एक निजी कंपनी में कार्यरत नदीम सैफी शौकिया जिम ट्रेनर भी हैं और हापुड़ में रहते हैं.


मैं उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले का रहने वाला हूं. अपने माता-पिता की पहली संतान होने के कारण बचपन से ही पूरे परिवार का दुलारा था. कहां जाता हूं, किसके साथ जाता हूं, जब तक नजर से दूर था तब तक क्या कर रहा था? ऐसे सवालों का सामना अमूमन सभी बच्चों करना होता है. मुझसे तो ये सवाल जरूर पूछे जाते थे. यह सब उस समय बड़ा नागवार गुज़रता था पर आज समझ आता है कि जिंदगी बनाने के लिए यह सब कितना जरूरी है.

यह बात तब की है जब मेरी उम्र शायद 10-11 साल रही होगी. जैसा कि आमतौर परिवारों में होता है, हम भी गर्मी की छुट्टियों में मामा के घर जाते थे. इन दौरान मेरे दिल में उमंग की एक अनोखी लहर हुआ करती थी क्योंकि वहां सारा दिन बेरोक-टोक खेलना-कूदना होता था.

अपने मामा के ही घर एक दफा मेरी मुलाकात दूर के मामा के बेटे से हुई. उनका नाम आसिफ था. वे मुझसे उम्र में तीन-चार साल बड़े थे इसलिए मैं उन्हें आसिफ भाई कहता था. वे भी अपने अम्मी-अब्बू के साथ वहां छुट्टियां मनाने आए हुए थे. कुछ ही समय में हमारी गहरी दोस्ती हो गई. इसके बाद आलम ये था कि साथ खेलना, साथ खाना और साथ घूमना. इसी दौरान एक दिन आसिफ भाई ने मुझे वीडियो गेम के बारे में बताया. यह भी कि वीडियोगेम खेलने में कितना मजा आता है, कैसे इसमें रेस लगाते हैं या टारगेट को ढूंढ-ढूंढ़कर खत्म करते हैं. वीडियो गेम खेलकर भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है, लेकिन उस तरह नहीं जैसा आप सोच रहे हैं.

खैर, तब तक यह सब सुनकर मेरी उत्सुकता बहुत बढ़ गई और आखिरकार एक दिन हम दोनों वीडियो गेम पार्लर पहुंच गए. वहां पर पहली बार मैंने प्ले स्टेशन में तीन गेम देखे और दोनों भाइयों ने खेले भी. कुछ ही देर में हम दोनों ने अपने सारे पैसे खर्च कर दिए. वहां कुछ निर्धारित समय तक गेम खेलने के लिए दुकानदार को कुछ पैसे देकर एक टोकन कॉइन लेना होता था. चूंकि अब हमारे पास और कॉइन लेने के पैसे नहीं थे तो पार्लर के मालिक ने बड़ी बेरुखी से हमें बाहर का रास्ता दिखा दिया.

इससे भी गेम को लेकर हमारा उत्साह कम नहीं हुआ. घर आकर हमने अपनी-अपनी मां से पैसे लिए और फिर से गेम खेलने चल दिए. कुछ देर बाद फिर से पैसे ख़त्म और फिर से हम बाहर. हमारा उस दिन का मां से पैसे लेने का कोटा खत्म हो चुका था. और पैसों की मांग अगले दिन ही की जा सकती थी इसलिए अब हम दोनों को कल का बेसब्री से इंतज़ार था. जैसे-तैसे करके बाकी का दिन और रात गुज़री. अगली सुबह हम दोनों शॉप खुलने से पहले ही बाहर खड़े थे. फिर शॉप खुली हम दोनों अंदर. दो से तीन घंटे में पैसे ख़त्म और हम बाहर और फिर अगली सुबह का इंतज़ार. ऐसे ही दो हफ्ते कब बीत गए पता ही नहीं चला.

फिर एक दिन रोजाना की तरह ही मैं आसिफ भाई का इंतजार कर रहा था. वे आए तो मैंने देखा कि आज उनके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी थी. ‘आज हम सारे दिन जी भर के गेम खेलेंगे’ मेरे कुछ पूछने से पहले ही उन्होंने तपाक से कहा. जवाब में मैं बस इतना ही कह पाया, ‘पर भाई इतने पैसे कहां हैं?’ इस पर उन्होंने बताया कि आज उनके पास बहुत पैसे हैं. सुनकर मैं भी खुश हो गया. इसके बाद हम दोनों तुरंत वीडियो गेम पार्लर की ओर चल दिए.

फिर हम दिन भर कॉइन लेते गए और गेम खेलते गये. न हमें भूख लगी, न प्यास और हमने बेहिसाब गेम खेला. हमें न अपनी फिक्र थी, न घर की. यहां तक कि यह भी पता नहीं चला कि कब दोपहर हुई और कब शाम हो गई. इधर हमारी बेफिक्री का आलम यह था तो उधर घर पर हम दोनों की तलाश में हंगामा मचा था. पूरा घर हमें ढूंढने में लगा था. मेरी मां और मामी (आसिफ भाई की अम्मी) का तो रो-रोकर बुरा हाल हो गया था. ऐसा कुछ भी हो सकता है, इसका हमें जरा भी अंदाजा नहीं था. खैर, जब पैसे ख़त्म हुये तब हमने घर का रुख किया. अंधेरे को देखकर हमें अंदाजा तो हो गया था कि घर जाकर डांट पड़नी है. कुछ देर के बाद हम दोनों घर पर थे और जैसी कि उम्मीद थी हमें बहुत डांट पड़ी. नाराज होने के बावजूद घरवाले इस बात से संतुष्ट थे कि हम सही-सलामत थे.

