निर्देशक : अश्तर सईद

लेखक/निर्माता : माइकल पेलिको

कलाकार : रवीना टंडन, दिव्या जगदाले, मधुर मित्तल, अनुराग अरोरा, अलीशा खान

रेटिंग : 1 / 5

शेक्सपियर ने बदले को इंसानी व्यवहार का बुनियादी हिस्सा मानते हुए ही लिखा होगा – ‘अगर आप हमें सुई चुभाएंगे तो क्या हमें खून नहीं निकलेगा? अगर आप हमें गुदगुदी करेंगे तो क्या हम खिलखिलाएंगे नहीं? अगर आप हमें जहर देंगे तो क्या हम मरेंगे नहीं... और अगर आप हमारे साथ गलत करेंगे तो क्या हम बदला नहीं लेंगे?’ ऐसा लगता है कि इसके बाद की लाइन बस यही हो सकती है – ‘लेंगे जी, जरूर लेंगे. क्यों नहीं लेंगे?’ बदला–हत्या–हिंसा क्या इतने ही सहज हैं? असलियत में भले न हों, लेकिन बॉलीवुड शेक्सपियर से पूरी तरह सहमत दिखता है. तभी तो हर दूसरे महीने हमें एकाध रिवेंज फिल्म देखने को मिल ही जाती है.

इस मामले में बॉलीवुड के साथ एक दुविधा और है. यहां पर जब बदला फिल्में बनती हैं तो उनमें कानून का दो बार मजाक बनता दिखता है. पहली बार तब जब कोई अपराध होता है और पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता और दूसरी बार तब जब पीड़ित खुद अपराधी बनकर बदला लेता है. अगर आंखें खोलकर देखें तो हत्या कर बदला लेना उस अपराधी के साथ इंसानियत को भी मार देना है. इसके उलट मातृ कुछ इस तरह का संदेश देती फिल्म लगती है कि इंसानियत भले खत्म हो जाए पर बदला पूरा होना चाहिए.

मातृ बदले की कहानी होने के साथ-साथ एक मां की भी कहानी है. मां के बदले की कहानी होने के कारण उसे यह टाइटल दिया गया है. निर्देशक ने मातृ के लिए विषय तो सही चुना, लेकिन उसे दिखाने का तरीका चुनने में चूक गया. फिल्म में दिखाने के लिए बहुत कुछ था - बलात्कार जैसा विषय था, एक मां का दुख-दुविधा थी और शायद सबसे आखिर में बदला था. अगर फिल्म में यह सब इसी क्रम में होता तो शायद यह अपने टाइटल और विषय दोनों से न्याय कर सकती थी.

पहले ही दृश्य से फिल्म जल्दी में बनाई गई लगती है. कुछ संवाद अधूरे से हैं और दृश्य बुरी तरह एडिट हुए हैं. फिर आगे फिल्म दिखाती है कि बलात्कार की शिकार हुई एक महिला, जिसने अपनी आंखों के आगे अपनी बेटी को भी वही यातना भुगतकर मरते देखा है, न्याय के लिए जरा भी संघर्ष नहीं करती. दो-चार फ्रेम के बाद आप देखते हैं कि नायिका कुछ ही दिनों में कोमा जैसी हालत से उठकर जिम पहुंचकर बदले की तैयारियों में लग जाती है. दशहरे के दिन दुर्घटना की शिकार हुई नायिका होली के दिन अपना बदला पूरा कर लेती है. और इस बीच उसके साथ कुछ भी अप्रत्याशित नहीं होता. फिल्म के बाकी दृश्यों और घटनाक्रमों को देखते हुए इस पर यकीन कर पाना मुश्किल लगता है.

इसके साथ फिल्म देखते हुए आपको यह एहसास भी होता है कि इसे (विशेष अर्थों में) ‘वक्त की नजाकत’ को भांपने के साथ पुरस्कार पाने की हसरत से बनाया गया है. इसमें एक दृश्य है जहां पुलिस अधिकारी सड़क पर मरी-अधमरी पड़ी मां-बेटी के साथ ‘क्या हुआ है?’ इस बात की तफ्तीश करने आया है. वह कहता है कि ‘पीएम देश को शेप करने में लगे हैं और ये रेप करने में लगे हैं.’ यह संवाद लिखने वाले को इसे लिखने के बाद कलम या कीबोर्ड तोड़ देना चाहिए था. बेशक लेखक और फिल्मकार ने फिल्म के लिए यह विषय एक अच्छा संदेश देने के इरादे से ही चुना होगा लेकिन यह एक लाइन फिल्म में रखकर उन्होंने अपने इरादों पर पानी नहीं तेजाब फेर दिया है.

फिल्म में रवीना टंडन ‘अभिनय’ करती दिखती हैं, लेकिन ऐसा नहीं करतीं कि सिर्फ उसी के लिए फिल्म देखी जा सके. यानी इस फिल्म से उनकी वापसी की कोशिश नाकाम तो हुई ही है, उनका रिकॉर्ड भी खराब हुआ है. इससे अच्छा तो वे बड़ी स्क्रीन पर न ही आतीं और दर्शकों को ‘शूल’, ‘सत्ता’, ‘अक्स’ आदि फिल्मों में उनकी अदाकारी को पूरे सम्मान से याद करने देतीं. रवीना के साथ दिव्या जगदाले, मधुर मित्तल और अनुराग अरोरा स्क्रीन पर सबसे ज्यादा वक्त तक नजर आते हैं और इनके औसत अभिनय के बीच ज्यादातर दृश्यों में जगदाले रवीना से अच्छा अभिनय कर जाती हैं.

यह एक बार भी न देखी जाने वाली फिल्म है. इसे दी गई रेटिंग सिर्फ रवीना और उनके साथियों के अभिनय के चलते दे दी गई है. लेखन, निर्देशन और एडिटिंग की गलतियों से भरी पड़ी यह फिल्म एक बहुत संवेदनशील विषय की हत्या कर देती है. इसे देखने के बाद से हम इस दुविधा में हैं कि अगर बदला लेना इतना ही सहज है तो हमें भी लेना चाहिए, पर किससे?