इस देश के तथाकथित धर्मरिपेक्ष लोग सिर्फ उन अल्पसंख्यकों के नाम पर सबसे ज्यादा रोते और शोर मचाते हैं जो बहुत सारे अल्पसंख्यकों के सामने अच्छे-खासे बहुसंख्यक हैं.
लाल ब्रूस थांगखल के सिर में 15 टांके हैं. सूजी हुई आंखों का रंग बैंगनी हो गया है, पर वे जिंदा हैं.....खैर वे मर भी जाते तो क्या होता! लाल ब्रूस का ऐसे भयंकर तरीके से बेवजह पिटना भी असहिष्णुता ही है, पर यह बेहद मरियल किस्म की असहिष्णुता है. यह उस स्तर की असहिष्णुता कभी नहीं मानी जाएगी जैसी अखलाक की हत्या मानी गई. लाल ब्रूस के मर जाने पर भी इसे ऐसी भयंकर और शर्मनाक घटना में कभी नहीं गिना जाता, जिससे अपना देश पूरी दुनिया में शर्म महसूस करे. जिसके खिलाफ लोग प्रदर्शन पर उतर आएं और साहित्यकार अपना सम्मान लौटाने लगें.
ऐसा दावे के साथ इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि जनवरी 2014 में जब 19 साल के नीडो टानिया की लाजपत नगर में पीटकर हत्या की गई थी, तब विरोध प्रदर्शनों का कोई सिलसिला नहीं चला था. किसी ने पुरस्कार भी नहीं लौटाए थे. तब किसी को नहीं लगा कि असहिष्णुता की हद हो गई है. यह बेहद शर्मनाक और अफसोसजनक है कि हमारे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष कट्टर धार्मिक हैं, जातिवादी हैं, क्षेत्रवादी हैं.
ऐसा क्यों है कि 744 अल्पसंख्यक दलितों की हत्या वह बवाल और असहिष्णुता की बहस खड़ी न कर सकी, जो एक अल्पसंख्यक मुस्लिम की हत्या ने खड़ी कर दी?
मणिपुर के रहने वाले लाल ब्रूस ‘नॉर्थ ईस्ट सर्पोट सेंटर हेल्पलाइन‘ की गुड़गांव इकाई के मीडिया इंचार्ज हैं. आठ दिसंबर को गुड़गांव में ही वे अपनी महिला मित्र के साथ कहीं जा रहे थे, नशे में धुत कुछ युवकों ने बिना किसी बात के उनकी मित्र पर अश्लील टिप्पणियां कीं. लाल ब्रूस ने टोका तो उनकी वहशियाना तरीके से पिटाई की गई. 30 साल के ब्रूस बुरी तरह घायल हो गए.
मैं शर्मिंदा हूं कि इस देश के तथाकथित धर्मरिपेक्ष लोग सच में अल्पसंख्यकों के लिए नहीं खड़े होते. वे सिर्फ उन अल्पसंख्यकों के नाम पर सबसे ज्यादा रोते, शोर मचाते और हंगामा खड़ा करते हैं, जो बहुत सारे अल्पसंख्यकों के सामने अच्छे-खासे बहुसंख्यक हैं.
अल्पसंख्यकों की बात करें तो इस देश में 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियों के लोग हैं, 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग हैं, 14.2 प्रतिशत मुसलमान हैं और 7.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग हैं. यदि हम अल्पसंख्यकों के लिहाज से भी देखें तो अपने यहां मुस्लिमों से बड़ा तबका अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों का है. लेकिन पिछड़ी जातियों के प्रति पूरे देश में हो रही हिंसा को अक्सर अनदेखा किया गया. अक्सर ही उसे आज की अहिष्णुता से तो जोड़कर बिल्कुल भी नहीं देखा जाता.
आप पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ देशभर में हो रहे हमलों पर मौन रहते हैं और एक मुस्लिम अल्पसंख्यक की हत्या पर पूरे देश के असिहष्णु होने का फतवा जारी कर देते हैं.
