बिहार में इस तरह के संकेत तो मिल ही रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महाठबंधन के अपने सहयोगियों राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस से दूर होते जा रहे हैं. लेकिन, दूसरी तरफ अब यह संकेत भी मिलने लगा है कि जनता दल-यूनाइटेड (जद-यू) के वरिष्ठ नेता शरद यादव के साथ भी नीतीश की दूरियां बढ़ती जा रही हैं.

सियासी गलियारों में इस तरह की अटकलें हैं कि नीतीश संभवत: फिर भारतीय जनता पार्टी के साथ गठजोड़ करने पर विचार कर रहे हैं. करीब डेढ़ दशक तक भाजपा के साथ रहने के बाद 2013 में नीतीश ने उससे गठबंधन तोड़ा. लेकिन अब जैसा कि जद-यू के प्रवक्ता केसी त्यागी ख़ुद कह चुके हैं कि उनकी पार्टी का गठबंधन भाजपा के साथ ज़्यादा सहज़ था. इसी वज़ह से इन अटकलों को बल मिला है. लेकिन सूत्रों की मानें तो भाजपा के साथ जाने के मसले पर ही नीतीश कुमार और शरद यादव के बीच मतभेद हैं. बताया जाता है कि शरद यादव ने अपने मन की बात नीतीश कुमार को बता भी दी है. अब फैसला नीतीश को करना है.

लालू प्रसाद यादव के ठिकानों पर जब सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) ने छापा मारा तो नीतीश कुमार ने इस कार्रवाई पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. लेकिन शरद यादव विपक्ष के उन पहले नेताओं में थे जिन्होंने छापे की कार्रवाई के बाद भी लालू के प्रति अपना समर्थन ज़ताया, जबकि नीतीश कुमार ने पार्टी के सभी नेताओं के साफ हिदायत दी थी कि सीबीआई की कार्रवाई पर किसी को कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी है. लेकिन शरद यादव ने यह निर्देश नहीं माना. इससे भी दोनों नेताओं के बीच फासला बढ़ने की अटकलों को बला मिला है.

अलग रास्ता, अलग राय

लालू और उनके परिवार के ख़िलाफ सीबीआई की कार्रवाई के मसले पर नीतीश कुमार और शरद यादव की राय भी अलग-अलग बताई जाती है. सीबीआई की कार्रवाई के बाद शरद की टिप्पणी काफी-कुछ उसी लाइन पर थी जिस पर लालू यादव और उनके सहयोगी कांग्रेस के नेता बयान दे रहे थे. यानी यह छापे भाजपा का राजनीतिक षड्यंत्र हैं. ऐसे ही शरद यादव ने भी कहा. उनका कहना था, ‘सरकारी जांच एजेंसियाें की कार्रवाई (लालू और उनके परिवार के ख़िलाफ आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय भी जांच कर रहे हैं) विपक्षी एकता को तोड़ने की साजिश है.’

इसके एक दिन बाद ही पटना में नीतीश कुमार ने जद-यू नेताओं की बैठक के दौरान लालू और उनके परिवार के ख़िलाफ चल रही जांच को राजनीतिक बदले की कार्रवाई नहीं माना. बल्कि उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को जनता के सामने सफाई देनी चाहिए या फिर उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए. बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने तेजस्वी और उनकी पार्टी के सामने चार दिन की समय-सीमा भी तय कर दी है. उनकी पार्टी की ओर से प्रवक्ता नीरज कुमार ने भी मीडिया के सामने कुछ इसी तरह की बातें दोहराईं जो बैठक में कही गई थी.

वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है जब विपक्षी गठबंधन में दरारें दिख रही हों. इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के प्रत्याशी रामनाथ काेविंद को जब नीतीश ने समर्थन का ऐलान किया था तो भी यही स्थिति दिखी थी. जबकि पहले नीतीश कुमार की पहल पर ही विपक्ष ने राष्ट्रपति चुनाव में संयुक्त उम्मीदवार उतारने का मन बनाया था. लेकिन जब विपक्षी दलों ने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के तौर पर अपना संयुक्त प्रत्याशी चुना तो नीतीश उन्हें समर्थन देने से पीछे हट गए.

पार्टी के नेता बताते हैं कि जब से नीतीश कुमार ने रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का ऐलान किया है तभी से शरद यादव लगातार लालू प्रसाद के संपर्क में बने हुए हैं. इसके बाद सीबीआई की छापामारी और उसके बाद बनी स्थितियों में यह संपर्क पहले से ज़्यादा मज़बूत ही हुआ है.

मतभेद पहली बार नहीं

शरद यादव और नीतीश कुमार के बीच मतभेद का यह पहला मामला नहीं है. बताया जाता है कि पिछले साल अप्रैल में जब से नीतीश कुमार ने जद-यू के अध्यक्ष का पद ले लिया तभी से शरद अंदर ही अंदर असंतुष्ट हैं. यह असंतोष उस वक़्त भी सामने आया जब केंद्र की मोदी सरकार ने नोटबंदी का फैसला किया. तब नीतीश कुमार ने इसका समर्थन किया था. लेकिन शरद यादव ने पार्टी लाइन से अलग रास्ता अख़्तियार किया. उन्होंने नोटबंदी का विरोध करने के लिए बुलाई गई विपक्षी दलों की बैठकों में न सिर्फ हिस्सा लिया बल्कि वे प्रदर्शनों में भी उनके साथ दिखे.

हालांकि सिर्फ शरद यादव के असंतोष से नीतीश कुमार को ज़्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला. लेकिन उनके लिए चिंता की बात शायद वह हो सकती है जो पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं. वे कहते हैं, ‘इस बार पार्टी में सिर्फ शरद यादव ही अकेले असंतुष्ट नहीं हैं. पार्टी में ऐसे नेताओं की तादाद बढ़ रही है जिन्हें भाजपा के साथ जाने का विचार मंजूर नहीं है. ऐसे नेता उस वक़्त शरद यादव के इर्द-ग़िर्द जुट जा सकते हैं जब नीतीश महागठबंधन से अलग हटने का फैसला करेंगे.’ यानी इतना तय है कि नीतीश कुमार के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा.