राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले उत्तरप्रदेश में मिली अप्रत्याशित जीत ने अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा की वापसी की संभावनाएं कई गुना बढ़ा दी हैं. विधानसभा चुनाव में पार्टी के शानदार प्रदर्शन के बाद उन सभी राज्यों में होली-दीवाली जैसा माहौल देखा गया जहां भाजपा की सरकारें हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश से सटे राजस्थान का माहौल ऐसा बिलकुल भी नहीं है. जानकारों के मुताबिक राजस्थान में भाजपा पदाधिकारियों के चेहरों पर वही चिंता देखी जा सकती है जैसी इस समय देश के दूसरे हिस्सों में विपक्षी दलों के चेहरों पर दिखाई दे रही हैं.

राजस्थान की जमीनी स्थिति को जानने वालों का मानना है कि वहां की जनता राज्य सरकार के अब तक के प्रदर्शन से बेहद नाखुश है. साथ ही हर पांच साल में तख्ता पलट करने में राजस्थानी वोटर की महारत भी जगजाहिर है. ऐसे में अगले कुछ महीने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए बड़े मुश्किल भरे साबित हो सकते हैं. बताया जा रहा है कि अगले विधानसभा चुनावों पर अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जल्द ही यहां के संगठन और सरकार में बड़े बदलाव कर सकता है.

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पद से हटाए जाने की बात एक बार फिर राजनैतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है. लेकिन यह पहली बार नहीं है जब उन्हें हटाए जाने की बातें की जा रही हैं. सबसे पहले इस तरह की खबरें 2014 में सामने आयी थीं जब राजस्थान के उपचुनावों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी थी. उसके बाद से लगातार अलग-अलग वजहों से इस तरह की चर्चाएं होती रही हैं.

कई विश्लेषक मानते हैं कि इन चर्चाओं के पीछे वसुंधरा राजे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के असहज रिश्ते ज्यादा जिम्मेदार रहे हैं. जानकारों के मुताबिक राजे और प्रधानमंत्री के बीच की अनबन सबसे पहले 2008 में दुनिया के सामने आयी थी. उस समय राजस्थान-गुजरात की संयुक्त नर्मदा नहर परियोजना के उद्घाटन के समय, एक ही पार्टी से होने के बावजूद, मोदी और राजे ने एक दूसरे के कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लिया था.

लोकसभा चुनाव में पार्टी के शानदार प्रदर्शन को देखते हुए वसुंधरा राजे को उम्मीद थी कि उनके पुत्र और झालावाड़ से सांसद दुष्यंत सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह जरूर मिलेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं  

हालांकि पांच साल बाद इनके बीच रिश्ते सामान्य होने की खबरें भी खूब सुनने को मिलीं जब दोनों ने एक दूसरे के लिए चुनावों में जमकर प्रचार किया था. मोदी लहर कहें या राजे की मेहनत 2013 में भाजपा ने राजस्थान विधानसभा चुनावों में जबर्दस्त बहुमत हासिल किया. और अपनी लय बरकरार रखते हुए पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रदेश की सभी 25 सीटों पर कब्जा कर लिया. जब इस जीत का श्रेय लेने की बारी आई तो जानकारों के मुताबिक दोनों एक दूसरे को एक बार फिर खटकने लगे. प्रदेश में इस जीत पर अपना-अपना दावा करते राजे और मोदी समर्थक कई मौकों पर एक दूसरे को आंखे तरेरते भी नजर आए. जानकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस जीत को लेकर अप्रत्यक्ष तौर पर अपनी पीठ थपथपाती रही हैं लेकिन खुलकर इस बारे में उन्होंने कभी नहीं बोला.

लोकसभा चुनाव में पार्टी के शानदार प्रदर्शन को देखते हुए वसुंधरा राजे को उम्मीद थी कि उनके पुत्र और झालावाड़ से सांसद दुष्यंत सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह जरूर मिलेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. प्रतिक्रिया के तौर पर वसुंधरा राजे खुद दिल्ली पहुंच गयीं और प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण से पहले राजस्थान से चुने सभी सांसदों की मीटिंग बुलाई. खबरें तो ये थीं कि राजे भाजपा नाराज सांसदों को मनाने के लिए दिल्ली आईं थीं. लेकिन कई जानकारों ने इसे राजे के शक्तिप्रदर्शन के तौर पर भी देखा. बताया जाता है कि तभी से राजे, नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की नजरों में किरकरी बनी हुई हैं.

उसके बाद 2014 के उपचुनावों में जब भाजपा को चार में से सिर्फ एक सीट मिली तभी से राजनीतिकारों ने यह कयास लगाना शुरु कर दिया कि प्रदेश में वसुंधरा राजे के दिन लद गए हैं. लेकिन उस समय केंद्र के लिए यह कदम आसान नहीं था. दरअसल उसी समय उत्तर प्रदेश में भी उपचुनाव हुए थे. राजस्थान की तरह वहां भी लोकसभा में जबर्दस्त प्रदर्शन के बावजूद भाजपा उपचुनाव नहीं जीत सकी थी. ऐसे हालात में केंद्र को दोनों राज्यों में समान कार्रवाई करनी पड़ती. इसके अलावा दिल्ली के विधानसभा चुनाव भी सर पर थे. ऐसे में भाजपा किसी तरह की अंतर्कलह नहीं चाहती थी. यही कारण था कि उस समय राजे को लेकर भाजपा शीर्ष ने चुप्पी साध ली.

ललित मोदी कांड में जब वसुंधरा राजे का नाम उछला तो सभी को लग रहा था कि इस बार केंद्र उन्हें नहीं बख्शेगा.  

लेकिन वसुंधरा राजे आसानी से चुप होने वालों में से नहीं थी. उपचुनाव हारने के अगले महीने ही उन्होंने मीडिया के सामने एक चौंकाने वाला बयान दिया - ‘कोई व्यक्ति इस गुमान में ना रहे कि उसकी वजह से पार्टी राजस्थान में लोकसभा की 25 और विधानसभा की 163 सीटें जीती हैं. जनता जिताने निकलती है तो दिल खोलकर और हराने निकलती है तो घर भेज देती है.’ हालांकि इस बयान में उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था लेकिन जानकारों का मानना था कि चुनावों में जीत का सेहरा प्रधानमंत्री के सिर बांधना उन्हें रास नहीं आ रहा था.

इसके अलावा राजे ने केंद्र के महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत भी राजस्थान में देरी से की थी. इसके लिए बाद में उनसे दिल्ली की तरफ से जवाब भी मांगा गया. इस मामले में भी उनका रुख किसी विपक्षी मुख्यमंत्री जैसा था. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा, ‘ये तो अब कर रहे हैं. हमने अपने बजट में इसका प्रावधान किया है. हमने 2003 में ही झाड़ू लगाकर इसकी शुरुआत कर दी थी. हालांकि केंद्र ने राजे के इस बयान को भी दरकिनार करते हुए इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी.

लेकिन उसके बाद 2015 की गर्मियां वसुंधरा राजे के माथे पर पसीना लाने वाली साबित हुईं. ललित मोदी कांड में जब वसुंधरा राजे का नाम उछला तो सभी को लग रहा था कि इस बार केंद्र उन्हें नहीं बख्शेगा. लंबे समय तक केंद्र ने इस पर चुप्पी बनाए रखी और जब राजे की चारों तरफ जमकर किरकिरी हो गयी तब उन्हें क्लीन चिट दी गई. उस वक्त राजे को नही हटाया गया तो इसके पीछे उऩकी अपने विधायकों पर जबरदस्त पकड़ भी थी. इसके अलावा पहले ही दिल्ली चुनावों में करारी हार का सामना कर चुकी भाजपा की पूरी नजर बिहार विधानसभा चुनावों पर थी. ऐसे में चुनावों से ठीक पहले राजस्थान में उठाया कोई भी बड़ा कदम बिहार में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे मोदी और शाह का ध्यान विचलित कर सकता था.

ललित मोदी मामले से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का भी नाम जोड़ा जाने लगा. हालांकि यह सही मौका था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुषमा और राजे जैसी दो प्रबल विरोधियों को हटाकर एक तीर से दो शिकार कर सकते थे. लेकिन पार्टी के दो बड़े नेताओं को पद से एक साथ हटाने पर विपक्ष के आरोपों के सही साबित होने का खतरा था. जो कि बिहार चुनाव में पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा सकता था. इस तरह मुख्यमंत्री राजे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का कोप भाजन होने से एक बार फिर बच गयीं.

पड़ोसी प्रदेश की मुख्यमंत्री होने के बावजूद राजे को यूपी चुनावों में कोई जिम्मेदारी न देना और जीत के बाद जब वे बधाई देने दिल्ली पहुंची तो उनका भीड़ में दिखना केंद्र की बेरूखी का इशारा है  

अगले ही साल जब भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर ने राज्यसभा सांसद के लिए राजस्थान से चुनाव लड़ा तब फिर से अटकलों का बाजार गर्म होना शुरु हो गया. दरअसल ओम माथुर मोदी-शाह के अलावा आरएसएस के भी चहेते हैं. ऐसे में संभावनाएं जताई गयी कि माथुर की राजस्थान में री-एन्ट्री राजे के लिए परेशानी का सबब बन सकती है. इससे पहले ललित मोदी कांड के समय भी मुख्यमंत्री पद के लिए ओम माथुर का नाम सामने आया था.

