उत्तर राग की चिन्ताएं
इस पर काफ़ी ध्यान किया गया है कि कोरोना महामारी से निपटने के लिए जो अनेक उपाय किये गये हैं उनके कारण अनिवार्य रूप से आर्थिक स्थिति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा. सामाजिक स्थिति भी बहुत बदल जायेगी. समूहन के अनेक प्रकार काफ़ी दिनों के लिए लगभग वर्जित हो जायेंगे. विडम्बना यह है कि बिना सामूहिक उद्यम के सामान्य जीवन बहाल करना कठिन है जबकि महामारी से जूझने की मुख्य विधि सामाजिक दूरी बरतने की है. जो नक़्शा उभर रहा है उसमें निर्माण, उत्पादन आदि व्यावसायिक गतिविधियां तो बहाल हो जायेंगी लेकिन शैक्षणिक संस्थाएं, सभागार आदि, कम से कम अभी की स्थिति और ख़तरों के चलते, कई महीनों पूरी तरह से बन्द रहेंगे. जब उनमें कुछ छूट दी भी जायेगी तो वह बहुत ही सीमित समूहन होगा.
यह स्थिति प्रदर्शनकारी कलाओं जैसे नृत्य, संगीत, रंगमंच आदि के लिए बड़ी भयावह होने वाली है. इन कलाओं का तो सारा सौन्दर्यशास्त्र दर्शकों-श्रोताओं की सामूहिक उपस्थिति और सक्रियता पर आधारित है. इनका प्रशिक्षण भी, जो मुख्यतः गुरु-शिष्य परम्परा के भरोसे से चलता आया है, दोनों की निकटता, आत्मीय संवाद और सम्प्रेषण पर अब तक निर्भर रहा है. लेकिन अब प्रस्तुति और प्रशिक्षण दोनों कई अर्थों में मौलिक रूप से परिवर्तित होने को बाध्य होंगे. बिल्कुल नये क़िस्म की अप्रत्याशित मौलिकता की दरकार होगी.

एक तरीका़, जो थोड़ा-बहुत चल भी निकला है वह सब कुछ ‘ऑनलाइन’ कर देने का है. यों तो कलाओं को उनकी प्रस्तुति और प्रशिक्षण में जारी रखने का यह एक व्यावहारिक तरीका है पर उसमें जो अनिवार्यतः सजीवता या जीवन्तता का अभाव होगा उसकी क्षतिपूर्ति कैसे होगी. फिर, अगर कुछ समय बाद सभागार आदि खुल गये तो वहां श्रोता-दर्शक आसानी से नहीं जायेंगे क्योंकि उन्हें सब कुछ ‘ऑनलाइन’ देखने की आरामदेह आलसी आदत पड़ गयी होगी! इसलिए इस व्यावहारिक और आकर्षक विकल्प के कुछ गंभीर ख़तरे भी हैं. शास्त्रीय संगीत और नृत्य की प्रस्तुतियां सफल-सार्थक तभी होती हैं जब उनमें श्रोताओं-दर्शकों का दृश्य-श्रव्य साझा होता है. ‘ऑनलाइन’ पर शायद ऐसी साझेदारी संभव हो भी तो वह स्वाभाविक संभवतः न होगी या लगेगी.
जब तक कोई व्यावहारिक और कलात्मक दृष्टि से सन्तोषप्रद विकल्प नहीं उभरता है और सारी प्रस्तुतियां स्थगित हैं तब तक कलाकार अपना जीवन-यापन कैसे करेंगे? उनकी आय के मुख्यतः दो स्रोत हैं: प्रस्तुति और प्रशिक्षण से मिलने वाले पारिश्रमिक. क्या सरकार या अन्य परोपकारी संस्थाएं इस बारे में कुछ सोच रही हैं?
सुझाव यह है कि एक अन्तरिम कला-निधि या कला-कोष स्थापित किया जाये जिसमें केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें, कॉरपोरेट जगत्, सांस्कृतिक सहायता के लिए स्थापित ट्रस्ट, केन्द्रीय और राज्य अकादेमियां, परोपकारी संस्थाएं, इन कलाओं की जिजीविषा को सक्रिय रखने में रूचि रखने वाले श्रोता-दर्शक, साधन-सम्पन्न संगीतकार और नृत्य कलाकार वित्तीय सहयोग दें. कारपोरेट जगत के लिए यह ‘सीएसआर’ में गिना जाये और इसे कर-मुक्त किया जाये. इसे चलाया कैसे जाये, कलाकारों की पात्रता के मानदण्ड आदि क्या होंगे, कितनी अवधि के लिए सहायता दी जा सकेगी आदि मुद्दों पर कलाकार-समुदाय सोच-विचार और संवाद कर सर्वसम्मति विकसित करे.