अगले दिन आसिफ भाई फिर वैसे ही चहकते-चहकते आए और बताया कि आज भी उसके पास बहुत पैसे हैं. पूछने पर बताया कि उन्होंने अपनी गुल्लक तोड़ दी है. हम फिर वीडियो गेम पार्लर पहुंच गए लेकिन कल की घटना के बाद थोड़े सावधान थे, इसलिए बीच में डेढ़-दो घंटे बाद घर का चक्कर लगा आते थे.

यह सिलसिला अगले चार दिन तक बड़े आराम से चला. अब हमारा यह रुटीन तय हो चुका था सो कोई हमसे ज्यादा सवाल भी नहीं करता था. आसिफ भाई के हाथ जाने कौन सा खजाना लग गया था कि किसी दिन उनके पास सौ रुपये होते, किसी दिन दो सौ रुपये. मैं इस बात पर हैरान तो होता था लेकिन इतना नहीं कि इसकी वजह जानने की कोशिश करूं, शायद मुझ में इतनी समझ भी नहीं थी कि मुझे यह जानना चाहिए.

पांचवें दिन उनके पास पूरे पांच सौ रुपये थे जो कि उस समय हमारी उम्र के हिसाब से बड़ी रकम थी. लेकिन जी भर गेम खेलने की खुशी उससे बड़ी थी सो हम फिर पार्लर पहुंच गए. अपने डेली रुटीन की तरह ही हम दोनों जब दोपहर में घर का चक्कर लगाने पहुंचे तो पाया कि घर पर आसिफ भाई के पापा, उनकी अम्मी और मेरी अम्मी के पास बैठे थे. ये तीनों चुपके-चुपके कुछ बातें कर रहे थे. मामा जी को घर पर देख कर आसिफ भाई ने मुझे बाकी बचे सारे पैसे दे दिये और कहा – ‘इन पैसों को आपने पास रख लेकिन ध्यान रखना कि इस बारे में किसी को पता न चले.’

आमतौर पर उनके चेहरे पर जो अजीब-सी खुशी होती थी, वह आज नदारद थी. इसके उलट वे कुछ परेशान से लग रहे थे. उनकी शकल देखकर मैं समझ गया कि आसिफ भाई ये पैसे चुराकर लाया करते थे. हालांकि मैं उनसे वो पैसे लेने के लिए मना नहीं कर पाया और पैसे जेब में लिए अम्मी के पास जाकर बैठ गया. अम्मी की बातें सुनने के बाद समझ आया कि मेरा अंदाजा बिल्कुल सही था. आसिफ भाई पिछले पांच दिनों से रोजाना अपने पापा के पर्स से पैसे चुराकर ला रहे थे और उनके पापा यानी मेरे मामा को इसका एहसास हो गया था.

मामा ने इस पूरे मामले की तफ्तीश की शुरूआत मुझ से की. किसी सवाल का मेरे मुंह से कोई जवाब न निकला, बस माथे पर पसीना छलकने लगा. मैंने सोचा कि पैसे मेरी जेब से बरामद होंगे तो मैं भी उतना ही चोर समझा जाउंगा, और इतना सोचकर ही मेरी हालत खराब हो गई.

मुझे सन्न देखकर अम्मी ने मेरा हाथ पकड़कर हिलाते हुए कहा कि ‘अरे, जवाब दे नदीम’. जवाब में मैंने इतना ही कहा, ‘हां, सब ठीक है.’ इतने में अम्मी ने हाथ पकड़ कर अपनी और खींचा और कहा - ‘कितना पसीना आ रहा है? रूमाल कहां है तेरा?’ कहते हुए अम्मी ने अपना हाथ जेब में डाल दिया. रूमाल तो मिला अम्मी को और साथ ही हमारी चोरी भी पकड़ी गई. ये और बात थी कि मैं इस चोरी में शामिल नहीं था.

जेब से पैसे निकले तो अम्मी ने फट से एक चांटा गाल पर रख दिया. दूसरे की जरूरत नहीं पड़ी और उससे पहले ही मैंने दो हफ़्तों की पूरी कहानी आंसुओं के साथ बयां कर दी. मुझे उस चांटे के साथ भारी डांट भी पड़ी और नसीहतें दी गई. वहीं आसिफ भाई को उस दिन बहुत मार पड़ी.

यह घटना इस मायने में भी खास है कि अपने घर आने के कुछ हफ्ते बाद पापा ने मेरे लिए वीडियोगेम खरीद दिया था. वीडियोगेम से पहले मिली नसीहतों ने मुझे अपनी उम्र के सबसे कच्चे पड़ाव में ही मेरा पहला सबसे जरूरी सबक दे दिया. उस दिन मिली नसीहतों से मैंने समझा कि दूसरों के पैसों पर ऐश करना गलत है. उधर आसिफ भाई को पड़ी मार देखकर समझ आ गया कि कभी-भी किसी चीज़ को अपने ऊपर इतना हावी नहीं होने देना चाहिए कि वह आपसे कोई गलत काम करा सके. बाद के समय में मुझे एक मैगजीन में पढ़ने को मिला था कि वीडियो गेम भी एक हद तक आपके दिमाग को तेज करते हैं और कुछ नई बातें सिखा सकते हैं. तब यह पढ़कर मैं खूब हंसा था क्योंकि वीडियो गेम खेलकर तो नहीं लेकिन इसके चक्कर में मुझे जो सबक मिले, वो आज तक याद हैं.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)