जेम्स सदरलैंड (ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी), डेरेन लेहमैन (ऑस्ट्रेलियाई कोच), डेविड सैकर (ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजी के प्रशिक्षक), डेविड वॉर्नर, मैथ्यू वैड और नाथन लियॉन (भारत दौरे पर आए ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर) और पूर्व क्रिकेटर मिशेल जॉनसन.

ये सभी वे नाम हैं, जो किसी न किसी हैसियत से ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. बेंगलुरू में दूसरे टेस्ट के बाद भारत ने जब ऑस्ट्रेलिया के साथ मौजूदा श्रृंखला एक-एक से बराबर की, तभी से इन सबके बयान आ रहे हैं. कभी भारतीय कप्तान विराट कोहली के संबंध में. कभी डीआरएस प्रकरण (दूसरे टेस्ट में अंपायर द्वारा आउट करार दिए जाने के बाद फैसले की समीक्षा के लिए ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव स्मिथ ने नियम विरुद्ध ड्रेसिंग रूम से मदद लेने की कोशिश की थी) पर. ये सात लोग हैं. अब तक दूसरे टेस्ट को खत्म हुए इतने ही दिन गुजरे हैं. हर दिन किसी न किसी की टिप्पणी आई है.

डीआरएस विवाद के बाद विराट कोहली ने पत्रकार वार्ता के दौरान ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों को ‘बेईमान’ कहा था. इसी के बाद ऑस्ट्रेलिया की तरफ से प्रतिक्रियाएं आईं. हालांकि दिन गुजरने के साथ शब्दों में बदलाव होता रहा. पहले कोहली के बयान की आलोचना की गई. फिर उनके मकसद पर सवाल उठाए गए. श्रृंखला में अब तक के कोहली के प्रदर्शन पर सवाल खड़ा किया गया. कुल मिलाकर ऐसे तमाम तरीकों से दबाव बनाने की लगातार कोशिश की गई. और यही तो ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की जानी-पहचानी नीति भी है, जिसे कभी स्टीव वॉ ने ‘ध्यान भटकाने की नीति’ कहा था. तिस पर ऑस्ट्रेलियाई मीडिया की अपनी भूमिका, जिसने कोहली को इस मामले में खलनायक की तरह पेशकर आग में घी डालने का काम किया. यहां तक कि कुछ मीडिया हाउस ने भारतीय कोच अनिल कुंबले तक को नहीं छोड़ा.

कोहली ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के दिमाग में बैठ चुके हैं

कोहली पर ही इस तरह विरोधियों का पूरा ध्यान कोई नई बात नहीं है. बीते नवंबर की ही बात है, जब इंग्लैंड की टीम पांच टेस्ट मैचों की श्रृंखला खेलने के लिए भारत दौरे पर आई थी. तब भारतीय कप्तान और पिचों को लेकर उसका व्यवहार भी ऐसा ही था. हालांकि ब्रिटिश खिलाड़ियों और मीडिया, दोनों ने काफी हद तक इस मुद्दे पर बात करते हुए शालीनता कायम रखी. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई पक्ष ने इस मानसिक लड़ाई को आश्चर्यजनक और थकाऊ हद तक बढ़ा दिया है. यह शायद इसलिए क्योंकि ब्रिटिश खिलाड़ियों के विपरीत ऑस्ट्रेलियाई कोहली से अच्छी तरह वाकिफ हैं. इसके लिए 2011 और 2014 में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर कोहली का शानदार प्रदर्शन काफी हद तक जिम्मेदार कहा जा सकता है. इसीलिए ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने भारत आते ही सीधे अपनी बंदूकें कोहली पर ही तान दीं. लिहाजा, यह कहना गलत नहीं होगा कि कोहली ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों के दिमाग में बैठ चुके हैं.

हालांकि यह भी तय है कि कोहली भी मामले को इतनी आसानी से जाने नहीं देंगे. ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के साथ उनकी अदावत भी गजब की है. वैसे तो वे अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाली हर टीम के खिलाफ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहते हैं और ज्यादातर सफल भी होते हैं. लेकिन जब बात ऑस्ट्रेलिया की आती है, तो वे कहीं ज्यादा आक्रामक नजर आते हैं. इस प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ जब भी उन्हें चोट पहुंचती है, वे बेहद तीखी प्रतिक्रिया देते हैं. चाहे वह रन बनाने की बात हो या फिर जुबानी तौर पर जवाब देने की.

बताया जाता है कि बेंगलुरू में दूसरे टेस्ट मैच की दूसरी पारी में जब कोहली आउट हुए तो ड्रेसिंग रूम में वे अपना आपा खो बैठे. उन्होंने गुस्से में एक प्लास्टिक बॉटल टेबल पर दे मारी जो वहां से उछलकर ऑस्ट्रेलियाई टीम के एक अधिकारी के पैर में लग गई थी. इस घटना के बारे में सहायक कोच संजय बांगड़ कहते हैं, ‘विराट बुरी तरह भरा हुआ था. वह बड़ा खिलाड़ी है और हर हाल में इस ईनिंग में जमना चाहता था. ऐसा खिलाड़ी जब सस्ते में आउट हो जाए तो ड्रेसिंग रूम में उसकी इस तरह प्रतिक्रिया होना सामान्य बात है.’

बैंगलुरू टेस्ट की दूसरी ईनिंग में आउट होने पर कोहली की प्रतिक्रिया
बैंगलुरू टेस्ट की दूसरी ईनिंग में आउट होने पर कोहली की प्रतिक्रिया

कोहली का टूटना यानी भारत का टूटना

संजय के शब्दों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कोहली के आउट होने के बाद ड्रेसिंग रूम में क्या हुआ होगा. हालांकि बाद में भारतीय कप्तान इस मनोदशा से जल्द ही बाहर निकले. इसके बाद उन्होंने बेहतरीन तरीके से चौथे दिन टीम की उस वक्त अगुवाई की जब वह छोटे से स्कोर को बचाने के लिए मैदान में उतरी थी. लेकिन उसके बाद जो बयानबाजी का दौर शुरू हुआ, वह अब तक थमा नहीं है. शायद यह तब तक न थमे, जब तक धर्मशाला में श्रृंखला की आखिरी गेंद न फेंक दी जाए, क्योंकि इस वक्त सवाल यह है कि पहले कौन किसको झुकाता है? और यह हार स्वीकार करके तो नहीं होने वाला, बल्कि ज्यादा से ज्यादा रन बनाकर और अपने देश के लिए मैच जीतकर ही संभव है.

कोहली के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया की बयानबाजी के सिलसिले से यह समझा जा सकता है, वे क्यों उन्हें ही निशाने पर ले रहे हैं. कोहली ने अब तक दो टेस्ट मैचों की चार पारियों में 0, 13, 12 और 15 रन बनाए हैं. इन सभी पारियों में भारत का स्कोर भी क्रमश: 107, 105, 189 और 274 रहा है. साफ है कि देश का यह सबसे बेहतरीन खिलाड़ी अगर अच्छा खेलता है, तो टीम भी बढ़िया प्रदर्शन करती है. खराब खेला तो टीम का प्रदर्शन भी लड़खड़ा जाता है. यानी यह कहना कोई गलत बात न होगी भारतीय टीम अब काफी हद तक कोहली पर निर्भर हो चुकी है.

हालांकि बीच-बीच में चेतेश्वर पुजारा, अजिंक्य रहाणे, मुरली विजय और केएल राहुल ने भी अच्छा प्रदर्शन किया है. लेकिन पिछले 11 टेस्ट मैचों के सिलसिले को (इसमें वेस्टइंडीज श्रृंखला भी जोड़ लें तो 15 मैच) अगर देखें तो कोहली के प्रदर्शन पर ही टीम की निर्भरता नजर आती है. जुलाई 2016 में वेस्टइंडीज दौरे के साथ जब से इस सीजन में भारत का टेस्ट मैच खेलने का सिलसिला शुरू हुआ है, अब तक कोहली 1,497 रन बना चुके हैं. उनका औसत 68.04 रहा है.

कोहली का योगदान इस आंकड़े से भी समझा जा सकता है कि भारत ने वेस्टइंडीज के खिलाफ श्रृंखला से लेकर बेंगलुरू टेस्ट तक जितने भी रन बनाए, उनमें 20 प्रतिशत रनों का योगदान तो उनका ही रहा. इसमें सबसे अहम बात रनों का यह अंबार नहीं है, बल्कि वह तरीका है जिसे अपनाते हुए उन्होंने यह कारनामा किया है. एक वक्त उन्होंने एंटीगुआ और हैदराबाद में हुए मैचों के दौरान इतने इत्मीनान से दोहरे शतक जड़ दिए, जैसे किसी पार्क में टहलते हुए यह कमाल किया हो. न्यूजीलैंड के खिलाफ राजकोट में हुए मैच की दूसरी पारी में और फिर कोलकाता में असामान्य उछाल वाली पिच पर भी उन्होंने तसल्लीबख्श तरीके से रन बनाए. इंग्लैंड के खिलाफ विशाखापट्‌टनम तथा मुंबई के मैचों के दौरान भी उनकी पारियों में ऐसी ही तसल्ली नजर आई और उन्होंने विरोधी आक्रमण को निर्ममता से ध्वस्त किया.

पुराने तेवर के साथ इस लड़ाई को भी आगे बढ़ाना होगा

कोहली जब क्रीज पर होते हैं तो सामने वाली टीम का पूरा ध्यान उन पर ही होता है. वे दमदारी से बैटिंग करते हुए स्कोर बोर्ड को लगातार गतिशील बनाए रखते हैं. इसी बीच, दूसरे बल्लेबाजों को भी अपने हिसाब से खुलकर खेलने का मौका मिलता है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारतीय टीम अपनी इसी खासियत को गंवाती हुई नजर आ रही है.

यानी आज से शुरू हो रहे रांची टेस्ट और इसके बाद धर्मशाला में होने वाले मैच में भारतीय टीम की किस्मत इस पर निर्भर करेगी कि कोहली कैसे खेलते हैं. मैदान के बाहर हो रही लड़ाई से ध्यान हटाकर वे पूरी तरह खेल पर अपने आप को कैसे केंद्रित करते हैं. कोहली ऐसे खिलाड़ी नहीं है, जिन्हें आसानी से झुका दिया जाए. लेकिन फिलहाल तो सवाल ये है कि क्या वे ऑस्ट्रेलिया के ‘ध्यान भटकाने वाले’ खेल से पार पा सकेंगे?