अच्छा यह भी होगा कि कुछ मूर्धन्य संगीतकार और नृत्य कलाकार राष्ट्र के नाम और सरकारों, संस्थाओं आदि के नाम एक अपील ज़ारी करें और इस निधि या कोष की शुरूआत अपने निजी वित्तीय योगदान से करें. इस कठिन समय में मूर्धन्यों को सचमुच नेतृत्व करना चाहिये. दूसरे कलाकारों से भी आग्रह है कि वे आपसी भेदभाव, ईर्ष्या-स्पर्धा, दृष्टि और मनभेद से ऊपर उठ कर एकजुट हों. ऐसा हो पाता है तो यह उनके निजी हित और शास्त्रीय कलाओं के हित में एक साथ होगा. अपने कलाप्रयत्न और उनसे चरितार्थ होने वाली संस्कृति को बचाने के लिए सक्रिय होना इस समय कलात्मक और नैतिक कर्तव्य दोनों है. कुछ कलाकारों ने इस सिलसिले में पहल की है, उसका समर्थन और विस्तार होना चाहिये.
‘मेरी मां की भाषा’
मोरक्कन कवि अब्देललतीफ़ लाबी फ्रेंच में लिखते हैं और उन्हें दोस्तोयवस्की, नाज़िम हिकमत, शोयंका और सर्वतान्तीस की संगत का कवि माना जाता है. उनमें क्रोध और करुणा दोनों की जगह है. वे अपने को एक ऐसा लेखक मानते हैं जो अपने साहित्यिक स्वास्थ्य की जांच आत्मपरीक्षण से करता रहता है. उन्हें लगता है कि वे बैलेन्स शीटों से आक्रान्त रहे हैं अपनी दुनिया की, अपने लेखन की. अंग्रेज़ी में उनकी कविताओं के अनुवाद का एक बड़ा, 800 पृष्ठों से अधिक का, संचयन डोनल्ड निकल्सन-स्मिथ ने किया है और ‘इन प्रेज़ आव् डिफ़ीट’ के नाम से आर्किपेलागो बुक्स ने इसे प्रकाशित किया है. उनकी कुछ कविताओं के अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद प्रस्तुत हैं.
मेरी मां की भाषा
मैंने बीस साल से अपनी मां को नहीं देखा
उसने अपने को भूखों मरने दिया
वे कहते हैं कि वह अपने सिर का स्कार्फ़
हर सुबह उतार देती थी
और सात बार फ़र्श पर पीटती थी
स्वर्ग और आततायी को कोसते हुए
मैं गुफा में था
ऐसी जिसमें मुजरिम अंधेरे में पढ़ता है
और दीवारों पर भविष्य की पशुमालाएं उकेरता है
मैंने बीस साल से अपनी मां को नहीं देखा
वह मेरे पास एक चीनी काफ़ी मशीन छोड़ गयी
जिसके प्याले एक-के-बाद-एक टूट रहे हैं
हालांकि वे इतने भोंड़े हैं कि मैं ध्यान नहीं देता
पर मुझे इस वजह से काफ़ी और भी प्यारी है
आज, जब मैं अकेला हूं
मैं अपनी मां की आवाज़ धारण करता हूं
बल्कि मेरे मुंह से वह बोलती है
अपनी कसमों, अशिष्टताओं और बद्दुआओं के साथ
उसके प्रिय नामों की अनोखी माला
उसके शब्दों की ख़तरे में पड़ी प्रजाति के साथ
मैंने बीस साल से अपनी मां को नहीं देखा
पर मैं आखि़री व्यक्ति हूं
जो अब भी उसकी भाषा बोलता है
अनन्त का एक संक्षिप्त संस्करण
मैं बेड़े पर एक मोमबत्ती जलाऊंगा
और अपनी प्रार्थना गढूंगा
मैं उसको छोड़ दूंगा लहरों की स्फूर्ति पर
उनका मंदिर बनाने के लिए
मैं अपना लबादा ढांप दूंगा
पहली मछली पर
जो मेरी पतवारों से टकराती है
इस तरह मैं पाऊंगा रात में, समुद्र में
बिना समुद्री चिड़िया या रसद के
अपनी मोमबत्ती के बचे हुए टुकड़े
और प्रार्थना के अपने हिस्से के साथ
इस तरह मैं पाऊंगा
अपने काल्पनिक चेहरे के साथ
और खुद से कहूंगा
अरे अधआदमी, खुश होओ
तुम जीने वाले हो
अगर तुम अभी तक नहीं जिये हो
अनन्त का एक संक्षिप्त संस्करण.
उनकी एक ‘भंगुर’ कविता है:
उनके पास आदमी का सबकुछ है
लेकिन वे आदमी नहीं हैं
देखो उन्हें करते
जो कोई जानवर भी कभी नहीं कर पाया
वे कहां हैं
हममें दुबके हुए
हममें, जिनका दावा आदमी होने का है!