इतना सक्षम नहीं है कि उनके साथ कोई समझदारी भरी चर्चा की जा सके. राहुल के शब्द थे, 'मैं यह सिर्फ मानता ही नहीं बल्कि साबित भी कर सकता हूं. मैंने बहुत पहले हिसाब (औसत उम्र से नींद के औसत घंटों को निकालकर) लगा लिया था कि मेरी जिंदगी में सिर्फ तीन लाख घंटे हैं. उन तीन लाख घंटों को मैं आप लोगों के साथ बेकार नहीं करना चाहता!' राहुल ने अपने इस्तीफे में आगे लिखा था कि किसी मदद के लिए वे अगले सात दिन तक कंपनी के लिए उपलब्ध रहेंगे. हालांकि निवेशकों के साथ बैठक के बाद उन्होंने कुछ ही घंटों में अपना इस्तीफा वापस ले लिया.
इससे पहले मार्च में राहुल का टाइम्स समूह के साथ टकराव भी सुर्खियों में रहा था. दरअसल 12 मार्च को यादव की अपने सहयोगियों को भेजी गई एक ईमेल लीक हुई थी. इसमें द इकॉनॉमिक टाइम्स में छपी उस खबर पर नाराजगी जताई गई थी जिसमें हाउसिंगडॉटकॉम के कुछ निवेशकों के हवाले से कहा गया था कि वे राहुल के काम करने के तरीके से नाखुश हैं और उन्हें सीईओ के पद से हटाने की सोच रहे हैं. इस मेल में उन्होंने यह भी कहा था कि ईटी में यह खबर छपना हितों का टकराव है क्योंकि टाइम्स समूह की मैजिकब्रिक्सडॉटकॉम में हिस्सेदारी है जो हाउसिंगडॉटकॉम का सीधा प्रतिद्वंदी है. इसके बाद द टाइम्स ग्रुप ने यादव को कानूनी नोटिस भेजा और मानहानि के लिए 100 करोड़ रु की मांग की.
ऐसे नकारात्मक प्रचार से उन वेंचर फर्मों का चिंतित होना स्वाभाविक था जिनके निवेश ने हाउसिंग डॉट कॉम को बीते कुछ समय के दौरान सबसे चर्चित स्टार्टअप बना दिया है.
इससे कुछ दिन पहले ही चर्चित वेबसाइट कोराडॉटकॉम पर भी राहुल की एक मेल लीक हुई थी. इसमें यादव ने सिक्योइया कैपिटल नाम की एक वेंचर कैपिटल फर्म के सीईओ शैलेंद्र सिंह को चेतावनी दी थी. बताया जाता है कि यह हाउसिंगडॉटकॉम के एक स्टाफ के सिक्योइया में जाने के बाद हुआ. इस कथित मेल में राहुल का कहना था कि अगर शैलेंद्र नहीं सुधरे तो वे सिक्योइया कैपिटल में मौजूद सबसे अच्छी प्रतिभाओं को तोड़कर उस कंपनी को खाली कर देंगे. बताया यह भी जाता है कि उन्होंने कुछ पत्रकारों को भी मेल भेजकर चेतावनी दी कि वे उनकी कंपनी के बारे में नकारात्मक खबरें छापेंगे तो उनके लिए अच्छा नहीं होगा.
इस तरह के नकारात्मक प्रचार से उन वेंचर फर्मों का चिंतित होना स्वाभाविक था जिनके निवेश ने हाउसिंगडॉटकॉम को बीते कुछ समय के दौरान सबसे चर्चित स्टार्टअप बना दिया है. इनमें जापान का सॉफ्टबैंक भी शामिल है. यह न सिर्फ हाउसिंगडॉटकॉम बल्कि चीनी ई कॉमर्स ग्रुप अलीबाबा के बड़े निवेशकों में से भी एक है और भारत में इसने स्नैपडील और ओलाकैब्स जैसी कंपनियों में भी निवेश कर रखा है. शायद इसलिए भी अटकलें लग रही थीं कि निवेशक राहुल के नेतृत्व से खुश नहीं हैं और उन्हें हटाना चाहते हैं. ऐसा ही हुआ भी. एक जुलाई को उनकी विदाई की खबर आ गई.
2010 के एक चित्र में राहुल यादव
2010 के एक चित्र में राहुल यादव
राजस्थान के अलवर में पैदा हुए और वहीं से शुरुआती पढ़ाई करने वाले राहुल यादव एक अखबार के साथ बातचीत में बताते हैं कि नौवीं तक उनकी पढ़ाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. बताया जाता है कि 12 वीं की पढ़ाई में उनका प्रदर्शन चमत्कारिक रूप से सुधरा और इसके चलते उन्हें आईआईटी प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने वाले कोर्स की फीस में 75 फीसदी की छूट मिल गई. परीक्षा में वे सफल भी रहे और आईआईटी मुंबई आ गए. यहीं उनकी दिलचस्पी ऑनलाइन कारोबार में जगी. पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने एक्जामबाबाडॉटकॉम नाम की वेबसाइट शुरू की. यह पुराने प्रश्नपत्रों पर आधारित 'ऑनलाइन क्वेश्चन बैंक' था. लेकिन आईआईटी ने उनसे इसे बंद करने को कहा. इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक गूगल क्रोम के लिए एक एप्लीकेशन डेवलप किया.
पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने एक्जामबाबाडॉटकॉम नाम की वेबसाइट शुरू की. यह पुराने प्रश्नपत्रों पर आधारित 'ऑनलाइन क्वेश्चन बैंक' था. लेकिन आईआईटी ने उनसे इसे बंद करने को कहा.
तीन साल बाद ही राहुल ने आईआईटी की पढ़ाई को अधूरा छोड़कर अपने दोस्त अद्वितीय शर्मा के साथ हाउसिंगडॉटकोडॉटइन की स्थापना की. यह 2012 की बात है. इस काम में आईआईटी के 10 दूसरे छात्र भी सहसंस्थापकों के रूप में उनके साथ थे. बताया जाता है कि यह आइडिया उन्हें तब आया जब उन्होंने देखा कि मुंबई में घर ढूंढना कितना मुश्किल है और जो घर ऑनलाइन मिलते हैं उनके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है. उन्होंने यह भी पाया कि रियल एस्टेट ब्रोकरेज के काम में बहुत पैसा भी है. इसके बाद राहुल और अद्वितीय ने इस धंधे में हाथ आजमाने की सोची. अपने आईआईटी के साथियों के रूप में उनके पास संभावित ग्राहक मौजूद थे ही. जल्द ही उनका काम चल निकला और वे हर महीने एक से दो लाख रुपया कमाने लगे.
अगला कदम था अपना काम देश भर में फैलाना. 2013 में हाउसिंगडॉटकोडॉटइन का नाम हाउसिंगडॉटकॉम हो गया. इसमें दूसरी वेबसाइटों की तुलना में इंटरएक्टिव मैप, चाइल्ड फ्रेंडली इंडेक्स, पीजी, ब्रोकर प्रोफाइल जैसी कहीं ज्यादा जानकारियां थीं. इसीलिए वे सिर्फ दो साल में ही अपने मैजिकब्रिक्सडॉटकॉम जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कहीं आगे पहुंच गए. आज हाउसिंगडॉटकॉम के पास 750 से ज्यादा कर्मचारी हैं और इसमें फंडिंग के पांच चरण हो चुके हैं. इसमें बीते नवंबर में हुआ करीब 600 करोड़ रु का निवेश भी शामिल है जिसके बाद हाउसिंगडॉटकॉम की कीमत 1500 करोड़ रु पहुंच गई थी. कंपनी में 30 फीसदी हिस्सा सॉफ्टबैंक का बताया जाता है.
हाउसिंगडॉटकॉम के कर्मचारियो के मुताबिक राहुल यादव खुद आगे बढ़कर काम करने और जमकर काम करने वालों में से हैं. इसीलिए उनके हाउसिंग के सीईओ पद से इस्तीफा देते ही कंपनी के भविष्य के बारे में तरह-तरह की अटकलें शुरू हो गईं. इसके बाद बताते हैं कि निवेशकों ने उनके साथ एक बैठक की और फिर उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया. लेकिन अपने स्वभाव से भला वे कैसे चूकते. जल्द ही उनका ऐलान आया कि वे अपनी 150 से 200 करोड़ के बीच की हिस्सेदारी कर्मचारियों को देने वाले हैं.
'मुझे समझ में नहीं आता कि वे ऐसे वादे क्यों कर रहे हैं.' एक दूसरे निवेशक का कहना था, 'अगर पैसे की बात नहीं है तो वे तनख्वाह न लें, लेकिन वे उद्यमी हैं तो हिस्सेदारी तो होनी ही चाहिए. '
निवेशकों का चिढ़ना स्वाभाविक ही था. उनमें से एक ने एक अखबार से बात करते हुए कहा भी, 'मुझे समझ में नहीं आता कि वे ऐसे वादे क्यों कर रहे हैं.' एक दूसरे निवेशक का कहना था, 'अगर पैसे की बात नहीं है तो वे तनख्वाह न लें, लेकिन वे उद्यमी हैं तो हिस्सेदारी तो होनी ही चाहिए.' दरअसल निवेशकों को लगता है कि केवल तनख्वाह के लिए तो राहुल जैसा व्यक्ति किसी कंपनी में काम करने से रहा.
जानकार मानते हैं कि अपनी हिस्सेदारी कर्मचारियों को देने के ऐलान के पीछे राहुल की कोशिश संकट को अवसर में बदलने की थी. यानी जब उनको सीईओ पद से हटाए जाने की खबरें चल रही थीं तो वे कंपनी के कर्मचारियों को पूरी तरह से अपने पाले में करना चाहते थे. स्टाफ ऐसे मुखिया के पीछे क्यों खड़ा नहीं होगा जो अपनी दसियों करोड़ की हिस्सेदारी उन्हें दे दे? हालांकि इस्तीफा देकर भी उन्होंने कुछ ऐसा ही दांव खेलने की कोशिश की थी जो उन्हें उल्टा पड़ गया था. सोशल मीडिया में उनकी खूब हंसी उड़ी. लेकिन अपने दूसरे ऐलान के बाद उन्हें खूब तारीफें भी मिलीं.
हाउसिंगडॉटकॉम का स्वामित्व रखने वाली लोकॉन सोल्यूशंस के बारे में मार्च 2014 के आंकड़े बताते हैं कि उस साल कंपनी को करीब 49 करोड़ रु का घाटा हुआ. कंपनी का राजस्व 1.9 करोड़ रु था जो बड़ी हद तक सब्सक्रिप्शन या फिर ब्रोकरों और डेवलपरों द्वारा वेबसाइट को चुकाए जाने वाली फीस से आया था. इस घाटे की दो सबसे बड़ी वजहें कर्मचारियों की तनख्वाह और विज्ञापन का खर्च थीं. इसमें कंपनी के 20 और 14 करोड़ रु खर्च हुए थे. लेकिन निवेशक घाटे के लिए निवेश नहीं करते. इसलिए इन सब घटनाओं के बाद जब एक अखबार ने राहुल यादव का यह बयान छापा कि अब वे अगले कुछ समय तक गंभीरता से सिर्फ कंपनी के काम पर ध्यान देने वाले हैं तो निवेशक एक बार फिर आश्वस्त हो गए.
जब उनको सीईओ पद से हटाए जाने की खबरें चल रही थीं तो वे कंपनी के कर्मचारियों को पूरी तरह से अपने पाले में करने की कवायद कर रहे थे.
हालांकि यह स्थिति ज्यादा दिन चली नहीं. जल्द ही राहुल उन्हीं पुराने कारणों की वजह से फिर से चर्चा में आ गए. उन्होंने जोमैटो और ओलाकैब्स जैसे स्टार्टअप्स के सीईओ को चुनौती दी कि वे भी अपने कर्मचारियों को अपनी आधी हिस्सेदारी देकर दिखाएं. राहुल ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा,'अब मैं जोमैटो के दीपेंदर गोयल और ओला कैब्स के भाविश अग्रवाल को चुनौती देता हूं कि इस नेक काम को जारी रखने के लिए वे अपने आधे शेयर अपने कर्मचारियों के नाम करें. मैं उम्मीद करता हूं कि वे दोनों इस पहल को आगे बढ़ाएंगे.' उन्हें दोनों से तंज वाला जवाब मिला. भाविश ने ओबामा की एक तस्वीर पोस्ट की जिस पर लिखा था, 'गिव दैट मैन अ कुकी.' गोयल का जवाब आया, 'अरविंद केजरीवाल को यह देखकर बहुत खुशी हुई होगी कि उन्हें टेक स्टार्टअप्स की दुनिया में अपना एक साथी मिल गया है.' इसके करीब एक महीने बाद राहुल यादव की हाउसिंगडॉटकॉम से विदाई हो गई.
अब वे एक नई पारी खेलने को तैयार हैं. इस नए प्रोजेक्ट में निवेश को लेकर पेटीएम के सीईओ विजय शेखर शर्मा कहते हैं, 'राहुल के पास प्रोडक्ट की असाधारण समझ है.' शर्मा इस युवा को फिलहाल सबसे बड़े 'प्रोडक्ट बिल्डरों' में एक बताते हैं. लेकिन राहुल यादव का पिछला रिकॉर्ड देखा जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि बनाकर बिगाड़ने वाली अपनी इस आदत से उन्हें और उन पर दांव लगाने वालों को सावधान रहने की जरूरत है.
(17 मई 2015 को प्रकाशित यह लेख 11 सितंबर 2015 को संपादित किया गया है)