अब राजस्थान में एक बार फिर ऐसा ही कुछ माहौल देखने को मिल रहा है जब यूपी चुनावों के बाद भाजपा प्रदेश कार्यालय के बाहर माथुर के बड़े पोस्टर दिखाई दिए. जानकार मानते हैं कि इस बार वसुंधरा राजे की कुर्सी बड़े संकट में है. उनके मुताबिक पड़ोसी प्रदेश की मुख्यमंत्री होने के बावजूद राजे को यूपी चुनावों में कोई जिम्मेदारी न देना और जीत के बाद जब वे बधाई देने दिल्ली पहुंची तो उनका भीड़ में दिखना केंद्र की बेरूखी का इशारा है.

साथ ही यह भी माना जाता है कि राजे प्रदेश भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं समेत आरएसएस को भी शुरुआत से ही बेहद नापसंद हैं. ओम माथुर और घनश्याम तिवाड़ी ऐसे ही नेताओं में शुमार हैं. ऐसे में विश्लेषक कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह राजे को शायद ही इस बार कोई रियायत दे. कई जानकारों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत के बाद मोदी-शाह की जोड़ी इतनी मजबूत हो चुकी है कि अब वह वसुंधरा को हटाने का बड़ा निर्णय लेने से पहले झिझकेगी नहीं. विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यदि भाजपा डेढ़ साल बाद होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों में अपनी वापसी करना चाहती है तो उसे इस बारे में तुरंत ही कोई फैसला करना होगा.

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व क्या कर सकता है?

प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी,वसुंधरा राजे को केंद्र में कोई जिम्मेदारी सौंपते हुए उन्हें वापिस दिल्ली बुला सकते हैं. इससे पार्टी को तीन फायदे होंगे - एक तो दिल्ली में कोई जिम्मेदारी देने से केंद्र राजे सरीखी कद्दावर लेकिन विरोधी नेता पर सीधी नजर रख पाएगा. दूसरे केंद्र में कोई पद देने से राजे समर्थकों के बीच भी संतोष बना रहेगा और वे खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर नहीं कर पाएंगे. और तीसरे प्रधानमंत्री मोदी राजस्थान के विधानसभा चुनावों में अपने किसी विश्वस्त को पार्टी का चेहरा बन सकेंगे. इन नामों में ओम माथुर और बीकानेर सांसद एवं केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल शीर्ष पर हैं.

यदि राजे के राजनैतिक इतिहास पर नजर डाली जाए तो उनका नाम उन चंद नेताओं में शुमार है जो खुले तौर पर अपनी ही पार्टी के शीर्ष का विरोध करने के लिए जाने जाते हैं  

जानकार यह भी कह रहे हैं कि केंद्र राजे को हटाने के बाद राजस्थान के मंत्रिमंडल समेत प्रदेश संगठन के शीर्ष पदों पर भी महत्वपूर्ण बदलाव कर सकता है. मंत्रिमंडल की बात की जाए तो उन विधायकों को नई जिम्मेदारी सौंपी जा सकती हैं जो वोट बैंक के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं और कोई पद न मिलने के कारण अंदरूनी तौर पर अंसतुष्ट हैं. इसके अलावा प्रदेश स्तर पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के लिए उन चेहरों को भी सामने लाया जा सकता है जिन पर आरएसएस अपनी सहमति देगा. अभी की बात की जाए तो संघ के कुछ चुनिंदा नेता ही इस समय महत्वपूर्ण पदों पर मौजूद हैं और उन्हें भी सिर्फ संगठन के दवाब के चलते ही मंत्रिमंडल में जगह मिली हुई है.

लेकिन भाजपा आलाकमान के सामने चुनौती भी कम नहीं हैं

खबरें चाहे जितनी उड़ें लेकिन कुछ जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पद से हटाना केंद्र के लिए अब भी उतना आसान नहीं है जितना समझा जा रहा है. यदि राजे के राजनैतिक इतिहास पर नजर डाली जाए तो उनका नाम उन चंद नेताओं में शुमार है जो खुले तौर पर अपनी ही पार्टी के शीर्ष का विरोध करने के लिए जाने जाते हैं. ऐसा ही एक मामला 2009 में सामने आया था जब विधानसभा और लोकसभा में पार्टी के बुरे प्रदर्शन के बाद ओम माथुर और संगठन मंत्री प्रकाश चंद गुप्ता को नैतिक जिम्मेदारी के चलते अपना पद छोड़ना पड़ा था. लेकिन राजे ने ऐसा करने के बजाय दिल्ली जाकर शक्ति प्रदर्शन किया था. हालांकि बाद में उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया था लेकिन पार्टी में उनका कद विद्रोही नेता के तौर पर अधिक मजबूत हो गया. ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि मोदी-शाह की जोड़ी ऐसी कौन सी युक्ति निकालेगी जिससे राजस्थान में सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे.