कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के मामले में रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत ने कई जानकारों को चौंकाया है. शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हुई इस मामले की सुनवाई में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने गोस्वामी की गिरफ़्तारी पर तीन सप्ताह के लिए रोक लगा दी थी. साथ ही पीठ ने याचिकाकर्ता गोस्वामी को ट्रायल कोर्ट या हाईकोर्ट के समक्ष अग्रिम जमानत की अर्जी दाख़िल करने की अनुमति भी दे दी.

विश्लेषकों का एक वर्ग इस पूरे घटनाक्रम पर बड़े सवालिया निशान उठा रहा है. दिल्ली से आने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता रीपक कंसल ने सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को इस बारे में पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि उच्चतम न्यायालय में मामलों को सूचीबद्ध करने में तात्कालिकता के आधार पर भेदभाव किया जाता है. इस पत्र में रीपक कंसल ने लिखा है, ‘पहले से लंबित पड़े मामलों को दरकिनार करते हुए गुरुवार रात दायर की गई याचिका बिना कोई कारण बताए शुक्रवार सुबह 10.30 बजे के लिए सूचीबद्ध कर दी गई. लेकिन मेरी तरफ़ से 17 अप्रैल को दायर किए गए एक मामले पर अभी तक कोर्ट की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. जबकि मैं न्यायाधीशों और उच्चतम न्यायालय के सेक्रेटरी जनरल को इस बारे में लगातार शिकायतें कर चुका हूं.’

रिपब्लिक टीवी से ही बात करते हुए अर्णब गोस्वामी के वकील मुकुल रोहतगी का भी कहना था कि कोरोना संकट के इस दौर में कोई मामला कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो उसकी सुनवाई में कुछ दिनों का वक्त लगता ही है. ऐसे में वे सुप्रीम कोर्ट के शुक्रगुजार हैं कि वह गोस्वामी की याचिका पर तुरंत सुनवाई के लिए तैयार हो गया. रोहतगी का यह भी कहना था कि उन्होंने अपनी पेटीशन बहुत जल्दी में तैयार की थी और उसके साथ एफआईआर जैसे कुछ कागजात भी शामिल नहीं थे लेकिन इसके बावजूद अदालत ने न केवल इस पर सुनवाई की बल्कि बहुत तसल्ली के साथ ऐसा किया.

रीपक कंसल इसे सुप्रीम कोर्ट का पक्षपातपूर्ण रवैया बताते हुए कहते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में सेक्शन अधिकारियों द्वारा यही रवैया अपनाया जाता है जहां चुनिंदा क़ानूनी फर्मों और प्रभावी वकीलों को वरीयता दे दी जाती है. यह समानता के अवसर के खिलाफ़ है.’ ग़ौरतलब है कि कुछ ही महीने पहले उच्चतम न्यायलय ने धारा 370 हटाने के ख़िलाफ़ दायर की गई एक बेहद महत्वपूर्ण याचिका पर भी जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया था.

अर्णब गोस्वामी के केस के बहाने कुछ लोग कश्मीर के पत्रकार और लेखक गौहर गिलानी का मामला भी उठा रहे हैं जिनके खिलाफ साइबर पुलिस ने ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों को रोकने के यूएपीए क़ानून के तहत बीती 21 अप्रैल को मामला दर्ज किया था. गिलानी पर आरोप है कि वे सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों को भड़काने का काम कर रहे थे. दरअसल गिलानी ने सोशल मीडिया पर घाटी पुलिस को उपद्रवी और उत्तेजक कार्रवाई करने वाला बताया था जिसके आधार उनके ख़िलाफ़ यह कार्रवाई की गई. अर्णब गोस्वामी की ही तरह गिलानी के मामले की भी सुनवाई जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में कल यानी शुक्रवार को ही हुई थी. लेकिन जहां अर्णब गोस्वामी अपने चैनल पर भड़काऊ बातें करने के बाद अदालत से दोहरी राहत पाने में सफल रहे, वहीं गिलानी को कोर्ट ने कोई भी छूट देने से इनकार कर दिया. इसके बाद से उन पर गिरफ़्तारी की तलवार लटक रही है.

ऐसे में सवाल उठाए जा रहे हैं कि यदि अदालतों का मकसद देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी को बचाए रखना ही है तो पत्रकारों से जुड़े अलग-अलग मामलों में ही क़ानून का रुख़ अलग-अलग क्यों नज़र आता है? हाई कोर्ट के इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने ट्विवटर पर लिखा - ‘अर्णब गोस्वामी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और जेके हाई कोर्ट के फैसले से बड़ा विरोधाभास कोई हो नहीं सकता. अगर न्यायपालिका ही नैशनल और एंटी नैशनल की कहानी में विश्वास करने लगेगी तो लोग न्याय मांगने के लिए कहां जाएंगे?’

कुछ जानकार अर्णब गोस्वामी को मिली राहत को सुप्रीम कोर्ट की ही उस टिप्पणी के ज़रिए चुनौती दे रहे हैं जो बीती 31 मार्च को चीफ़ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव ने की थी. दरअसल बीते दिनों विभिन्न शहरों में हजारों-लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने-अपने घर जाने के लिए जिस तरह सड़क पर आ गए थे, उसके लिए इस पीठ ने उन मीडिया संस्थाओं को ज़िम्मेदार माना था जिन्होंने बिना पुष्टि के ही लॉकडाउन के अगले तीन महीनों के लिए बढ़ जाने की ख़बरें चलाकर लोगों को तनाव में ला दिया था. तब कोर्ट ने मीडिया को ज़िम्मेदार भूमिका निभाने के सख़्त निर्देश दिए थे. लेकिन अब जब अर्णब गोस्वामी की हालिया टीवी बहस को पत्रकारिता के हिसाब से उचित नहीं माना जा रहा है, तब उनके प्रति सुप्रीम कोर्ट का नरम रुख़ थोड़ा चौंकाने वाला है.

