बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने दिल्ली नगर निगम के चुनावों में 123 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. कुछ दिन पहले नीतीश कुमार खुद चुनावी सभाएं करने दिल्ली आए थे. अपनी सभाओं में उन्होंने आक्रामक रुख अपनाया और दिल्ली की बदहाली के लिए भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों को निशाने पर लिया.

नीतीश कुमार की पार्टी उत्तर प्रदेश चुनावों से आखिरी वक्त पर हट गई थी. उस वक्त राजनीतिक जानकारों ने इसे भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोकने वाला कदम माना था. लेकिन अब सवाल यह उठता है कि उन्हीं नीतीश कुमार की पार्टी दिल्ली नगर निगम के चुनावों में इतना जोर आखिर क्यों लगा रही है? लोग यह भी पूछ रहे हैं कि इससे आखिर फायदा किसे होगा?

वोटों का बिखराव

माना जा रहा है कि जेडीयू के चुनावी मैदान में उतरने से पहले से ही बंटे भाजपा विरोधी वोटों में और बिखराव आएगा. दिल्ली नगर निगम में लंबे समय से भाजपा काबिज है. इस बार निगम से भाजपा को बेदखल करने के लिए आम आदमी पार्टी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं. हालांकि, राजौरी गार्डन विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार की जीत के बाद माना जा रहा है कि आप की पकड़ दिल्ली में ढीली पड़ी है. इस सीट पर आप न सिर्फ तीसरे स्थान पर रही बल्कि उसके उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई. यहां दूसरे स्थान पर कांग्रेस रही.

यानी दिल्ली में अब जो परिस्थिति राजनीतिक तौर पर बनती दिख रही है उसमें भाजपा मुख्य पार्टी लग रही है और उससे निपटने की कोशिश करते हुए कांग्रेस और आप दिख रहे हैं. ऐसे में 123 सीटों पर ही सही नीतीश की पार्टी के उम्मीदवार खड़े होने से भाजपा विरोधी वोटों का बंटना तय लग रहा है.

कुछ लोग कह रहे हैं कि राजौरी गार्डन उपचुनाव में हार से परेशान आप की मुश्किलें नीतीश कुमार की पार्टी के चुनावी मैदान में उतरने से और बढ़ गई हैं, क्योंकि उसे लग रहा है कि भाजपा विरोधी कुछ वोट नीतीश की पार्टी को मिल सकते हैं. ऐसे में उसका सीधा नुकसान होगा और भाजपा का फायदा. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पर्दे के पीछे से ही सही, लेकिन 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश की मदद आम आदमी पार्टी ने भी की थी. नीतीश के पक्ष में सोशल मीडिया पर जो अभियान चलाए जा रहे थे उनमें केजरीवाल ने अपने साथ काम करने वाले कुछ लोगों को लगाया था. यानी कहां तो कुछ समय पहले तक यह लगता था कि नीतीश और केजरीवाल साथ आकर भाजपा का मुकाबला करने की रणनीति पर काम करेंगे. लेकिन आज स्थिति यह है कि दोनों नेता और दोनों की पार्टियां दिल्ली नगर निगम चुनाव में एक दूसरे के आमने-सामने हैं. इसका सीधा फायदा दोनों के धुर विरोधी माने जाने वाली भाजपा को होता दिख रहा है.

कांग्रेस में उत्साह

राजौरी उपचुनाव में मत प्रतिशत में बढ़ोतरी से कांग्रेस में भी निगम चुनावों को लेकर उत्साह का माहौल है. प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन पार्टी का चुनाव अभियान बड़े सुनियोजित ढंग से चला रहे हैं. चुनाव प्रचार में वे न सिर्फ पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं की सेवा ले रहे हैं बल्कि दूसरे राज्यों के प्रमुख कांग्रेसी नेताओं को बुला रहे हैं. लेकिन नीतीश की पार्टी के उम्मीदवार मैदान में उतरने से उसे भी नुकसान का भय सता रहा है. जबकि यही कांग्रेस बिहार में नीतीश सरकार में भागीदार है. फिर भी नीतीश की पार्टी दिल्ली निगम चुनावों में नहीं उतरे, यह कांग्रेस नहीं सुनिश्चित कर पायी.

जिन्हें लगता है कि नीतीश के दिल्ली के चुनावी मैदान में उतरने से भाजपा को फायदा होगा, उनमें से कुछ लोग इसे उनकी और भाजपा की बढ़ती नजदीकी के संकेत के तौर पर भी देख रहे हैं. ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि अगर जनता दल यूनाइटेड दिल्ली नगर निगम में कुछ सीटें जीत भी जाता है तो इससे नीतीश कुमार की सियासी हैसियत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. इससे नीतीश की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी हैसियत बढ़ाने की कोशिशों को भी कोई खास बल नहीं मिलेगा.

लेकिन अगर उनकी पार्टी द्वारा वोट काटे जाने से भाजपा निगम चुनावों में फिर से जीत हासिल कर लेती है तो उससे न सिर्फ भाजपा का मनोबल बढ़ेगा बल्कि विपक्ष का हौसला भी कमजोर होगा. ऐसे में आने वाले समय में भाजपा का मुकाबला करना और भी मुश्किल होगा. शायद यही वजह है कि कुछ जानकार नीतीश कुमार के दिल्ली निगम चुनाव पर इस जोर को उनका एक वैसा ही सियासी दांव करार दे रहे हैं जैसा उन्होंने नोटबंदी पर मोदी सरकार का समर्थन करके चला था. उस वक्त भी बहुत से लोगों को नीतीश के रुख पर आश्चर्य हुआ था. लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली भारी जीत के बाद राजनीतिक जानकारों ने माना कि राजनीतिक तौर पर नीतीश ने परिपक्वता का परिचय दिया था. दिल्ली को लेकर उनके इस फैसले ने जानकारों को फिर हैरान कर दिया है.