दूसरी तरफ अनुसूचित जनजाति के लोग जो कि मुस्लिमों से भी ज्यादा अल्पसंख्यक हैं, उनके प्रति हिंसा और असहिष्णुता को भी हमेशा ही अनदेखा किया जाता है. ऐसा क्यों है कि न तो अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े तबके के प्रति ये कट्टर धर्मनिरपेक्ष कभी पिघलते हैं, न ही इस देश के सबसे कम संख्या वाले अल्पसंख्यकों के प्रति अन्याय के विरोध में किसी की चोंच खुलती है. दीगर सवाल यह है कि सिर्फ मुस्लिमों (जो असल में अल्पसंख्यक जितने हैं नहीं) को ही क्यों सबसे ज्यादा असहिष्णुता का शिकार माना जा रहा है?
इस देश में दलितों के खिलाफ भी हिंसा लगातार बढ़ी है. 2014 में भारत में लगभग 744 दलितों की हत्या हुई थी. ऐसा क्यों है कि 744 अल्पसंख्यक दलितों की हत्या वह बवाल और असहिष्णुता की बहस खड़ी न कर सकी, जो एक अल्पसंख्यक मुस्लिम की हत्या ने खड़ी कर दी? किसी भी धर्मनिरपेक्ष ने कोई विरोध प्रदर्शन करना तो दूर, एक शोकसभा भी की है इन सैकड़ों अल्पसंख्यों की हत्या पर! किसी साहित्यकार को इन सैकड़ों अल्पसंख्यकों की हत्या पर पुरस्कार लौटाने जैसा क्यों नहीं महसूस हुआ? उन्हें एक बार भी क्यों नहीं लगा कि इस देश के अन्य अल्पसंख्यकों के प्रति भी हमारे देश में घोर हिंसा और भयंकर असहिष्णुता है?
हमें ऐसी सहिष्णुता से सख्त शिकायत है जो किसी खास मौके पर, खास लोगों के लिए दिखाई जाती है!  हम ऐसी इंसानियत के मुंह पर कालिख पोतना चाहते हैं जो धर्म देखकर पैदा होती है.
माफ करें पर आपकी धर्मनिरपेक्षता से मुझे जातिवाद, सवर्णवाद और धर्मवाद की भयंकर बू आ रही है. आप इस देश के सच्चे धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकते. जो सैकड़ों दलित अल्पसंख्यकों की हत्या पर नीम बेहोशी में रहते हैं, जो पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ देशभर में हो रहे हमलों पर मौन रहते हैं और एक मुस्लिम अल्पसंख्यक की हत्या पर पूरे देश के असिहष्णु होने का फतवा जारी कर देते हैं.
निस्संदेह अखलाक की हत्या से लेकर, नीडो टानिया, दलित बच्चों, स्त्रियों-पुरुषों को जिंदा जलाने तक, इस देश के सभी अल्पसंख्यकों के साथ असंख्य किस्म की असहिष्णुता जब-तब दिखाई पड़ती है. इनमें से किसी एक भी हत्या को हम किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता. इस देश के हर एक अल्पसंख्यक की निर्मम हत्या पर पूरे समाज में घोर नाराजगी जताई जानी चाहिए, गली-गली में तूफान खड़े हो जाने चाहिए. लेकिन हमें ऐसी धर्मनिरपेक्षता से सख्त शिकायत है जो धर्म विशेष के लिए दिखाई जताई जाती हो! हमें ऐसी सहिष्णुता से सख्त शिकायत है जो किसी खास मौके पर, खास लोगों के लिए दिखाई जाती है! हम ऐसी इंसानियत के मुंह पर कालिख पोतना चाहते हैं जो धर्म देखकर पैदा होती है.
सच यह है कि मुस्लिमों के लिए भारत से ज्यादा ‘जिंदा माहौल‘ दुनिया के किसी देश में नहीं है. खुद मुस्लिम देशों की महिलाएं कैसे-कैसे बंद माहौल में रहती हैं यह किससे छिपा है?