यही नहीं, इस मामले में जिस तरह से अर्णब गोस्वामी के ख़िलाफ़ सिर्फ़ कांग्रेस शासित राज्यों में रिपोर्ट दर्ज़ कराई गई और इस केस को लड़ने के लिए दोनों पक्षों की तरफ़ से जो वकील सामने आए हैं उन्हें देखकर भी यह नहीं लगता है कि किसी भी तरफ़ से यह मुक़दमा पत्रकारिता के मूल्यों या अधिकारों को बचाने के लिए लड़ा जाना है. बल्कि यह एक ख़ालिस राजनीतिक मामले जैसा ही दिखाई देता है. जहां एक तरफ़ गोस्वामी के ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ की तरफ़ से विवेक तन्खा, महाराष्ट्र की तरफ़ से कपिल सिब्बल और राजस्थान की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की वहीं उनके बचाव में अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ भटनागर पेश हुए.

इनमें से सिर्फ़ सिद्धार्थ भटनागर को छोड़कर किसी भी अधिवक्ता का स्पष्ट राजनीतिक झुकाव किसी से नहीं छिपा है. जहां विवेक तन्खा, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी कांग्रेस की तरफ़ से सांसद रह चुके हैं, वहीं मुकुल रोहतगी पहली मोदी सरकार में अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं और भारतीय जनता पार्टी से सहानुभूति रखने वालों में शामिल हैं. हालांकि इस बारे में जानकार पहले तीन वकीलों के प्रति थोड़ा नरम रुख अपनाते हुए कहते हैं कि चूंकि अर्णब गोस्वामी ने सीधे तौर पर कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी पर हमला बोला था इसलिए पार्टी से जुड़े अधिवक्ताओं का सामने आना स्वाभाविक था. लेकिन एक पत्रकार होने के नाते अर्णब का रोहतगी को ही अपना मुख्य अधिवक्ता चुनना उन्हें सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है. हालांकि तकनीकी तौर पर इसमें कुछ गलत नहीं है.

इस पूरे घटनाक्रम ने अर्णब गोस्वामी से जुड़े करीब एक दशक पुराने ऐसे ही एक मानहानि के दिलचस्प मुक़दमे की भी यादें ताजा कर दी हैं. तब अर्णब टाइम्स नाउ चैनल समूह के एडिटर इन चीफ हुआ करते थे. और यह मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के अध्यक्ष रह चुके पी बी सावंत ने ठोका था. हुआ यूं था कि 10 सितंबर 2008 को टाइम्स नाउ ने अपने एक बुलेटिन में घोटाले से जुड़ी एक ख़बर में आरोपित जज की जगह जस्टिस सावंत का ग़लत फोटो चला दिया था जो करीब 15 सेकंड के लिए स्क्रीन पर दिखा था.

जब जस्टिस सावंत को इस बारे में पता चला तो उन्होंने चैनल को उसकी इस ग़लती के बारे में अवगत कराया. लेकिन जब चैनल ने इस पर कोई खेद नहीं जताया तब जस्टिस सावंत ने एक लीगल नोटिस भेजकर उसे चेताया कि यदि उनसे माफ़ी नहीं मांगी गई तो वे चैनल के ख़िलाफ़ 100 करोड़ रुपए की मान-हानि का दावा कर देंगे. इसके ठीक दस दिन बाद टाइम्स नाउ ने जस्टिस सावंत को जवाब दिया कि वह पिछले कुछ दिनों से स्क्रीन पर अपनी ग़लती मानने वाली पट्टियां (टिकर) चला रहे हैं. इस पर जस्टिस सावंत और भड़क गए. उनका कहना था कि चैनल ने ऐसा उनके नोटिस भेजने के बाद किया जबकि यह स्वप्रेरणा से होना चाहिए था.

जस्टिस सावंत ने चैनल पर केस करने का पूरा मन बना लिया था. लेकिन तब अर्णब गोस्वामी ने उनसे मुलाकात का वक़्त मांगा. उन्हें 11 अक्टूबर की शाम का समय दिया गया. लेकिन उन्होंने आठ अक्टूबर को अपनी एक सर्जरी होने की बात कहकर मिलने में असमर्थता ज़ाहिर कर दी. इसके बाद जब जस्टिस सावंत ने उसी रात अर्णब को अपने डेली शो की एंकरिंग करते देखा तो उन्होंने पुणे की सिविल कोर्ट में टाइम्स नाउ पर 100 करोड़ का मुक़दमा कर ही दिया. ये भारत में किसी भी मीडिया संस्थान पर किया गया तब तक का सबसे बड़ा मान-हानि का दावा माना गया था.

26 अप्रैल 2011 को इस मुक़दमे का फैसला जस्टिस सावंत के पक्ष में आया जिसे टाइम्स नाउ ने बॉम्बे हाइकोर्ट में चुनौती दी. इस पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने टाइम्स नाउ को अपील करने से पहले 20 करोड़ रुपए नकद और 80 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी जमा कराने का आदेश दिया. इस आदेश में कहा गया था कि ये बीस करोड़ रुपए ब्याज समेत जीतने वाले पक्ष को सौंपे जाएंगे और चैनल के केस हारने की स्थिति में बचा हुआ धन उससे या उसकी गारंटी लेने वाले बैंक से वसूला जाएगा. इस पर टाइम्स नाउ ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट ने उनके चैनल से सहानुभूति न दिखाते हुए इस मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया था.