ऐसे तमाम धार्मिक और कट्टर धर्मनिरपेक्ष पूरे समाज को दोतरफा नुकसान पहुंचा रहे हैं. एक तरफ वे बाकी सभी अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति हो रही घोर हिंसा से सबका ध्यान हटा रहे हैं. दूसरा, वे मुस्लिमों के भीतर बार-बार यह डर बैठा रहे हैं कि इससे ज्यादा असुरक्षित देश उनके लिए कोई नहीं और वे सबसे पहले निशाने पर हैं. जबकि सच यह है कि मुस्लिमों के लिए भारत से ज्यादा ‘जिंदा माहौल‘ दुनिया के किसी देश में नहीं है. खुद मुस्लिम देशों की महिलाएं कैसे-कैसे बंद माहौल में रहती हैं यह किससे छिपा है?
ये पंथवाद से ग्रसित तमाम ‘कट्टर धर्मनिरपेक्ष‘ न सिर्फ इस देश के अन्य तमाम अल्पसंख्यकों के प्रति गुनहगार हैं, बल्कि देश के दूसरे सबसे बड़े तबके को अनायास ही और भी ज्यादा खौफग्रस्त बनाने के भी दोषी हैं. आने वाले समय में यह ‘कट्टर धर्मनिपेक्षता‘ कितनी खतरनाक साबित होने वाली है, इसका उन्हें अंदाजा भी नहीं है. हमारे यहां अल्पसंख्यकों के नाम पर हद दर्जे के भयंकर बल्कि शर्मनाक भेदभाव की नींव इन सिर्फ तथाकथिक धर्मनिरपेक्षों के द्वारा रखी गई है.
असहिष्णुता दुनिया के किस मुल्क में नहीं है और किस दौर में नहीं रही? आज से 100 साल पहले 1915 में भी गांधी ने कहा था कि हिंदू-मुसलमान एक दूसरे के हाथ का पानी नहीं पीते. हिंदू ‘हिंदू पानी‘ पीता है और मुसलमान ‘मुस्लिम पानी‘ पीता है. हर एक समय में, दुनिया के हर कोने में शर्मनाक घटनाएं होती आई हैं, होती रहेंगी. हमें उन पर कड़ी नजर रखनी चाहिए और हर एक अमानवीय घटना का कड़ा विरोध करना चाहिए. किसी एक घटना पर तूफान खड़ा कर दें और बाकी घटनाओं पर शर्मनाक चुप्पी ओढ लें, यह भयंकर किस्म की ‘कट्टर निरपेक्षता‘ है!
वे कट्टर हिंदुओं की बातों और हरकतों पर उनकी खाट खड़ी करने में एक मिनट नहीं लगाते, लेकिन कट्टर मुस्लिमों की बात और हरकतों पर कान तक नहीं धरते.
धर्मनिरपेक्षों के कट्टर चरित्र का पता इस बात से चलता है कि उनमें सच को स्वीकार करने का साहस नहीं. वे कट्टर हिंदुओं की बातों और हरकतों पर उनकी खाट खड़ी करने में एक मिनट नहीं लगाते, लेकिन कट्टर मुस्लिमों की बात और हरकतों पर कान तक नहीं धरते. सागरिका घोष द्वारा तस्लीमा नसरीन के लिए एक साक्षात्कार में भारत में धर्मनिरपेक्षता के चरित्र पर तसलीमाका कहना था, 'हां, भारत के अधिकांश सेक्युलर लोग मुस्लिम समर्थक हैं और हिंदू विरोधी हैं. वे कट्टरपंथी हिंदुओं के खिलाफ विरोध करते हैं, लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिमों के जघन्य अपराधों का बचाव करते हैं!'
धर्मनिरपेक्षता का यह वर्तमान चरित्र बेहद खतरनाक, कट्टर और असहिष्णु है. ये कट्टर धर्मनिरपेक्ष लोग हमें तमाम कट्टपंथियों की तरह ही अस्वीकार हैं. हम इनकी घोर निंदा करते हैं. हम धर्मनिरपेक्षता के नए संस्करण की प्रस्तावना लिखना चाहते हैं, जो किसी भी जाति, धर्म, समाज, और क्षेत्र को लेकर भेदभाव से ग्रस्त न हो. जो सबके बुरे को बुरा और अच्छे को अच्छा कहने का साहस रखती हो. जिसकी नजर अच्छों की बुराई और बुरों की अच्छाई देखने और खुलकर स्वीकार रखने का भी माद्दा रखती हो.